हरेप्रकाश उपाध्याय-
वरिष्ठ कवि अरविंद चतुर्वेद लंबे समय से गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं, पर उन्होंने अपनी रचनात्मकता से किनारा नहीं किया है। वे इसे निरंतर साधे हुए हैं। यह उनकी नवीनतम कृति है। इसमे गद्य भी है और पद्य भी। अरविंद जी का गद्य भी इसीलिए विशिष्ट है कि उसमें विद्वत्ता और लोकभाषा का अद्भुत संतुलन है। वे साहित्य, इतिहास, राजनीति और संस्कृति के संदर्भों से परिचित हैं, लेकिन उस परिचय को प्रदर्शन में नहीं बदलते। जहाँ आवश्यकता होती है वहाँ गंभीर विचार आता है, और जहाँ जीवन की सहजता माँगती है वहाँ ठेठ बोलचाल। इसी कारण उनके व्यंग्य में बनारस की गली भी है, विश्वविद्यालय की कक्षा भी, साहित्यिक गोष्ठी भी और चुनावी मैदान भी।
‘कांकर-पाथर’ को अरविंद चतुर्वेद की रचनात्मक यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण और साहसिक पड़ाव के रूप में देखा जाना चाहिए। यह पुस्तक अपनी प्रयोगधर्मिता के कारण उल्लेखनीय है, लेकिन केवल प्रयोग के कारण महत्त्वपूर्ण नहीं है। इसका वास्तविक महत्त्व इस बात में है कि प्रयोग यहाँ जीवन की गहरी समझ से जुड़ा हुआ है। यह ऐसी किताब है जो विधाओं की सीमाएँ तोड़ती है, लेकिन पाठकीय संवेदना से रिश्ता नहीं तोड़ती।

पुस्तक के कंटेंट की बात करें तो लेखक इसमें राजनीति पर व्यंग्य करता है, पर मनुष्य को खोता नहीं। वह परंपरा को याद करता है, पर अतीत में लौट नहीं जाता। वह समकाल को पकड़ता है, पर उसकी तात्कालिक चमक का बंदी नहीं बनता। ‘कांकर-पाथर’ इसलिए एक ऐसी कृति बनकर सामने आती है जिसमें परंपरा की स्मृति, समकाल की बेचैनी, लोकजीवन की गंध, साहित्यिक आत्मीयता और सत्ता-संरचनाओं पर महीन किंतु तीखी दृष्टि एक साथ उपस्थित हैं। यहाँ हँसी के पीछे चिंता है, खिलंदड़ेपन के पीछे विचार है, स्मृति के पीछे इतिहास है और व्यंग्य के पीछे मनुष्य के प्रति गहरी प्रतिबद्धता।
कृति का एक और उल्लेखनीय पक्ष उसका लोकतांत्रिक बोध है। यहाँ लेखक किसी ऊँचे नैतिक आसन से समाज को उपदेश नहीं देता। वह उसी समाज का हिस्सा बनकर उसके अंतर्विरोधों को देखता है। यही कारण है कि उसकी आलोचना में कठोरता होते हुए भी मनुष्यता बची रहती है। व्यंग्य जब मनुष्यता से कट जाता है तो केवल उपहास बन जाता है; लेकिन यहाँ व्यंग्य के भीतर करुणा, स्मृति और आत्मीयता लगातार उपस्थित रहती है।
इस कृति से गुजरते हुए यह भी अनुभव होता है कि अरविंद चतुर्वेद व्यंग्य को केवल एक साहित्यिक विधा नहीं, बल्कि समय को पढ़ने की पद्धति मानते हैं। उनका व्यंग्य सत्ता के औपचारिक केंद्रों से बाहर निकलकर भाषा, परिवार, समाज, साहित्य, इतिहास, चुनाव, बाजार और हमारी निजी आदतों तक पहुँचता है। इसलिए उनकी रचनाएँ तात्कालिक होते हुए भी केवल तात्कालिक नहीं रह जातीं। उनमें