एक लंबा सफर… अब अलविदा | 2009 से 2026 तक की मेरी 18 वर्षों की यात्रा
कभी-कभी जिंदगी में कुछ सफर ऐसे होते हैं, जिन्हें सिर्फ नौकरी कहना उस सफर के साथ नाइंसाफी होती है।
IBN7 से शुरू हुआ मेरा यह सफर News18 India और News18 Uttar Pradesh तक पहुंचा। नाम बदलते रहे, संस्थान का स्वरूप बदलता रहा, लेकिन इस संस्थान से मेरा रिश्ता और मेरी प्रतिबद्धता हमेशा वही रही।
करीब 18 वर्षों तक इस संस्थान के साथ काम करना मेरे पेशेवर जीवन का सिर्फ एक अध्याय नहीं, बल्कि मेरी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा रहा है।
इन वर्षों में मैंने पत्रकारिता को सिर्फ पेशे के तौर पर नहीं जिया, बल्कि उसे अपनी जिम्मेदारी समझकर निभाया। संघर्ष देखे, सफलता देखी, उतार-चढ़ाव देखे, सत्ता के गलियारों को करीब से देखा और जमीन पर खड़े उस आम आदमी की आवाज बनने की कोशिश की, जिसकी आवाज अक्सर ताकतवर लोगों के शोर में दब जाती है।
इस लंबे सफर में जिन वरिष्ठों के मार्गदर्शन में काम करने का अवसर मिला, उनमें आदरणीय शलभ मणि त्रिपाठी जी, आदरणीय मनोज राजन त्रिपाठी जी, आदरणीय मनमोहन राय जी, आदरणीय अरुण पांडे जी और आदरणीय राजन अग्रवाल जी का मेरे जीवन में विशेष स्थान रहेगा।
इन सभी ने मुझे अवसर दिया, भरोसा किया, सिखाया और आगे बढ़ने की राह दिखाई। उनके स्नेह, मार्गदर्शन और विश्वास के लिए मैं हमेशा उनका ऋणी रहूंगा।
मैंने भी अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार संस्थान के लिए पूरी ईमानदारी, मेहनत और निष्ठा से काम करने की कोशिश की। गलतियां मुझसे भी हुई होंगी, कमियां भी रही होंगी, लेकिन मेरी नीयत कभी गलत नहीं रही।
क्योंकि पत्रकारिता में सबसे बड़ी पूंजी आपकी नीयत होती है।
मेरे साथ काम करने वाले तमाम साथियों ने मुश्किल वक्त में जिस तरह मेरा साथ दिया, उसे मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकता।
लेकिन आज…
इस लंबे सफर पर विराम लग रहा है।
मैं अपने किसी बॉस, वरिष्ठ या संस्थान के किसी व्यक्ति को इस फैसले के लिए दोषी नहीं ठहराता। संस्थानों के अपने व्यावसायिक फैसले होते हैं, अपनी परिस्थितियां होती हैं और हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों तथा सीमाओं के भीतर काम करता है।
लेकिन एक सवाल है, जिसका जवाब शायद मेरे पास भी नहीं है।
मुझे बताया गया कि मैं एक यूट्यूब चैनल चलाता हूं, इसलिए मुझ पर कार्रवाई की गई है। लेकिन बड़े-बड़े संस्थानों में और जिस संस्थान में मैं काम कर रहा हूं, उसमें भी बहुत से लोग यूट्यूब चलाते हैं। नाम नहीं लिखना चाहता। जबकि मैंने एग्रीमेंट में अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म का जिक्र किया था। उस समय क्यों एग्रीमेंट कर दिया गया था? अब 9 महीने बाद क्यों याद आया? मेरे ऊपर केवल……?
लेकिन मेरे ऊपर कार्रवाई के पीछे की कहानी कुछ और है।
क्या पत्रकारिता की कीमत अब इतनी हो गई है कि सत्ता के एक इशारे पर एक पत्रकार का 18 वर्षों का सफर खत्म किया जा सकता है?
मेरे लिए सबसे ज्यादा पीड़ा नौकरी जाने की नहीं है।
पीड़ा इस बात की है कि जिस संस्थान को करीब दो दशक तक अपना समझकर काम किया, वहां मेरे सफर का अंत पत्रकारिता के किसी फैसले से नहीं, बल्कि कथित राजनीतिक दबाव के साये में हुआ।
और यहीं से यह विदाई मेरे लिए सिर्फ एक नौकरी छोड़ने की कहानी नहीं रह जाती।
यह उस दौर की कहानी बन जाती है, जहां धनबल, राजनीतिक प्रभाव और सत्ता की ताकत के सामने पत्रकार की कलम को कमजोर करने की कोशिश की जा सकती है।
मैंने जिस खबर को चलाया था, वह किसी व्यक्तिगत दुश्मनी का हिस्सा नहीं थी। वह एक जनप्रतिनिधि से जुड़ा एक सवाल था—एक विधायक के सैकड़ों एकड़ के फार्म पर गरीबों के लिए मिलने वाली विधायक निधि से लाइट से जुड़ी खबर से जुड़ा है।
खबर छपी।
सवाल उठे।
और उसके बाद मुझे कई बार जान से मारने की धमकियां भी मिलीं।
लेकिन मैं तब भी नहीं झुका।
क्योंकि मेरा मानना था कि पत्रकार का काम किसी के पक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि सवाल पूछना है।
आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है—
मैं तो सिर्फ एक स्ट्रिंगर था।
जिस सत्ता ने बड़े-बड़े आंदोलनों को कुचलते देखा है, उसके सामने मेरी हैसियत आखिर कितनी थी?
