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आज के अखबार : दिल्ली में फिर बिल्डिंग गिरी, दो मरे; अकेले TOI ने लीड बनाया, HT ने ‘अवैध’ लिखा है….

Entrance to the Election Commission of India with security guards; a blue banner reads 'Key changes in ECI's work order' alongside a newspaper headline about Goa voter rolls.

मामला राहुल गांधी के विदेशी संपर्कों से संबंधित आरोप का था। राहुल गांधी ने कहा है “मोदी जी, इस देश से झूठ बोलना बंद कीजिए। आप विदेशी मदद से प्रधानमंत्री बने। और विदेशी मदद से ही प्रधानमंत्री बने हुए हैं। आपकी आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह विदेशियों के नियंत्रण में और समर्थन से है। विदेशी सोशल मीडिया पूरी तरह आपके साथ खड़ा है। मैं आपको इस मुद्दे पर खुली बहस की चुनौती देता हूं। कोई भी मंच, किसी भी समय। हिम्मत है तो आइए। आप नहीं आएंगे, क्योंकि जो मैं आपके बारे में जानता हूं आप उससे डरते हैं।”  

अखबार यह सब नहीं बताएंगे। बताया है कि अमित शाह एसआईआर पर भी संसद में चर्चा के लिए तैयार हैं। चुनाव आयोग ने ढेरों यू-टर्न लिए हैं तब भी। तमाम मंतरी-संतरी सोशल मीडिया पर लगे हुए हैं। उन्होंने कहा है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर विशेष सत्र बुलाने की मांग करें। सरकार तैयार है। कांग्रेस को झूठ बोलना बंद करना चाहिए और संसद में चर्चा से भागना नहीं चाहिए। इसका जवाब सोशल मीडिया पर उपलब्ध एक वीडियो में है। 10 दिसंबर 2025 को अमित शाह ने संसद में कहा था कि एसआईआर पर संसद में चर्चा नहीं हो सकती है।

संजय कुमार सिंह

आज मेरे दो अखबारों – अमर उजाला और दैनिक भास्कर की लीड शेयर बाजार की खबर है। इन खबरों के अनुसार सेनसेक्स 8.3 प्रतिशत या 2009 अंक चढ़ा। हिन्दुस्तान टाइम्स, देशबन्धु और नवोदय टाइम्स की लीड सुप्रीम कोर्ट की खबर हैं। इनमें एक, देशबन्धु की खबर पांच कॉलम में छपी है। इसका शीर्षक है, हिरासत के बाद 24 घंटे में पेशी जरूरी। उप शीर्षक में इसे और स्पष्ट किया गया है – पहले हिरासत में लेकर बाद में गिरफ्तारी दर्ज करने का रास्ता नहीं अपना सकतीं एजेंसियां। कहने की जरूरत नहीं है कि यही नियम है, स्पष्ट है और लंबे समय से है। इस सरकार में एजेंसियां मनमानी करती रही हैं इसलिए यह आदेश या स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है। इसके मायने भी हैं और इसीलिए लीड है। अमूमन सुप्रीम कोर्ट की खबरें एक साथ छपती रही हैं। इसलिए बाकी के दो अखबारों, हिन्दुस्तान टाइम्स और नवोदय टाइम्स की लीड भी यहां है, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को दिया भरोसा। जातिगत भेदभाव विरोधी नियमों की होगी समीक्षा। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है – सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा : यूजीसी के जातिगत समानता नियमों की समीक्षा की जाएगी।