समकालीन राजनीति की पहचान है, लेकिन साथ ही मनुष्य के व्यवहार की वह स्थायी विडंबना भी है जो सत्ता बदलने के साथ समाप्त नहीं होती। इस पुस्तक में कविता और गद्य का संबंध भी विशेष रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए। लेखक दोनों विधाओं को अलग-अलग कमरों में नहीं रखता। उसका गद्य कई जगह कविता की लय ग्रहण करता है और उसकी कविता कई जगह गद्य की सामाजिक दृष्टि। यही कारण है कि पुस्तक का अंतिम पद्य-खंड किसी परिशिष्ट की तरह नहीं लगता; वह पहले के संस्मरणों और कथाओं से निकलकर आया हुआ स्वाभाविक विस्तार प्रतीत होता है।
अरविंद चतुर्वेद की यह कृति अपने पाठक से केवल सहमति नहीं माँगती; वह उसे जगाती है, चौंकाती है, मुस्कराने पर मजबूर करती है और फिर उसी मुस्कान के भीतर छिपी बेचैनी से उसका सामना करा देती है। यही किसी सार्थक व्यंग्य की सबसे बड़ी सफलता है। ‘कांकर-पाथर’ इसी अर्थ में परंपरा के साथ समकाल का एक अविस्मरणीय, तीखा, मार्मिक और रचनात्मक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण पाठ है-ऐसा पाठ, जिसमें हमारे समय की आवाजें भी हैं और उन आवाजों के पीछे दबती हुई मनुष्य की धीमी, किंतु लगातार सुनाई देती हुई आवाज भी।
मित्रों,
कैंसर की बीमारी से पहले, बीमारी के इलाज के दौरान और फिर सेहत वापसी के इस लंबे अंतराल में कुछ-कुछ लिखता आया हूं। इसी सबको जुटाकर यह पुस्तक “कांकर-पाथर” रश्मि प्रकाशन लखनऊ से छपकर आई है। इस किताब को आपका प्यार मिले तो मजा आ जाए!
आपका अपना,
अरविंद चतुर्वेद
1 नवंबर, 2026.
रश्मि प्रकाशन की तरफ़ से जारी प्रेस रिलीज पढ़िए-
अरविंद चतुर्वेद लंबे समय से गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं, पर उन्होंने अपनी रचनात्मकता से किनारा नहीं किया है। वे इसे निरंतर साधे हुए हैं। यह उनकी नवीनतम कृति है। इसमे गद्य भी है और पद्य भी। अरविंद जी का गद्य भी इसीलिए विशिष्ट है कि उसमें विद्वत्ता और लोकभाषा का अद्भुत संतुलन है। वे साहित्य, इतिहास, राजनीति और संस्कृति के संदर्भों से परिचित हैं, लेकिन उस परिचय को प्रदर्शन में नहीं बदलते। जहाँ आवश्यकता होती है वहाँ गंभीर विचार आता है, और जहाँ जीवन की सहजता माँगती है वहाँ ठेठ बोलचाल। इसी कारण उनके व्यंग्य में बनारस की गली भी है, विश्वविद्यालय की कक्षा भी, साहित्यिक गोष्ठी भी और चुनावी मैदान भी।
‘कांकर-पाथर’ को अरविंद चतुर्वेद की रचनात्मक यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण और साहसिक पड़ाव के रूप में देखा जाना चाहिए। यह पुस्तक अपनी प्रयोगधर्मिता के कारण उल्लेखनीय है, लेकिन केवल प्रयोग के कारण महत्त्वपूर्ण नहीं है। इसका वास्तविक महत्त्व इस बात में है कि प्रयोग यहाँ जीवन की गहरी समझ से जुड़ा हुआ है। यह ऐसी किताब है जो विधाओं की सीमाएँ तोड़ती है, लेकिन पाठकीय संवेदना से रिश्ता नहीं तोड़ती।
