जंतर मंतर पर पत्रकार ज्यां द्रेज से पूछ रहा, “भाई साब आप हो कहां से, व्हेअर आर यू कम फ्रॉम?
-क्रितीश भट्ट
राजू सजवान-
कल के प्रोटेस्ट के दौरान ज्यां द्रेज से जिस तरह का सवाल पूछा गया कि आप कहां से आए हैं? यह सवाल बेशक समझदार पत्रकारों को शर्मसार कर रहा है, लेकिन इसमें गलती अकेले फील्ड रिपोर्टर की नहीं है।
एक पुराना किस्सा है। करीब 20 साल पुराना। कमलेश्वर जी का देहांत हो गया था। उनके घर पर लोगों की भीड़ लगी थी। पत्रकार और साहित्यकार सब पहुंचे हुए थे। उनमें से एक मैं भी था।
वहां कुछ नए पत्रकार भी थे, जो रिपोर्टिंग के लिए आए थे। उस समय यूट्यूबर्स और फ्रीलांसर्स का इतना शोर नहीं था। एक बड़े चैनल की नई रिपोर्टर मेरे पास आई और पूछने लगी कि जिनकी मौत हुई है, वे कौन थे?
मैंने उसे थोड़ा गौर से देखा और बिना कोई जवाब दिए आगे बढ़ गया।
अब बताइए, गलती किसकी थी? उस रिपोर्टर की या उस संपादक की, जिसने न केवल उसका चयन किया, बल्कि उसे इस असाइनमेंट पर भेज भी दिया?
दरअसल, पत्रकारों ने पढ़ना छोड़ दिया है।
जिस पत्रकार ने ज्यां द्रेज से यह सवाल पूछा, अगर उसने पिछले एक साल के दौरान ढंग से—मतलब, सचमुच ढंग से—अखबार पढ़े होते, तो वह ज्यां द्रेज के बारे में जरूर जानता। लेकिन पत्रकार अब पढ़ते ही कहां हैं!
खासकर आजकल के उन यूट्यूबर्स को देखिए, जो सिर्फ कैमरा और माइक लेकर सड़क पर निकल पड़ते हैं। ऐसा लगता है कि वे सुबह उठते ही माइक लेकर निकल पड़ते हैं। न तो कोई खबर पढ़ते हैं, न अखबारों पर नजर डालते हैं और न ही किसी गंभीर न्यूज चैनल को देखते हैं।
पत्रकारिता सिर्फ कैमरा और माइक लेकर सड़क पर उतर जाने का नाम नहीं है। इसके लिए पढ़ना, जानना और अपने आसपास की दुनिया को समझना भी जरूरी है।
और यह जिम्मेदारी सिर्फ रिपोर्टर की नहीं, उस संपादक की भी है, जो उसे किसी असाइनमेंट पर भेजता है।
दीपांकर-
सिटीजन जर्नलिज्म से इतर: बार काउंसिल एक्जामिनेशन की तरह ही ऑल इंडिया प्रेस एक्जामिनेशन की अनिवार्यता को खुद को पत्रकार घोषित करके वालों के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए.
जर्नलिज्म को थोड़ा सा प्रोफेशनल बनाने के लिए ये जरूरी है. पत्रकारिता में डिग्री, डिप्लोमा, सर्टिफिकेट धारण करने वालों के लिए एक्जाम करवाओ, एक्जाम पास करने का सर्टिफिकेट दो. अगर कोई कंटेंट क्रिएटर है तो एक्जाम की जरूरत नहीं है, लेकिन यूट्यूब चैनल खोलकर खुद को पत्रकार-पत्रकार, जनता की आवाज टाइप चिल्लाने वालों के लिए कोई एक व्यवस्था तो होनी चाहिए?
यूट्यूब पर पत्रकारिता करने वाला भी सीना ठोंक कर कहेगा कि मैंने ऑल इंडिया प्रेस एक्जामिनेशन पास किया है, पत्रकारिता करने का प्रोफेशनल और सरकारी सर्टिफिकेट ये रहा.