लेकिन मेरी लड़ाई कभी किसी व्यक्ति से नहीं थी।
मेरी लड़ाई उस सोच से थी, जिसमें यह मान लिया जाता है कि जिसके पास सत्ता है, उसके खिलाफ सवाल पूछने की कीमत किसी पत्रकार को अपनी रोजी-रोटी से चुकानी पड़ेगी।
और शायद सबसे बड़ी चिंता यही है कि आज जिस राजनीतिक प्रभाव और ताकत के सामने मेरा यह सफर खत्म हुआ है, उसकी पहुंच मेरे आने वाले जीवन में भी मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
मैं यह बात डराने के लिए नहीं लिख रहा।
मैं इसे इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि जो आशंका आज मेरे मन में है, उसे छिपाकर मुस्कुराते हुए विदा लेना मेरे स्वभाव में नहीं है।
मुझे पहले भी धमकियां मिलीं।
लेकिन वे अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हुए।
अब डर सिर्फ इतना है कि कहीं मेरे इस नए दौर में वे मंसूबे फिर से मेरे सामने खड़े न कर दिए जाएं।
फिर भी…
मैं डरकर अपनी कलम की कीमत नहीं बदलूंगा।
मेरे लिए पत्रकारिता सिर्फ नौकरी नहीं थी।
यह मेरी पहचान थी।
और पहचान किसी संस्थान के साथ खत्म नहीं होती।
एक संस्थान नौकरी खत्म कर सकता है, पत्रकार की आवाज नहीं।
आज मैं जा रहा हूं।
लेकिन अपने साथ हार लेकर नहीं जा रहा।
मैं अपने साथ लेकर जा रहा हूं—
18 वर्षों का अनुभव, हजारों खबरों की यादें, संघर्षों से मिली सीख, अपने साथियों का प्यार, वरिष्ठों का मार्गदर्शन और वह आत्मसम्मान, जिसे मैंने किसी कीमत पर गिरवी नहीं रखा।
मुझे गर्व है कि मैंने अपने पत्रकारिता जीवन में हर खबर के पीछे खड़े होकर यह कोशिश की कि जो देखा, उसे सच के जितना करीब हो सके, उतना सामने रखा जाए।
हो सकता है मेरी आवाज छोटी रही हो।
हो सकता है मेरी पहुंच सीमित रही हो।
लेकिन मेरी नीयत कभी छोटी नहीं रही।
और शायद यही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है।
मैं किसी के प्रति व्यक्तिगत कड़वाहट लेकर नहीं जा रहा।
समय अपना फैसला खुद करता है।
आज किसी के पास सत्ता है, किसी के पास ताकत है, किसी के पास संसाधन हैं।
लेकिन इतिहास में आखिर बचता क्या है?
किसने सच के साथ खड़े होने की कोशिश की और किसने ताकत के सामने घुटने टेक दिए—बस यही।
मुझे नहीं पता आने वाला समय मेरे लिए कितना कठिन होगा।
शायद रास्ते आसान नहीं होंगे।
शायद नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ेगी।
शायद कुछ दरवाजे बंद मिलेंगे।
शायद कुछ लोग दूरी बना लेंगे।
और शायद आने वाले दिनों में मुझे उन लोगों की ताकत का सामना भी करना पड़े, जिनके सामने आज यह सफर खत्म हुआ है।
लेकिन एक बात तय है—
मैं अपना आत्मसम्मान नहीं छोड़ूंगा।
मेरी कलम बिकेगी नहीं।
मेरी आवाज दबेगी नहीं।
और पत्रकारिता मेरे लिए सिर्फ किसी चैनल का लोगो या किसी संस्थान का आईडी कार्ड नहीं है।
पत्रकारिता मेरे भीतर है।
आज एक संस्थान से रिश्ता खत्म हो रहा है।
लेकिन पत्रकारिता से मेरा रिश्ता खत्म नहीं हो रहा।
मैं अपने सभी वरिष्ठों, सहयोगियों, पत्रकार मित्रों और संस्थान से जुड़े हर उस व्यक्ति का दिल से शुक्रिया अदा करता हूं, जिसने इस 18 साल लंबे सफर में मेरा हाथ थामा।
आप सभी मेरी जिंदगी का हिस्सा रहेंगे।
और हां…
यह अंत नहीं है।
यह सिर्फ एक पड़ाव है।
एक नया सफर शुरू होगा।
रास्ते शायद कठिन होंगे।
चुनौतियां शायद पहले से बड़ी होंगी।
लेकिन जिंदगी ने मुझे एक बात सिखाई है—
सच का रास्ता कभी आसान नहीं होता, लेकिन वही रास्ता सबसे ज्यादा सुकून देता है।
आज मैं पीछे नहीं हट रहा।
मैं सिर्फ दिशा बदल रहा हूं।
कहीं न कहीं, किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।
तब शायद पीछे मुड़कर देखूंगा तो आज का यह दर्द भी मेरी जिंदगी की एक कहानी बन चुका होगा।
और शायद तब मैं मुस्कुराकर कह सकूंगा—
मैंने बहुत कुछ खोया था, लेकिन अपनी कलम नहीं खोई।
इस सफर को तहेदिल से शुक्रिया।
IBN7 से News18 तक…
2009 से 2026 तक…
18 वर्षों की इस यात्रा को मेरा सलाम।
अलविदा।
सादर,
मनोज शर्मा
लखीमपुर खीरी