पुस्तक के कंटेंट की बात करें तो लेखक इसमें राजनीति पर व्यंग्य करता है, पर मनुष्य को खोता नहीं। वह परंपरा को याद करता है, पर अतीत में लौट नहीं जाता। वह समकाल को पकड़ता है, पर उसकी तात्कालिक चमक का बंदी नहीं बनता। ‘कांकर-पाथर’ इसलिए एक ऐसी कृति बनकर सामने आती है जिसमें परंपरा की स्मृति, समकाल की बेचैनी, लोकजीवन की गंध, साहित्यिक आत्मीयता और सत्ता-संरचनाओं पर महीन किंतु तीखी दृष्टि एक साथ उपस्थित हैं। यहाँ हँसी के पीछे चिंता है, खिलंदड़ेपन के पीछे विचार है, स्मृति के पीछे इतिहास है और व्यंग्य के पीछे मनुष्य के प्रति गहरी प्रतिबद्धता।
कृति का एक और उल्लेखनीय पक्ष उसका लोकतांत्रिक बोध है। यहाँ लेखक किसी ऊँचे नैतिक आसन से समाज को उपदेश नहीं देता। वह उसी समाज का हिस्सा बनकर उसके अंतर्विरोधों को देखता है। यही कारण है कि उसकी आलोचना में कठोरता होते हुए भी मनुष्यता बची रहती है। व्यंग्य जब मनुष्यता से कट जाता है तो केवल उपहास बन जाता है; लेकिन यहाँ व्यंग्य के भीतर करुणा, स्मृति और आत्मीयता लगातार उपस्थित रहती है।
इस कृति से गुजरते हुए यह भी अनुभव होता है कि अरविंद चतुर्वेद व्यंग्य को केवल एक साहित्यिक विधा नहीं, बल्कि समय को पढ़ने की पद्धति मानते हैं। उनका व्यंग्य सत्ता के औपचारिक केंद्रों से बाहर निकलकर भाषा, परिवार, समाज, साहित्य, इतिहास, चुनाव, बाजार और हमारी निजी आदतों तक पहुँचता है। इसलिए उनकी रचनाएँ तात्कालिक होते हुए भी केवल तात्कालिक नहीं रह जातीं। उनमें समकालीन राजनीति की पहचान है, लेकिन साथ ही मनुष्य के व्यवहार की वह स्थायी विडंबना भी है जो सत्ता बदलने के साथ समाप्त नहीं होती। इस पुस्तक में कविता और गद्य का संबंध भी विशेष रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए। लेखक दोनों विधाओं को अलग-अलग कमरों में नहीं रखता। उसका गद्य कई जगह कविता की लय ग्रहण करता है और उसकी कविता कई जगह गद्य की सामाजिक दृष्टि। यही कारण है कि पुस्तक का अंतिम पद्य-खंड किसी परिशिष्ट की तरह नहीं लगता; वह पहले के संस्मरणों और कथाओं से निकलकर आया हुआ स्वाभाविक विस्तार प्रतीत होता है।
अरविंद चतुर्वेद की यह कृति अपने पाठक से केवल सहमति नहीं माँगती; वह उसे जगाती है, चौंकाती है, मुस्कराने पर मजबूर करती है और फिर उसी मुस्कान के भीतर छिपी बेचैनी से उसका सामना करा देती है। यही किसी सार्थक व्यंग्य की सबसे बड़ी सफलता है। ‘कांकर-पाथर’ इसी अर्थ में परंपरा के साथ समकाल का एक अविस्मरणीय, तीखा, मार्मिक और रचनात्मक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण पाठ है-ऐसा पाठ, जिसमें हमारे समय की आवाजें भी हैं और उन आवाजों के पीछे दबती हुई मनुष्य की धीमी, किंतु लगातार सुनाई देती हुई आवाज भी।