यहां तो हाल ये है कि अपने यूट्यूब चैनल पर हर तिमाही जीडीपी उठाने-गिराने वाला यूट्यूब का पत्रकार ज्यां द्रेज को जाने या न जाने उसके पत्रकारिता के कौशल पर झां@ बराबर प्रश्नचिन्ह नहीं खड़ा होगा.

यही इस पेशे की असफलता है. अभी ये पेशा है नहीं दरअसल, ये बुनियादी रुप से ये एक दलाली बन चुका है जिसमें कुछ पेशेवर लोग भी काम करते हैं. कुछ क्रांति भी करते हैं.
कुछ पैसे लेकर यूट्यूब पर ऐजेन्डा चलाते हैं. ये सब एक सर्टिफिकेट से खत्म नहीं होगा, तब भी ये रहेगा. लेकिन सच में स्वतंत्र पत्रकारिता करने वालों को एक प्रोफेशनल ठप्पा मिलेगा, जो उनको एकजुट बनाने में थोड़ा आर्गेनाइज सेक्टर के रूप में विकसित होने में मदद करेगा.
आपने देखा ही है कि करोड़ों के पैकेज की एक टीवी एंकरा “शिक्षा” शब्द को लाइव टेलीविजन पर कभी शीछा लिखती है कभी शीक्षा लिखती है, कभी मिटाती है.
लाखों के पैकज का टीवी एंकर गैस सिलेंडर के 962 रुपए के दाम को 430 रुपए के गैस सिलेंडर से सस्ता बोलता है, परसेंटेज निकाल कर सस्ता दिखाता है. इस पेशे में लंठ और अनपढ़ हो जाना एवरेज सक्सेस पाने की गारंटी है.
सोचिए शाम को हिंदू मुस्लिम करने वाले करोड़ों के पैकेज के एंकर ऑल इंडिया प्रेस एक्जामिनेशन पास ही न कर पाएं तो? दूसरे दिन से लंठई बंद, कुछ किताब वगैरह पढ़ेंगे, छह महीने, कोचिंग का महत्व भी समझ जाएंगे.
इसलिए पत्रकारिता करने वाले सभी यूट्यूबरों को अपनी तरफ से ही एक स्वतंत्र बॉडी बनाकर इस तरह के एक्जाम का सिस्टम विकसित करने का सरकार पर दबाव बनाना चाहिए. बहुत फायदा होगा आप लोगों का.
अभी पुलिस आपको प्रेस कार्ड दिखाने पर भी पत्रकार नहीं मान रही, और हो क्यों न, कल तक तक सड़क पर रील बनाने वाला लौंडा किसी यूट्यूबर के पास जाकर एक प्रेस कार्ड ले लेता है, और खुद को पत्रकार घोषित कर लेता है, पुलिस को प्रेस कार्ड दिखाने लगता है. सबको पता है वो क्या है.
नागरिक पत्रकारिता की अपनी जगह है, लेकिन नागरिक को कोई कहां बैठा रहा प्रेस गैलरी में? नागरिक और तथाकथित प्रोफेशनल पत्रकार का अंतर तो वैसे ही है, पहले से है.
संसद भवन की प्रेस गैलरी में नागरिक पत्रकारिता करने वाला पहुंच जाएगा? बताइए? अंतर पहले से ही है, आप लोग बेवजह डर रहे हैं कि इस एक्जाम से तो सरकार का कंट्रोल पत्रकारिता पर बढ़ जाएगा.
ऑल इंडिया प्रेस एक्जामिनेशन का फायदा ये होगा कि आपको थोड़ा सीरियसली लिया जाएगा हां संसद भवन में भले ही एंट्री न मिले लेकिन आपको संगठित होने में मदद मिलेगी.
आप लोग भी इसी बहाने थोड़ मीडिया लॉ, अर्थशास्त्र वगैरह पढ़ लेंगे, फिर आपके किसी साथी को ज्यां द्रेज से ये पूछने की जरूरत नहीं होगी कि कौने देश से आइल हो बबुआ, नाम का है?



