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पिछले दो-तीन दिनों में जिस एक चीज ने मुझे सबसे ज्यादा खुशी दी है, वह है ज़्याँ द्रेज़ का वायरल होना!

Smiling man with a beard and plaid shirt eats a meal served on a large green banana leaf plate.
Three men posing and smiling inside a shop, one holding a backpack with shelves of snacks behind them

रोहिण कुमार-

पिछले दो-तीन दिनों में जिस एक चीज ने मुझे सबसे ज्यादा खुशी दी है, वह है ज़्याँ द्रेज़ का वायरल होना। हमारे बेहद प्यारे प्रोफेसर और साथी। उस रिपोर्टर का भला हो जिसने ज्याँ से पूछा – “तुम कौन हो भाई? प्रदर्शन में क्यों आए हो?” उसके सवाल से मुझे क्लिक हुआ कि शायद बहुत से लोग, जो सोशल साइंस या डेवलपमेंट इकॉनोमिक्स से वाकिफ़ न हो, वो ज़्याँ के वायरल होने पर जान पा रहे होंगे।

हम सब एक तरह से ज्याँ के स्टूडेंट रहे हैं। उनके लेख और किताबें हमारे कोर्स का हिस्सा रहे हैं। हममें से कइयों को उनको करीब से जानने, उनके साथ काम करने का मौका मिला है। वो पब्लिक इंटिलेक्चुकल तो हैं ही। वो एक बेहद सौम्य और डेडिकेटेड बुद्धिजीवी हैं। समय के पाबंद व्यक्ति। कोई अहंकार नहीं। उनका इंटिलेक्ट जनता के लिए है।

वो कितने शानदार प्रोफेसर हैं, उसका एकाध उदाहरण देता हूँ आपको –

ज्याँ मेरी नई किताब ‘दिल्ली अभी दूर है’ के लिए फोरवर्ड लिख रहे थे। उन्होंने मुझसे कहा था कि स्कूल ऑडिट से फ्री होकर वो मुझे एक नोट भेजेंगे। इसी बीच उनकी माँ का देहांत हो गया। उन्हें फौरन बेल्जियम जाना पड़ा। उन्होंने सुबह के 3:45 में मुझे संदेश भेजा – “रोहिण, मुझे अचानक बेल्जियम जाना पड़ रहा है। मैं रास्ते से कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ।” इस तरह का कमिटमेंट है उनका अपने काम के प्रति। मैंने ऐसी जबावदेही शायद ही देखी है।

वर्ष 2022 की बात होगी। मैं मिलेट्स पर काम कर रहा था। सरकार ने 2023 को इंटरनेशनल इयर ऑफ मिलेट घोषित किया था। उन्होंने मुझसे पूछा – “क्या आप मुझे झारखंड में मिलेट की उपलब्धता और अगर इसे पीडीएस में शामिल करना हो तो उससे कुपोषण पर क्या असर होगा, इससे जुड़ा कुछ नोट भेज पाएंगें?” बाद में वह हमारे कार्यक्रम में भी आए। बारिश के बावजूद बिल्कुल समय से। इनफैक्ट बतौर आयोजक हमने लेट शुरू किया।

Group of seven people posing for a photo in a hallway, some wearing badges and lanyards, smiling at the camera.
Hindi text page from a book with several paragraphs; mentions reading, a final note about Delhi and a signature at the bottom reading 'रोहिण कुमार'

उसी कार्यक्रम में मैंने उनसे रिक्वेस्ट किया कि आप भी अपनी बात रखें। उन्होंने मना कर दिया। कहा कि इस कार्यक्रम में मैं सिर्फ सुनना चाहता हूँ। दयामनी बारला दीदी की ओर इशारा करते हुए कहा कि दयामनी जी को सुनेंगे।

मैं इस मामले में खुद को बहुत लकी मानता हूँ कि मुझे ज्याँ, जेम्स, वंदना, वीणा शत्रुघ्ना, कविता कुरूगंती आदि लोगों के साथ काम करने के मौके मिले हैं। यही कारण है कि मुझे पर्सेपेक्टिव बिल्डिंग के लिए तथाकथित थिंक टैंक्स के भरोसे नहीं रहना पड़ता। न ही पत्रकारों के।

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