प्रिय कमलेश सिंह,
प्रस्तोता,
तीन ताल पॉडकास्ट,
आजतक रेडियो.
मैं आपका कार्यक्रम कभी-कभार देखता हूं। पिछले पॉडकास्ट https://youtu.be/Jy8QRc83MXk?si=mgfF4lcg_Dxo-uzU का यह छोटा हिस्सा भी देखा। आपने आत्ममुग्धता में काफी झूठ बोला है, जो अक्सर आप करते रहते हैं। छद्म विद्वानों की यह आदत होती है कि वह झूठ भी इतने कॉन्फिडेंस से बोलते हैं कि लोगों को लगता है सौ टका सही बात है।
दुख तो यह है कि आप इसके माध्यम से बिहार का केवल एक चेहरा दिखा रहे हैं और यह अत्यधिक दुखद है कि आप बिहार के रहने वाले हैं, लेकिन जैसा कि वर्षों तक पलायन के बाद बाहर रह गए बिहारी खुद को आत्मसंतुष्ट राज्य के लिए कुछ करने की बजाए इसे गाली देकर ही कर लेते हैं, आप भी कर रहे हैं। ऐसे लोग जिन राज्यों में रहते हैं, वहां के लोगों को यह कहकर खुद के पलायन के निर्णय को जस्टिफाई करते रहते हैं कि देखो इसीलिए हम आ गए क्योंकि वहां खूब समस्याएं हैं।
बहरहाल आपके बाल पक गए हैं, मोटा चश्मा भी पहनते हैं और चतुराई के साथ उम्र का साथ लेते हुए थोड़ा चबा-चबा कर बोलते हैं तो लोगों को लगता है कि यह आदमी उम्रदराज हो गया और वहीं का रहनेवाला है तो सही ही कह रहा होगा, लेकिन आपने इसमें केवल मक्कारी की है, जब आपका यह प्रलाप सुन रहा था तो वह वाकया भी याद आ गया जब बनारस वाले व्योमेश शुक्ला ने भी बिहार को गाली दी थी तब भी आप दांत निपोर रहे थे। बहरहाल जब उनका विरोध हुआ तो उन्होंने माफी मांग ली थी, आप नहीं मांगेंगे लेकिन बावजूद इसके मैं आपको यह पत्र लिखना उचित समझा।
तीन ताल के हालिया एपिसोड में आपने पांच सात मिनट के वीडियो में खूब ज्ञान परोसा है लेकिन तथ्यों से इसको कोई मतलब ही नहीं है। आपने कहा है कि बिहार में कोई सुसंस्कृति नहीं है, पटना के बाहर कोई म्यूजियम देखने को नहीं मिलेगा। जबकि यहां बिहार में पटना के अलावा 15 से अधिक प्रमुख संग्रहालय हैं, जबकि सरकारी रिकॉर्ड और विभिन्न श्रेणियों (राज्य, केंद्रीय, विश्वविद्यालय और निजी) को मिलाकर पूरे बिहार में दो दर्जन से अधिक कार्यरत संग्रहालय हैं।
कुछ उदाहरण ले लीजिए मसलन पुरातात्विक संग्रहालय, नालंदा की स्थापना हुए सौ साल से भी ज्यादा हो गए हैं, आपको बता दूं कि वहां 1917 में नालंदा विश्वविद्यालय की खुदाई में मिलीं गुप्त और पाल वंश कालीन दुर्लभ मूर्तियाँ रखी हुई हैं। पुरातात्विक संग्रहालय, बोधगया भी समकालीन है, जहां बौद्ध और हिंदू धर्म से जुड़ी प्राचीन प्रतिमाएँ और कलाकृतियां प्रदर्शित हैं। चंद्रधारी संग्रहालय, दरभंगा कलाकृतियों, प्राचीन सिक्कों और मिट्टी के बर्तनों के विशाल संग्रह के लिए प्रसिद्ध है।
महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय, दरभंगा में शाही परिवार से जुड़ी वस्तुएं, हथियार और हाथीदांत की बनी कलाकृतियां यहां देखने को मिलती हैं। नारद: संग्रहालय, नवादा विशेष रूप से क्षेत्र की लोक कला और पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं को संजोए हुए है। गया संग्रहालय, गया में गया और उसके आस-पास के क्षेत्रों से प्राप्त प्राचीन मूर्तियां और पत्थर के अवशेष मौजूद हैं। बाबू कुंवर सिंह स्मृति संग्रहालय, जगदीशपुर (भोजपुर) में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू कुंवर सिंह की स्मृति में बना यह संग्रहालय ऐतिहासिक हथियारों और दस्तावेज़ों को प्रदर्शित करता है।