आप दोनों खबरों को प्रमुखता दिए जाने का अंतर समझ सकते हैं। तीनों अखबारों में एक ही खबर को महत्ता दी गई होती तो मुझे इसे रेखांकित करने की जरूरत नहीं होती। इसी तरह, द हिन्दू की एक खबर के अनुसार नगा समूहों ने प्रधानमंत्री मोदी से अपील की है कि मणिपुर संकट का राजनीतिक समाधान सुरक्षित करें। आप जानते हैं कि मणिपुर की खबरें दिल्ली में नहीं के बराबर छपती हैं और मणिपुर तीन साल से ज्यादा समय से अशांत चल रहा है। भारत का ही हिस्सा है और नरेन्द्र मोदी की गढ़ी हुई छवि के लिहाज से मणिपुर की खबरें उन्हें अक्षम और अयोग्य (या अनिच्छुक) बताती हैं इसलिए इन्हें दिल्ली में महत्व नहीं दिया जाता है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि पत्रकारिता या अखबार निकालने का मकसद ही विज्ञापन बटोरना और उससे कमाना है। इसलिए दिल्ली में बिल्डिंग गिरने से दो लोगों की मौत और सात लोगों को मलबे से निकाल लिए जाने की सूचना अभी भी पहले पन्ने की निर्विवाद नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे लीड बनाया है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। हालांकि, शीर्षक में ही लिखा है कि बिल्डिंग ‘अवैध’ थी। अवैध बिल्डिंग गिरने से किसी की मौत वैध या जायज नहीं हो जाएगी और इसलिए यह मुद्दा ही नहीं है कि बिल्डिंग वैध थी या अवैध। मुद्दा यह है कि निर्माणाधीन बिल्डिंग भी गिरी तो क्यों? अवैध थी तो निर्माण कैसे हो रहा था? निर्माण अवैध हो पर वास्तविक तो था और मौतें तो वास्तविक है ही। दैनिक भास्कर में यह खबर सेकेंड लीड है। दि एशियन एज और द हिन्दू में भी यह खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। दि इंडियन एक्सप्रेस और कोलकाता के द टेलीग्राफ में ऐसी खबरें पहले पन्ने पर होने की उम्मीद भी नहीं थी।

खबर में बताया जाना चाहिए था कि बिल्डिंग गिरी क्यों? आवश्यक सुरक्षा की व्यवस्था थी या नहीं और जोखिम तो नहीं लिया गया – यह सही था या नहीं। संबंधित विभागों का पक्ष देने का भी रिवाज रहा है। वह भी इस खबर में नहीं है। पहले दक्षिण दिल्ली में बनी-बनाई और आबाद बिल्डिंग गिर गई थी। अब चावड़ी बाजार में निर्माणाधीन बिल्डिंग गिर गई। खबर के अनुसार सितंबर से हो रही बिल्डिंग गिरने की घटनाओं में अब तक 13 लोग मर चुके हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि सरकार ने इस मामले में क्या किए हैं। खबर यह भी होनी थी। वैसे भी, अगर कुछ किए हैं तो वह अपर्याप्त है। यह सब डबल इंजन वाली देश की राजधानी में हो रहा है। इसलिए सरकार अक्षम और अयोग्य है। क्योंकि पहले पॉश या संपन्न मानी जाने वाली दक्षिण दिल्ली में हुआ और अब पुरानी चावड़ी बाजार में हो रहा है। महीनों से चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा सरकार हेडलाइन मैनेजमेंट करती रही है। मीडिया में भी सरकार समर्थक और सरकार पोषित लोग हैं। इसलिए दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर जो खबरें हैं और नहीं हैं उनका समान महत्व है।

बिल्डिंग गिरने की लगातार हो रही घटनाओं से जाहिर है कि सरकार के पास योजना नहीं है या उसे लागू नहीं किया जा रहा है या वह प्रभावी नहीं है। अफसोस की बात यह है कि लगातार हो रहे हादसों का भी कोई असर नहीं हुआ है। केंद्र की सरकार से लेकर नगर निगम तक में एक ही राजनीतिक पार्टी का कब्जा है और उसपर बेईमानी से चुनाव जीतने का आरोप है। कोई कारण नहीं है कि मीडिया ऐसी सरकार का समर्थन या बचाव करे लेकिन वह भी हो रहा है। दूसरी ओर, सरकार ने मीडिया की नकेल तो कस ही दी है अब सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश में है। चुनाव नतीजों और सरकार की मानें तो वह लोकप्रिय बनी हुई है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, बिल्डिंग की कोई स्वीकृत योजना नहीं थी। दिल्ली पुलिस ने एमसीडी से जून में शिकायत की थी और प्रदूषण के कारण पूरे शहर में निर्माण बंद होने के बावजूद निर्माण चल रहा था। कारण चाहे जो हो तथ्य है कि कानून व्यवस्था का बुरा हाल है। गाजियाबाद (वैशाली) में भूमिगत नाली बनाने के लिए महीनों से खुदी सड़क परेशानी का कारण है। एक-दो लोग मरें या परेशान हों, खबर भी नहीं बनेगी। सरकार अपनी रफ्तार में काम करेगी।  

