Connect with us

Hi, what are you looking for?

वेब-सिनेमा

बेड़ियों में पत्रकारिता : मामला अब निर्णायक मोड़ पर है!

महेंद्र कुशवाहा-

महाभारत के यक्ष-प्रसंग में सरोवर का जल पीने से पहले प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते हैं। जो उत्तर टाल देता है, उसकी प्यास बुझती नहीं। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) कानून को लेकर आज भारतीय लोकतंत्र के सामने भी ऐसे ही प्रश्न खड़े हैं। इनका उत्तर संसद, सरकार और सर्वोच्च न्यायालय को देना है, क्योंकि प्यास आम नागरिक की है, यानी जानने के उसके अधिकार की।

मामला अब निर्णायक मोड़ पर है। नेटवर्क18, एनडीटीवी, द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे 21 प्रमुख समाचार प्रकाशकों के संगठन डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में 698 पन्नों की याचिका दाखिल की। उसकी सुनवाई आज, 27 अक्टूबर को सूचीबद्ध है। इससे पहले फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इसी कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र को नोटिस जारी किया था, पर कानून पर रोक नहीं लगाई थी। विवादित प्रावधान मई 2027 से पूरी तरह प्रभावी होने हैं, यानी समय कम है।

पहला प्रश्न: यह कानून किसकी निजता बचा रहा है?
नागरिक का डेटा सुरक्षित होना ही चाहिए। ऐप, बैंक, बीमा कंपनियां और विज्ञापन उद्योग हमारी जानकारी से कारोबार करते हैं, और इस पर लगाम जरूरी है। लेकिन जब कोई भ्रष्ट अधिकारी, दागी ठेकेदार या सत्ता में बैठा व्यक्ति “मेरा निजी डेटा” कहकर खुद को सवालों से बाहर कर ले, तब क्या निजता नागरिक का अधिकार रह जाती है, या ताकतवर का कवच बन जाती है? निजता आम आदमी की रक्षा के लिए है। उसे सार्वजनिक आचरण पर पर्दा डालने का औजार नहीं बनना चाहिए।

दूसरा प्रश्न: पत्रकार और डेटा कारोबारी एक तराजू पर क्यों?
कानून की भाषा में जो निजी डेटा का प्रसंस्करण करता है, उस पर सहमति और अनुपालन के दायित्व आते हैं। रिपोर्टिंग में पत्रकार नाम, पते, दस्तावेज और बैंक विवरण खंगालता है। DNPA का तर्क है कि पत्रकार हर बार उन्हीं लोगों से सहमति नहीं ले सकता, जिनकी जांच कर रहा है, क्योंकि इससे सबूत मिटाने और गवाहों को डराने का रास्ता खुल सकता है। एक ऐप का काम डेटा से मुनाफा कमाना है और पत्रकार का काम सच उजागर करना। दोनों को एक श्रेणी में रखना क्या न्यायसंगत है? याद रहे कि 2018, 2019 और 2021 के विधेयकों में पत्रकारिता को कुछ दायित्वों से छूट दी गई थी। अंतिम कानून तक आते-आते वह स्पष्टता क्यों बची नहीं?

तीसरा प्रश्न: मिटाने का अधिकार, खबर मिटाने का हथियार तो नहीं?
कानून नागरिक को सहमति वापस लेने और डेटा मिटवाने का अधिकार देता है। याचिका की आशंका यह है कि जांच का विषय बना व्यक्ति इसी अधिकार का सहारा लेकर प्रकाशित खबर हटवाने या बदलवाने का दबाव बना सकता है, जबकि वह खबर तथ्यों पर टिकी हो। याचिका इसे “प्री-सेंसरशिप” कहती है। जो खबर प्रकाशित होकर सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुकी है, क्या उसे निजता के नाम पर मिटाया जा सकता है?

