नई दिल्ली। साधना ग्रुप के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर राकेश कुमार गुप्ता को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में गिरफ्तार किया है। यह मामला साधना मीडिया प्राइवेट लिमिटेड की दिवाला प्रक्रिया, आयकर विभाग के भारी बकाये के कथित निपटारे और मीडिया कंपनी से जुड़े वित्तीय लेनदेन में अनियमितताओं के आरोपों से जुड़ा है। जांच एजेंसी ने कथित अपराध से अर्जित रकम करीब 168 करोड़ रुपये बताई है।
63 वर्षीय राकेश कुमार गुप्ता को शुक्रवार, 9 अक्टूबर की रात करीब 10:25 बजे दिल्ली के वसंत कुंज स्थित ईश्वर फार्म्स से गिरफ्तार किया गया। शनिवार तड़के उन्हें अदालत में पेश किया गया। ED ने सात दिन की हिरासत मांगी थी, लेकिन अदालत ने पांच दिन की हिरासत मंजूर की। उन्हें 15 अक्टूबर को शाम चार बजे तक दोबारा अदालत में पेश करने का निर्देश दिया गया।
साधना ग्रुप टेलीविजन समाचार चैनल साधना टीवी और अन्य मीडिया नेटवर्क का संचालन करता है। समूह के प्रमुख की गिरफ्तारी मीडिया कारोबार से जुड़े वित्तीय लेनदेन और कॉरपोरेट दिवाला प्रक्रिया की निगरानी को लेकर भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, अभी सामने आए आरोप जांच एजेंसी के दावे हैं और इनका अंतिम न्यायिक परीक्षण होना बाकी है।
110 करोड़ रुपये से अधिक का आयकर बकाया और 20 लाख रुपये में निपटारे का आरोप
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू साधना मीडिया प्राइवेट लिमिटेड (SMPL) की इनसॉल्वेंसी यानी दिवाला प्रक्रिया से जुड़ा है। ED के मुताबिक, आरोप है कि कंपनी की दिवाला प्रक्रिया को इस तरह प्रभावित किया गया कि आयकर विभाग का 110.10 करोड़ रुपये का बकाया महज 20 लाख रुपये में निपटा दिया गया।
जांच एजेंसी के आरोपों के अनुसार, इस प्रक्रिया में ऐसे ऋणदाता शामिल थे जिनका कंपनी की कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) में कुल 99.41 प्रतिशत हिस्सा था। ED का दावा है कि संबंधित ऋणदाताओं के जरिए दिवाला प्रक्रिया को प्रभावित कर बकाये के निपटारे की ऐसी व्यवस्था की गई, जिससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा हुई।
कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स वह निकाय है, जो दिवाला प्रक्रिया के दौरान कंपनी के पुनर्गठन या समाधान से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में भूमिका निभाता है। इसलिए इस मामले में ऋणदाताओं की हिस्सेदारी, उनके आपसी संबंधों और फैसलों की प्रक्रिया जांच के महत्वपूर्ण बिंदु हैं।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आयकर बकाये के निपटारे से संबंधित आरोपों का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि अदालत ने किसी अपराध को सिद्ध मान लिया है। जांच एजेंसी को लेनदेन, संबंधित पक्षों की भूमिका और कथित आर्थिक लाभ के बीच संबंध स्थापित करना होगा।
कंपनी की बिक्री, क्रिप्टोकरेंसी और हवाला के जरिए रकम लेने का आरोप
ED की जांच केवल आयकर बकाये के निपटारे तक सीमित नहीं है। एजेंसी ने साधना मीडिया प्राइवेट लिमिटेड और आर्यन टीवी की पुनर्बिक्री से जुड़े लेनदेन पर भी सवाल उठाए हैं।
जांच एजेंसी के मुताबिक, कंपनी की पुनर्बिक्री से संबंधित कथित लेनदेन में करीब 2.50 करोड़ से 2.82 करोड़ रुपये तक की रकम नकद, क्रिप्टोकरेंसी के रूप में इस्तेमाल होने वाले USDT और हवाला माध्यमों से प्राप्त किए जाने का आरोप है।
USDT एक ऐसी क्रिप्टोकरेंसी है, जिसका मूल्य अमेरिकी डॉलर से जुड़ा रखने का प्रयास किया जाता है। इस मामले में जांच का एक अहम पहलू यह पता लगाना है कि कथित रकम किससे प्राप्त हुई, किसके नियंत्रण में रही और किन लोगों या कंपनियों तक पहुंची।
ED के आरोपों के मुताबिक, साधना मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ने संबंधित ऋणदाताओं को कुल 4.48 करोड़ रुपये का भुगतान किया। इसमें से 2.99 करोड़ रुपये राकेश कुमार गुप्ता की अपनी कंपनी बताई गई शार्पलाइन ब्रॉडकास्ट को दिए जाने का आरोप है।
जांच एजेंसी इन भुगतान संबंधों और कथित वित्तीय लाभ की प्रकृति की पड़ताल कर रही है। इस पूरे मामले में संबंधित कंपनियों की कारोबारी भूमिका, लेनदेन का वास्तविक उद्देश्य और रकम के अंतिम लाभार्थियों की पहचान महत्वपूर्ण होगी।
शेयर बाजार में कथित हेरफेर का मामला भी जांच के दायरे में
राकेश कुमार गुप्ता से जुड़े मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू साधना ब्रॉडकास्ट के शेयरों में कथित हेरफेर से संबंधित है।