जहां तक बिल्डिंग बनाने के लिए मंजूरी का सवाल है, खबर के अनुसार पुलिस को सूचना थी, एमसीडी को पुलिस ने ही दी थी फिर भी निर्माण चल रहा था। गड़बड़ी सिस्टम में है और यह भ्रष्टाचार के कारण भी हो सकता है। अफसोस की बात यह है कि मीडिया उसकी रिपोर्ट नहीं करता है, पक्षपात करता है। शिकायतें सुनी नहीं जातीं और शिकायतों पर कार्रवाई की व्यवस्था नहीं है। कल की खबरों के बारे में मैंने यही लिखा था। आज भी खबरों से यही पता चल रहा है कि इस सरकार में शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती है। रिवाज ही नहीं है। गड़बड़ी ऊपर से है इसलिए हर जगह है। पहले कहीं-कहीं होती थी और पकड़े जाने पर कार्रवाई होती थी। अब बिल्डिंग गिरने के मामले में नहीं हो रही है लेकिन प्रदूषण रोकने के लिए हो रही है तो क्यों, समझना मुश्किल नहीं है। उसमें भी दिक्कत यह है कि तृणमूल के 20 सांसदों की दलबदल के लिए बैठकें पर्यावरण मंत्री के यहां हो रही थीं। उन्हीं दिनों पर्यावरण मंत्री के चार करीबी अफसरों को हटा दिया गया। मामला क्या था आज तक नहीं बताया गया।

दि एशियन एज की लीड के अनुसार, अमित शाह ने कहा है कि राहुल गांधी की विदेश यात्राओं के बारे में लोगों को जानकारी होनी चाहिए। अखबार ने लिखा है, अमित शाह ने राहुल के विदेश दौरों को लेकर उन पर तीखा हमला बोला जबकि विदेश मंत्री को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। हमला करना राजनीति है और उसकी खबर भी हो सकती है लेकिन राहुल गांधी की विदेश यात्रा के संबंध में जो जानकारी देना जरूरी है वह दी ही जाती होगी, नहीं दी जाती है तो सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए। अगर जानकारी देने का नियम ही नहीं है और सरकार को लगता है कि जानकारी देना जरूरी है तो ऐसा नियम बनाया जाना चाहिए।

वैसे भी, सरकार चाहे तो पता कर सकती है। अगर लगता है कि उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए तो सार्वजनिक भी कर सकती है। पूर्व में भाजपा के लोगों ने राहुल गांधी की निजी यात्रा से संबंधित विवरण सार्वजनिक किए हैं। अब भी किए जा सकते हैं। दूसरी ओर, नरेन्द्र मोदी सरकारी खर्च पर विदेश जाते हैं। वेतन-भत्ते लेते हैं। पहले के प्रधानमंत्री साथ में पत्रकारों को ले जाते थे। इससे पता रहता था कि विमान में कौन से लोग गए। लौटते हुए यात्रा के संबंध में जानकारी देने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करते थे, राष्ट्रपति को रिपोर्ट करते थे। अब सब बंद है। जनता को उसकी जानकारी बिना मांगे दी जानी चाहिए। पर उसे बंद कर दिया गया है और विपक्ष के नेता की जानकारी जरूरी बताई जा रही है लेकिन उसे सार्वजनिक करने के लिए किया कुछ नहीं जा रहा है।  