बिहारशरीफ संग्रहालय, नालंदा जो 1981 में स्थापित इस संग्रहालय में प्राचीन काल की पत्थर की मूर्तियाँ और अन्य पुरातात्विक अवशेष शामिल हैं। जैन सिद्धांत भवन (आर्ट गैलरी), आरा जैन धर्म से जुड़ी प्राचीन पांडुलिपियों और कला का अद्भुत संग्रह है। वैशाली संग्रहालय, वैशाली में वज्जी संघ की प्राचीन भूमि की ऐतिहासिक महत्ता और भगवान महावीर व बुद्ध से जुड़े अवशेष सुरक्षित हैं। तो राजा विशाल के गढ़ और कोल्हुआ खुदाई के बहुमूल्य अवशेष हैं जहां आना ही अपने आप में इतिहास में खो जाना है।
आप आगे कहते हैं कि यहां दुकानों में टेक्स्ट बुक और कंपटीशन की किताबें मिलेंगी, पढ़ने की किताबें नहीं, आपको एक बार पटना के साथ विभिन्न जिलों में लगने वाले बुक फेयर में आना चाहिए। आपने आगे अपनी अज्ञानता प्रदर्शित करते हुए कहा है कि यहां अपसंस्कृति ऐसी है कि बिहार का कोई अपना नृत्य नहीं है, संगीत नहीं है जबकि बिहार की नृत्य और संगीत शैली का इतिहास ही नहीं वर्तमान भी समृद्ध है, जो यहां की वैदिक संस्कृति, कृषि जीवन और लोक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
बिहार की नृत्य शैली में सबसे महत्वपूर्ण कथक नृत्य है, जिसका जन्म ही बिहार में हुआ है। कथा को नृत्य शैली में कहने वाले कथकिए कहलाए। गया में कथक बिगहा और कथकपुर गांव है, जो आज भी अपनी परंपरा आगे बढ़ा रहे हैं। सारण में भी कथक की जड़ें गहरी रही हैं। इसके लिए आप शोभना नारायण की किताब पढ़ सकते हैं।
इसके अलावा बिहार के लोक नृत्य तो बरसों से यहां के त्योहारों, बदलते मौसम और सामाजिक रीति-रिवाजों को दर्शाते रहे हैं। जट-जटिन, बिदेसिया, झिझिया, जीतिया, झूमर, कजरी नृत्य, डोमकच जैसी नृत्य शैलियां हैं।
अब आइए बिहार की संगीत परंपरा पर। इसके लिए मैं आपको गजेंद्र बाबू की किताब पढ़ने की सलाह दूंगा। गयाजी, दरभंगा, बेतिया घरानों ने न केवल ध्रुपद बल्कि ठुमरी और कजरी को भी अपनी प्रतिभा से थाम रखा है।
बिहार के लोक गीतों को ले लीजिए, यहां बच्चों के जन्म पर ‘सोहर’ गाया जाता है। वहीं शादियों के दौरान ‘विवाह गीत गाए जाते हैं। चैत के महीने में गाए जाने वाले ‘चैता’, सावन के महीने के ‘कजरी’ और होली के समय गाए जाने वाले ‘फाग’ या ‘फगुआ’ यहाँ बेहद लोकप्रिय हैं। पर्व गीत भी खूब हैं, बिहार के सबसे बड़े महापर्व छठ के गीत पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं, गाथा गीत हैं जिसमें ऐतिहासिक और वीर पुरुषों की कहानियों को गीतों के माध्यम से सुनाया जाता है, जैसे वीर लोरिक की कथा, ‘कुंवर सिंह की गाथा’, राजा सहलेस और अन्य कई हैं।
बहुत सारी बातें आपने कही है, लेकिन इतना ही सुनकर आगे छोड़ दिया। उम्मीद है कि श्री कमेलश सिंह आगे से कुछ भी बोलने के पहले थोड़ा गूगल ही कर लेंगे। तथ्यों के साथ बात करें लेकिन गाली देने के लिए और इसके सहारे व्यू पाने के लिए ऐसा करेंगे यह आपको शोभा नहीं देता है। कमियां सब जगह होती है लेकिन उसके सहारे एक सामान्यीकरण मत करिए। अंत में मैथिलीशरण गुप्त जी की पंक्तियों के साथ अंत करूंगा कि जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।
आपका एक दर्शक जो अब से आपका दर्शक नहीं है।
- रविशंकर उपाध्याय


