पुष्य मित्र-
पिछले कुछ महीनों से अचानक मेरी रेल यात्रा काफी बढ़ गई है। 23 अक्टूबर से आज तक तो मैं लगभग 80 घंटे की रेल यात्रा कर चुका हूं। इन यात्राओं के दौरान एक बार फिर समझ आया कि भारतीय रेल आज भी अपने यात्रियों को स्वच्छ और सुस्वादु भोजन उपलब्ध कराने में विफल है। सरकार ने तमाम प्रयोग कर लिए। IRCTC के नाम से सिर्फ इस काम के लिए एक कंपनी भी खड़ी कर ली। अब तो मेन्यू में भी विविधता आ गई। मगर जितनी तरह के बेस्वाद व्यंजन रेलवे कैटरीन वाले बनाते हैं, इसके लिए उन्हें अलग से अवॉर्ड दिया जा सकता है। यह हाल राजधानी, तेजस और वंदे भारत तक है। जिनमें खाने के नाम पर अच्छी खासी रकम वसूली जाती है।
रेल यात्री आज भी भोजन को लेकर निश्चिंत नहीं हैं। ज्यादातर यात्री 40 फीसदी, घर से खाना पैक करके चलते हैं। मगर इसकी भी लिमिट है। आप एक तरफ का खाना और नाश्ता तो पैक करके चल सकते हैं, मगर दूसरी तरफ का क्या करेंगे। फिर मेरे जैसे यात्री रेलवे स्टेशन से कम से कम पांच किमी दूर के किसी होटल से खाना, नाश्ता पैक करवाते हैं। क्योंकि रेलवे स्टेशन के पास वाले होटल भी बेस्वाद और खराब गुणवत्ता वाला भोजन उपलब्ध कराना अपना अधिकार समझते हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनका ग्राहक वन टाइम कंज्यूमर है, शिकायत करने आयेगा नहीं। दुबारा आयेगा इसकी भी गारंटी नहीं। इसलिए ग्राहकों की संतुष्टि उनके एजेंडे में नहीं। सड़े गले समान से कुछ भी रंगीन पका लेना है।
अब एक नया विकल्प खुला है। ऑनलाइन डिलीवरी का। यह भी आजमा कर देख लिया। वे भी रेलवे यात्रियों को इसी तरफ ट्रीट करते हैं। दो दिन पहले सड़े हुए अंडे की करी भेज दी, पूरा फेंकना पड़ा। अब किससे शिकायत करें।
लिहाजा हर लंबी रेल यात्रा से पहले मैं खाने का सामान जुटाने की जद्दोजहद में जुट जाता हूं। फल, ब्रेड बटर, भुजा मिक्सचर जैसी चीजें, गर्मी में सत्तू, कुछ खाना जिसे पैक कराया जा सके। कोशिश रहती है कि ट्रेन में पानी और चाय के सिवा कुछ खरीदना न पड़े।
इसके बावजूद कई बार ट्रेन का खाना लेना ही पड़ता है। क्या किया जाए। मगर मेरा अनुमान है कि रेल यात्रा करने वाले बमुश्किल 20 फीसदी यात्री ही रेलवे का खाना खाते होंगे। 80 फीसदी अपना इंतजाम खुद करते हैं।
क्या IRCTC जैसी संस्था कभी इस मसले में सोचती है। क्या रेलवे इस बारे में विचार करती है कि एक पेंट्री कार और इतने स्टाफ के बावजूद ये लोग अच्छा खाना क्यों दे नहीं पाते?
इनसे लाख गुना बेहतर पिछली सदी में स्टेशन पर पूरी सब्जी, चूड़ा दही या ऐसा ही भोजन उपलब्ध कराने वाले पारंपरिक वेंडर थे। आज भी लोग बरौनी, मुगलसराय, इटारसी या दूसरे स्टेशनों के पुराने वक्त के भोजन को याद करते हैं। उनके स्वाद की तारीफ करते हैं। अब तो पूरी रेल यात्रा में एक ही चीज हुलस कर खाने लायक मिलती है, वह है झालमूडी।