यह दिलचस्प है कि गृहमंत्री ने कहा है और आज दि एशियन एज में छपा है कि विपक्ष के नेता पर गृहमंत्री ने संसदीय बहस रोकने का आरोप लगाया है। यह भी कि वे घुसपैठियों को बचा रहे हैं। अमित शाह 2019 से गृहमंत्री हैं, 2014 से भाजपा की सरकार है। अगर इतने समय में घुसपैठियों को निकाला नहीं गया तो अब राहुल गांधी बचा किसे रहे हैं? उसी को जिसे सरकार मुफ्त राशन दे रही है? इसीलिए कांग्रेस ने कहा है और वह भी इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, एक मंत्री के रूप में अमित शाह असफल रहे हैं। उन्हें वापस जाकर भाजपा अध्यक्ष बन जाना चाहिए। द टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार, अमित शाह ने करनाल में कहा कि एसआईआर पर संसद में चर्चा करें। सोशल मीडिया पर एक वीडियो घूम रहा है जो लोकसभा का है। इसमें अमित शाह यह कहते हुए देखे जा सकते हैं कि एसआईआर पर संसद में चर्चा नहीं हो सकती है। चुनाव आयोग एसआईआर करवा रहा है और वह सरकार के नियंत्रण में नहीं है। अब अमित शाह जो कह रहे हैं या उन्हें जो कहना पड़ रहा है उससे साबित होता है कि योजना बुरी तरह पिट गई है और अब बचने का रास्ता नहीं मिल रहा है। 

यह खबर नहीं है। दस में से दो अखबारों – द हिन्दू और दि इंडियन एक्सप्रेस की लीड चुनाव आयोग की खबर है। द हिन्दू की खबर है – छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर (संक्षिप्त पुनरीक्षण प्रक्रिया) शुरू होगी। खबर के अनुसार, ईसीआई हर साल एसएसआर (संक्षिप्त पुनरीक्षण) आयोजित करता है ताकि पात्र मतदाताओं, खासकर पहली बार मतदान करने वालों को नामांकित किया जा सके। चुनाव आयोग का कहना है कि फॉर्म 6 और 8 में आधार विवरण देना स्वैच्छिक बना रहेगा। मेरा सवाल है कि चुनाव आयोग एसआईआर करता रहता है तो उसमें तीन करोड़ घुसपैठिए और इतने ही दोहरे नाम वाले कैसे थे जैसा अमित शाह ने कहा है और अगर तीन करोड़ घुसपैठिये अभी तक मतदाता सूची में थे तो भारत सरकार उनका पता लगाने और उन्हें बाहर करने के लिए क्या कर रही था उसका क्या असर हुआ या क्यों नहीं हुआ? इसी से जुड़ा सवाल है कि 12 करोड़ वोटर गलत थे तो क्या 2024 का लोकसभा चुनाव सही है? 

द इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने नए आदेश में आईटी  प्रमुख पर अपनी निगरानी बनाए रखने की बात दोहराई है। आयोग का कहना है कि डीजी (आईटी) वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त को रिपोर्ट करेंगी; साथ ही, 28 जुलाई का वह आदेश, जिसमें निगरानी हटाने की बात कही गई थी, कभी लागू ही नहीं किया गया था। अखबार ने याद दिलाया है कि दो चुनाव आयुक्तों ने इसपर चिंता जताई थी और कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था। पुरानी खबर के अनुसार तब कैबिनेट सचिव ने कोई कार्रवाई नहीं की थी क्योंकि चुनाव आयोग को स्वतंत्र या स्वायत्त माना जा रहा था। बाद में पता चला कि तीन सदस्यों वाला चुनाव आयोग एक ही सदस्य या मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा चलाया जा रहा था। इस खबर से जो बात समझ में आ रही है, वह यह है कि डीजी (आईटी) सीमा खन्ना को सीधे चुनाव आयोग के समक्ष रिपोर्ट करने के बजाय सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर के माध्यम से फाइलें प्रस्तुत करनी होंगी।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह हुआ कि चुनाव आयोग में आईटी विभाग के कामकाज और उससे संबंधित फाइलों पर एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी की निगरानी बनी रहेगी। यह केवल तकनीकी काम की समीक्षा नहीं, बल्कि आयोग के भीतर रिपोर्टिंग और प्रशासनिक जवाबदेही की व्यवस्था भी है। इस खबर के संदर्भ में Oversight की हिन्दी को ठीक से समझने की जरूरत है। अखबार के अनुसार यह आदेश पहले के आदेश के तीन महीने बाद जारी हुआ है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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