ED ने अदालत में पेश किए गए अपने रिमांड दस्तावेजों में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के मई 2025 के एक आदेश का हवाला दिया। रिपोर्टों के मुताबिक, इस आदेश में गुप्ता को साधना ब्रॉडकास्ट के शेयरों में कथित हेरफेर के मामले में जिम्मेदार ठहराया गया था और लगभग 58 करोड़ रुपये की देनदारी के लिए संयुक्त रूप से और अलग-अलग जिम्मेदार बताया गया था।
यहां शेयर बाजार से संबंधित नियामकीय कार्रवाई और मौजूदा मनी लॉन्ड्रिंग जांच के बीच अंतर समझना जरूरी है। SEBI की कार्रवाई अपने नियामकीय दायरे में हुई थी, जबकि ED का मौजूदा मामला कथित अपराध से अर्जित रकम और उसके लेनदेन की जांच से जुड़ा है।
रिपोर्टों में बचाव पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि SEBI द्वारा लगाया गया जुर्माना अदा कर दिया गया था और संबंधित आदेश को चुनौती दी गई है। इन दलीलों तथा नियामकीय आदेश की मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया का आकलन किया जाना चाहिए।
दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा की FIR से शुरू हुई जांच
रिपोर्टों के मुताबिक, ED ने यह मामला दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा 29 सितंबर 2026 को दर्ज FIR के आधार पर शुरू किया। FIR में धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात समेत भारतीय दंड संहिता के विभिन्न प्रावधानों के तहत आरोप दर्ज किए गए थे। राकेश कुमार गुप्ता का नाम इस FIR में दूसरे आरोपी के रूप में बताया गया है।
इसके बाद ED ने धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत जांच आगे बढ़ाई। एजेंसी का दावा है कि इस मामले में कथित अपराध से अर्जित रकम का कुल मूल्य करीब 168 करोड़ रुपये है।
इस आंकड़े को समझना भी जरूरी है। 168 करोड़ रुपये की राशि ED द्वारा बताई गई कथित अपराध से अर्जित रकम है। इसे किसी अदालत द्वारा अंतिम रूप से प्रमाणित गबन या मनी लॉन्ड्रिंग की रकम के रूप में प्रस्तुत करना अभी उचित नहीं होगा।
अदालत में बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?
अदालत में राकेश कुमार गुप्ता की ओर से दलील दी गई कि SEBI और आयकर विभाग ने उनके खिलाफ इस मामले में शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। बचाव पक्ष ने आयकर विभाग से नो-ड्यूज प्रमाणपत्र मिलने का भी हवाला दिया।
बचाव पक्ष की इन दलीलों के बावजूद अदालत ने ED की जांच को केवल इस आधार पर अवैध मानने से इनकार किया कि आयकर विभाग या SEBI की ओर से अलग शिकायत नहीं की गई थी। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने मामले में सरकारी राजस्व को संभावित नुकसान, कथित वित्तीय लेनदेन और जांच की आवश्यकता को ध्यान में रखा।
अदालत के सामने ED की ओर से यह भी कहा गया कि कथित रकम का लेनदेन बैंकिंग माध्यमों से बाहर हुआ और जब्त किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के डेटा की जांच तथा उससे संबंधित सवालों पर आरोपी से पूछताछ बाकी है। एजेंसी ने इन्हीं आधारों पर हिरासत की मांग की थी।
अदालत ने ED को सात दिन के बजाय पांच दिन की हिरासत दी। इसका अर्थ है कि जांच एजेंसी को निर्धारित अवधि में आरोपी से पूछताछ करने की अनुमति मिली है। हिरासत में भेजा जाना दोषसिद्धि नहीं है और न ही इससे जांच एजेंसी के सभी आरोप स्वतः साबित हो जाते हैं।
मीडिया कारोबार में वित्तीय पारदर्शिता पर फिर सवाल
साधना ग्रुप के प्रमुख की गिरफ्तारी ने मीडिया कंपनियों के वित्तीय लेनदेन, कॉरपोरेट पुनर्गठन और शेयर बाजार में कारोबार से जुड़े नियामकीय सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है।
मीडिया कंपनियों के मामले में संपादकीय गतिविधियों और कारोबारी प्रबंधन को अलग-अलग समझना आवश्यक है। किसी समूह के मालिक या प्रबंधक के खिलाफ जांच होने से उसके पत्रकारों, कर्मचारियों या चैनल पर प्रकाशित हर खबर को स्वतः संदिग्ध नहीं माना जा सकता। इसी तरह, मीडिया कारोबार से जुड़े किसी व्यक्ति को कानून से बाहर भी नहीं माना जा सकता।
इस मामले में आगे की जांच से यह स्पष्ट होना बाकी है कि दिवाला प्रक्रिया के दौरान संबंधित पक्षों ने क्या भूमिका निभाई, आयकर बकाये का निपटारा किन परिस्थितियों में हुआ, कथित रकम का वास्तविक लाभार्थी कौन था और शेयर बाजार से संबंधित नियामकीय निष्कर्षों का वर्तमान मामले से क्या संबंध बनता है।

