सुरेश प्रताप सिंह-
पत्रकारों के स्वास्थ्य की चिंता
काशी पत्रकार संघ पत्रकारों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है और समय-समय पर स्वास्थ्य शिविर का आयोजन करता है जिससे पत्रकार लाभान्वित होते हैं. दरअसल खबरों के पीछे भागने के कारण पत्रकार खुद अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो जाते हैं. जबकि स्वास्थ्य ठीक रहेगा तभी आप खबरें भी बटोर सकते हैं. डॉक्टर के पास जाने पर पता लगता है कि व्याधियों को शरीर में लिए अनेक पत्रकार घूम रहे हैं.
काशी पत्रकार संघ द्वारा संचालित प्रेस क्लब की तरफ से रविवार को पराड़कर भवन में शिविर का आयोजन किया गया था. मैं वहां लगभग 11 बजे पहुंचा. मुझे लगा कि मुझे आने में विलम्ब हो गया लेकिन तभी स्कूटी से काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष Arun Mishra पहुंचे. मैंने उनसे पूछा कि मेडिकल शिविर कहां लगा है? उन्हें भी कोई जानकारी नहीं थी क्योंकि अक्सर शिविर जहां लगता था वहां हॉल में कोई सम्मेलन चल रहा था. जहां अधिकार की चर्चा हो रही थी. अरूण जी से मैंने कहा कि यहां तो अधिकार की चर्चा चल रही है. उन्होंने तपाक से कहा कि सब अधिकार की बात कर रहे हैं और कर्तव्य की चर्चा कहीं नहीं हो रही है. मेरे अध्यक्ष जी कर्तव्य को लेकर बहुत सतर्क हैं जबकि लोगों के वोट के अधिकार को सुनियोजित तरीके से खत्म किया जा रहा है. दिल्ली के रामलीला मैदान में इसी सवाल को लेकर राहुल गांधी की रविवार को ही रैली हो रही है. खबरों के मुताबिक रैली में काफी भीड़ जुटी थी. रैली ऐतिहासिक रही.
होमिओपैथी शिविर था, साथ में न्यूरोथिरेपी ट्रीटमेंट भी रहा. बहुत सी बीमारियों की जड़ में खानपान की गलत आदतें होती हैं. जब तक शरीर चल रहा है लोग ध्यान नहीं देते. पत्रकारों के साथ यह दिक्कत कुछ अधिक है. उन्हें देर रात तक अखबार के दफ्तर में ड्यूटी करनी पड़ती है. खाने और सोने का कोई नियम नहीं होता और यहीं से बीमारियां पैदा होती हैं. प्रत्येक प्रोफेशन की अपनी मजबूरियां होती हैं. मैं ऐसे कई अध्यापकों को जानता हूं जो क्लास लेने के बाद ट्यूशन के पीछे भागते हैं. रुपया चाहिए तो कुछ करना पड़ेगा. फिर बीमार होने पर नर्सिंग होम वाले सब कुछ वसूल लेते हैं.
मैंने अपना स्वास्थ्य डॉक्टर से चेक कराया. बीपी ठीक है. मुझे शुगर भी नहीं है लेकिन उम्र अपना असर तो दिखाती ही है. पहले ऐसा नहीं था. अधिकांश बीमारियों की जड़ शुगर और बीपी है. होमिओपैथी शिविर के बाद मैंने न्यूरोथिरेपी ट्रीटमेंट भी कराया. मेरे बाएं कंधे में कुछ दर्द होता है. उसी का ट्रीटमेंट कराना था. उन्होंने ऊंगलियों को दबाया और शरीर पर हल्का दबाव भी बनाए. अच्छा लगा. उन्होंने सलाह दी की एक्सरसाइज़ करते रहिए तो कंधे का दर्द ठीक हो जाएगा. मैंने कहा कि एन्टी क्लाकवाइज और क्लाक वायज एक्सरसाइज़ तो करता हूं. डॉक्टर ने कहा कि ठीक है. धीरे-धीरे दर्द खत्म हो जाएगा.
डॉक्टर को दिखाने के बाद सीढ़ियों से जब नीचे उतर रहा था तो सीढ़ी पर काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष अत्रि भारद्वाज मिल गए. वह घुटने के दर्द से परेशान हैं. उनके पीछे Padampati Padam थे. उन्हें मैं पहली नज़र में पहचान नहीं सका. काफी दुबले हो गए हैं. पिछले दिनों वह गंभीर रूप से बीमार थे लेकिन अब देखने में ठीक लग रहे थे. सीढ़ियों पर चढ़ने के कारण हांफ रहे थे. उम्र 75+ होगी. एक समय के बाद उम्र नखरे दिखाने लगती है. अखबार में काम करने के दौरान उनकी छवि मेरे मस्तिष्क में है. अच्छा हुआ कि उनका वज़न कम हो गया है. पहले काफी मोटे थे. मोटापा भी बीमारी की जड़ है. मुझे लगा कि उनका वज़न पहले की अपेक्षा 25 किलो कम हो गया है.
अखबार से रिटायर्मेंट के बाद अनेक पत्रकार बीमार हैं. जब तक दम रहा, वह खबरों का पीछा करते रहे अब उनकी सुधि सरकार भी नहीं लेती. कोई सुविधा नहीं. पेंशन भी नहीं मिलती. कुछ प्रदेशों में उन्हें कम से कम दस हजार रुपये महीना सरकार पेंशन देती है. तीन साल पहले बनारस में भी पेंशन के लिए फार्म भरा गया था लेकिन उसका कोई परिणाम सामने नहीं आया. अभी काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष ने किसी कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा है कि मंत्री जी ने आश्वासन दिया है कि उचित मंच पर पत्रकारों की मांग उठाएंगे. “उचित मंच” के इंतजार में कुछ पत्रकार पेंशन का फार्म भरने के बाद दुनिया छोड़कर चले गए. बाकी बचे रिटायर पत्रकार बीमार हैं. जबकि भाजपा शासित मध्यप्रदेश, राजस्थान व बिहार में पत्रकारों को प्रतिमाह दस हजार रुपये पेंशन मिलती है. कम से कम योगी को उन्हीं से सीख लेनी चाहिए.
लंबे समय तक पत्रकारिता में सक्रिय रहे वरिष्ठ पत्रकार सुरेश प्रताप जी “उड़ता बनारस” जैसी किताब भी लिख चुके हैं।