चौथा प्रश्न: सूत्र की पहचान की गारंटी कौन देगा?
पत्रकार और सूत्र का रिश्ता भरोसे पर टिका है। कानून आगे चलकर केंद्र सरकार को किसी भी डेटा-प्रसंस्करण संस्था से मांगी गई जानकारी देने का आदेश देने की शक्ति देता है। आशंका है कि इस शक्ति के जरिए न्यूज़रूम को अपने सूत्र बताने पड़ सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पेगासस मामले में खुद पत्रकारीय स्रोतों की सुरक्षा को प्रेस की स्वतंत्रता की बुनियादी शर्त माना था। जब किसी सरकारी कर्मचारी को लगेगा कि उसके दिए दस्तावेज का सुराग कभी भी निकल सकता है, तो वह चुप रहना चुनेगा। तब खबर नहीं मरेगी, खबर देने की हिम्मत मरेगी।

पांचवां प्रश्न: सूचना का अधिकार कहां गया?
इस कानून ने आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) में भी बदलाव किया है। इसी के जरिए नागरिक पूछ पाते थे कि राशन किसे मिला, पेंशन किसके खाते में गई, नियुक्ति किन आधारों पर हुई। आशंका है कि “व्यक्तिगत जानकारी” की आड़ में अब हर जवाब रोका जा सकेगा। आरटीआई से निकली ज्यादातर खबरें जिला और कस्बे के उन पत्रकारों ने लिखी हैं, जिनके पास वकीलों की फौज नहीं होती। यह दरवाजा संकरा हुआ, तो सबसे पहले वही बाहर होंगे।

छठा प्रश्न: जो पत्रकारिता से भी पूछा जाना चाहिए?
ईमानदारी का तकाजा है कि यक्ष केवल सरकार से नहीं, पत्रकारिता से भी प्रश्न करे। क्या हर बार निजी जानकारी उजागर करना जनहित में था? क्या सनसनी के लिए किसी की निजी जिंदगी कभी नहीं खंगाली गई? क्या मीडिया ट्रायल और चरित्र हनन की शिकायतें पूरी तरह निराधार हैं? सरकार का पक्ष भी यही है कि कानून का मकसद व्यक्तिगत डेटा की रक्षा और उसे संभालने वालों की जवाबदेही तय करना है। अगर पत्रकारिता अपने लिए छूट चाहती है, तो उसे जवाबदेही का ढांचा भी स्वीकार करना होगा। छूट तभी नैतिक होगी, जब उसके साथ जिम्मेदारी भी दिखे।

सातवां प्रश्न: छोटे पत्रकार का क्या होगा?
नेटवर्क18, एनडीटीवी, इंडियन एक्सप्रेस या टाइम्स इंटरनेट जैसे समूहों के पास अनुपालन अधिकारी और कानूनी विभाग हैं। स्वतंत्र पत्रकार, यूट्यूबर, छोटे वेब पोर्टल और जिला स्तर का संवाददाता क्या करेगा? सहमति के प्रारूप भरना, शिकायत निवारण की व्यवस्था रखना और भारी जुर्माने का जोखिम उठाना उसके बस की बात नहीं। कानून की मार अक्सर सबसे कमजोर पर पहले पड़ती है, और सबसे ज्यादा असर वहीं होता है जहां से लोकतंत्र की जड़ों तक खबर पहुंचती है।

समाधान क्या हो?
रास्ता निजता और पत्रकारिता के बीच चुनाव का नहीं है। कानून में जनहित की पत्रकारिता के लिए स्पष्ट और सीमित छूट हो, जैसी यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और सिंगापुर में है। उसके साथ शर्त हो कि जनहित से परे जानकारी का दुरुपयोग न हो। स्रोतों की गोपनीयता को सीधी सुरक्षा मिले और सरकारी मांग पर न्यायिक निगरानी रहे। आरटीआई में जनहित की कसौटी बहाल हो और निगरानी संस्था की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो। साथ ही पत्रकारिता खुद कड़े आचार मानक तय करे।

यक्ष के सामने युधिष्ठिर ने कहा था कि धर्म का तत्व गुफा में छिपा है। लोकतंत्र का तत्व भी आज उन्हीं सवालों में छिपा है, जो पूछे जाने चाहिए। अगर पत्रकार को हर प्रश्न से पहले अनुमति, हर दस्तावेज से पहले भय और हर सूत्र से पहले संदेह का हिसाब लगाना पड़े, तो सरोवर तो रहेगा, पर उसका जल पीने की हिम्मत किसी में नहीं बचेगी। सुप्रीम कोर्ट के सामने कसौटी यही है कि निजता भी बची रहे और प्रश्न पूछने का साहस भी।

संबंधित खबर…

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन