सीएम नायब सैनी के चहेते पूर्व मंत्री सुभाष सुधा के मॉल की खबर दिखाना पड़ा भारी? पत्रकार नवीन रमण का आरोप- नशेबाजी की खबर चलाने वाले पत्रकारों को हरियाणा पुलिस ने उठाया, पुलिस की कहानी पर भी सवाल
सत्ता का नशा जब सिर चढ़कर बोलता है तो सवाल पूछने वाले पत्रकार ही निशाने पर आ जाते हैं। हरियाणा में लिविंग इंडिया न्यूज़ चैनल के प्रबंध निदेशक अतुल अग्रवाल समेत पांच पत्रकारों की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा किया है कि क्या सत्ता से जुड़े रसूखदार लोगों के कारोबार पर खबर चलाना अब पत्रकारों के लिए अपराध बन गया है?
पत्रकार नवीन रमण ने आरोप लगाया है कि कुरुक्षेत्र में भाजपा नेता और हरियाणा के पूर्व मंत्री सुभाष सुधा के मॉल में नशेबाजी से जुड़ी खबर प्रसारित करने वाले पत्रकारों के खिलाफ पुलिस ने कार्रवाई की। सुभाष सुधा को मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का करीबी माना जाता है। नवीन रमण का आरोप है कि मॉल में नशा करते लोगों की खबर दिखाने के बाद पत्रकारों को हिरासत में लिया गया।
अगर किसी मॉल में लोग नशा करते हुए दिखाई देते हैं और पत्रकार उस गतिविधि का वीडियो हासिल कर खबर प्रसारित करता है, तो सबसे बड़ा सवाल खबर दिखाने वाले पत्रकार पर कार्रवाई का नहीं, बल्कि उस गतिविधि की जांच का होना चाहिए। आखिर सार्वजनिक हित से जुड़ी ऐसी खबर सामने आने पर जवाबदेही किसकी बनती है? क्या खबर दिखाने वाले पत्रकारों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा?
सीएम के करीबी पूर्व मंत्री के मॉल की खबर और पांच पत्रकारों की गिरफ्तारी
कुरुक्षेत्र पुलिस ने लिविंग इंडिया न्यूज़ चैनल के पांच पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया है। इनमें प्रबंध निदेशक अतुल अग्रवाल, संपादक सौरभ, एंकर सुदेश नैन, पत्रकार नीतू और लवप्रीत शामिल हैं।
पत्रकार नवीन रमण ने इस कार्रवाई को मॉल में कथित नशेबाजी की खबर से जोड़ते हुए हरियाणा सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा के सुशासन में पत्रकारिता करना अपराध बन गया है और चाटुकारिता ही असली पत्रकारिता मानी जा रही है।
यह आरोप गंभीर है। यदि किसी रसूखदार नेता से जुड़े प्रतिष्ठान पर खबर चलाने के कारण पत्रकारों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की गई है, तो यह प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला होगा। सत्ता में बैठे लोगों से असहज सवाल पूछना और उनके प्रभाव वाले प्रतिष्ठानों की गतिविधियों को सामने लाना पत्रकारिता का बुनियादी काम है, कोई अपराध नहीं।
पुलिस की कहानी पर भी सवाल
कुरुक्षेत्र पुलिस का कहना है कि मामला 16 अप्रैल 2026 को रिकॉर्ड किए गए एक पुराने निजी वीडियो को कथित तौर पर फर्जी लाइव स्टिंग ऑपरेशन के रूप में प्रसारित करने और शिकायतकर्ता को ब्लैकमेल किए जाने के आरोपों से जुड़ा है। पुलिस ने आईटी एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज करने की बात कही है।
लेकिन यहां सवाल उठता है कि क्या पुलिस की बताई वजह और पत्रकार नवीन रमण द्वारा लगाए गए आरोपों के बीच कोई संबंध है? क्या मॉल में कथित नशेबाजी की खबर के प्रसारण और पुराने वीडियो वाले मामले की पूरी पृष्ठभूमि सार्वजनिक की गई है? क्या पुलिस ने यह स्पष्ट किया है कि विवादित वीडियो और मॉल से जुड़ी खबर एक ही घटनाक्रम का हिस्सा हैं या अलग-अलग मामले हैं? पुलिस के पास ब्लैकमेलिंग के क्या प्रमाण हैं?
पुलिस के बयान में गिरफ्तारी का जो आधार बताया गया है, उसकी स्वतंत्र जांच जरूरी है। केवल पुलिस का बयान सामने आ जाने से मामले के सभी सवाल खत्म नहीं हो जाते। इसी तरह, पत्रकारों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच भी निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए।
पत्रकार खबर नहीं चलाएगा तो क्या करेगा?
पत्रकार का काम सत्ता के दावों का प्रचार करना नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाना है जिनसे ताकतवर लोग असहज होते हैं। यदि किसी प्रतिष्ठान में नशेबाजी की घटना का वीडियो सामने आता है, तो उसकी प्रामाणिकता की जांच कर जनहित में खबर चलाना पत्रकारिता का स्वाभाविक हिस्सा है। उस खबर से किसी प्रभावशाली व्यक्ति की छवि प्रभावित होती है, तो यह अपने आप में पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई का औचित्य नहीं बन सकता।
हां, किसी वीडियो के प्रसारण में यदि कानून का उल्लंघन हुआ है, तो उसका परीक्षण साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। लेकिन जांच की आड़ में पत्रकारों को डराने या सत्ता से जुड़े लोगों के खिलाफ खबरें रोकने की कोशिश होती है, तो उसका विरोध किया जाना चाहिए।
अतुल अग्रवाल समेत पांच पत्रकारों की गिरफ्तारी के मामले में अब जरूरी है कि मॉल में कथित नशेबाजी की खबर, उसके प्रसारण की तारीख, संबंधित वीडियो और पुलिस की कार्रवाई के बीच के संबंध को सार्वजनिक किया जाए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पत्रकारों को किस घटनाक्रम में और किन परिस्थितियों में हिरासत में लिया गया।
सवाल सीधा है: क्या हरियाणा में सत्ता के करीबी लोगों से जुड़े प्रतिष्ठानों पर खबर चलाने वाले पत्रकारों को इसी तरह पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा? यदि ऐसा है, तो यह केवल पांच पत्रकारों का मामला नहीं, बल्कि पूरे मीडिया जगत की स्वतंत्रता और जवाबदेही का सवाल है।
अगर किसी खबर या किसी खुलासे को लेकर पुलिसिया कार्रवाई की गई है तो ये अति निंदनीय- लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है-अस्वीकार्य है। इस मामले में डीजीपी को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, सीएम और पीएम भी कृपया संज्ञान लें.
-ज्ञानेंद्र शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

