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खोजी पत्रकारिता संस्था ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ का खुलासा- यूपी में SIR में चुनाव आयोग के सॉफ़्टवेयर ने खुद बना डाले 85,854 वोटर-डिलीशन फ़ॉर्म!

Governance article banner: 'In UP SIR, ECI Software Auto-generated 85,854 Forms to Delete Voters Without a Reason' with three author photos below.

नई दिल्ली/लखनऊ। उत्तर प्रदेश में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर एक और गंभीर खुलासा सामने आया है। खोजी पत्रकारिता संस्था द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने 9 अक्टूबर को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि चुनाव आयोग ने यूपी में अधिकारियों से 85,854 वोटरों के नाम हटाने वाले फ़ॉर्म बिना कोई कारण बताए साइन करवाए, और ये सभी फ़ॉर्म कानूनी समय-सीमा बीत जाने के बाद दाखिल किए गए।

रिपोर्ट के मुताबिक ये फ़ॉर्म अधिकारियों ने भरे ही नहीं थे। आयोग के अपने सॉफ़्टवेयर ERONET ने SIR सुनवाई के दौरान वोटर हटाए जाने पर ये फ़ॉर्म अपने-आप तैयार कर दिए, जिन पर अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर पहले से लगे थे और जिन्हें वरिष्ठों के पास मंज़ूरी के लिए भेज दिया गया।

98.5% में कोई कारण दर्ज नहीं

डेटा विश्लेषकों की मदद से कलेक्टिव ने यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) की वेबसाइट पर मौजूद सभी फ़ॉर्म-7 का डेटा निकाला। ईआरओ और एईआरओ द्वारा दाखिल 87,127 अनुरोधों में से 85,854 (98.5%) में हटाने की कोई वजह दर्ज नहीं है। ये सारे अनुरोध 15 मार्च से 2 अप्रैल 2026 के बीच सिर्फ़ 19 दिनों में दाखिल हुए।

नियम साफ़ हैं। फ़ॉर्म-7 भरने वाले को मृत्यु, कम उम्र, अनुपस्थित/स्थायी रूप से स्थानांतरित, पहले से दर्ज या भारतीय नागरिक न होने जैसे तय कारणों में से एक चुनना होता है। रिपोर्ट कहती है कि यह प्रक्रिया रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 का उल्लंघन है, जिसके तहत तय तरीके से न दिए गए दावे-आपत्तियाँ सीधे खारिज होनी चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह कि जिन अधिकारियों का काम ऐसी आपत्तियों पर फ़ैसला देना है, वही इन मामलों में अभियोजक और जज दोनों बन गए।

अधिकारियों ने क्या कहा

कलेक्टिव से बात करने वाले चार ईआरओ ने दावा किया कि ये अनुरोध उन वोटरों के लिए थे जिन्हें ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ या ‘अनमैप्ड’ होने की वजह से फ़्लैग किया गया था। एक ईआरओ के अनुसार, सुनवाई में किसी वोटर को मंज़ूरी न देने पर सिस्टम खुद उनकी ओर से फ़ॉर्म-7 बना देता था, और लॉग-इन उनके क्रेडेंशियल से होने के कारण उस पर उनका हस्ताक्षर लगना तय था। अधिकारियों का कहना है कि सॉफ़्टवेयर में ऐसा बदलाव किया गया था कि उनके पास हज़ारों लोगों के नाम हटाने पर दस्तख़त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

एक नाम से 188 आपत्तियाँ

रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला पैटर्न दर्ज है। तरबगंज और पीलीभीत विधानसभा क्षेत्रों में दाखिल 90% डिलीशन अनुरोध मुसलमानों के ख़िलाफ़ थे। तरबगंज में ‘रेशमा’ नाम से 188 आपत्तियाँ दर्ज हुईं, सभी एक ही तारीख़ को और एक ही बूथ के लोगों के ख़िलाफ़।

पहले 16.18 लाख का मामला

इससे पहले 6 अक्टूबर को कलेक्टिव ने खुलासा किया था कि ड्राफ्ट रोल प्रकाशित होने से पहले जमा हुए 16.18 लाख आवेदनों का ब्योरा यूपी के सार्वजनिक चुनावी रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं था। इस पर CEO नवदीप रिणवा ने कोई गैरकानूनी काम होने से इनकार करते हुए माना कि ये फ़ॉर्म ड्राफ्ट रोल से पहले आयोग के निर्देशों के तहत जुटाए गए थे। हालांकि कलेक्टिव ने CEO के इस बयान को ग़लत बताया है।

नई रिपोर्ट पर यूपी CEO और दिल्ली स्थित चुनाव आयोग को विस्तृत सवाल भेजे गए थे, लेकिन प्रकाशन तक कोई जवाब नहीं आया।

(मूल रिपोर्ट: द रिपोर्टर्स कलेक्टिव — reporters-collective.in)

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