दिलीप ख़ान-
आधार शुरू से ही एक फ़्रॉड स्कीम रही है। इसका मक़सद पूरा हो चुका है। जिस आधार के बिना पिछले पंद्रह साल में न राशन मिला, न पेंशन, न तनख़्वाह, अब उसी को चुपचाप किनारे किया जा रहा है।
2019 में मेरी तीन महीने की तनख़्वाह इसलिए रुकी रही, क्योंकि मेरे पास आधार नहीं था। मेरा पैन आधार से लिंक नहीं था। मजबूरी में मुझे आधार बनवाना पड़ा था। तब भी सरकार का दावा यही था कि आधार ‘स्वैच्छिक’ है, लेकिन इसे हींग, हल्दी, लहसुन, प्याज़ सबसे इस तरह जोड़ दिया गया था कि यह सबके लिए अनिवार्य बन गया।
इस फ़्रॉड स्कीम के लिए जितनी दोषी मोदी की सरकार है, उतनी ही मनमोहन की यूपीए-2, क्योंकि उसी ने इसका दरवाज़ा खोला था। नंदन नीलेकणी इस देश का बहुत बड़ा फ़्रॉड है जो आलू की तरह हर सब्ज़ी में मिल जाता है। कांग्रेस में भी, बीजेपी में भी।
जब संसद में आधार बिल आया था, तो उस वक़्त बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने 2011 में इसका बिल ख़ारिज कर दिया था।
लेकिन सत्ता में आने के बाद बीजेपी ने चार क़दम आगे बढ़कर हर चीज़ को आधार से जोड़ दिया। 2016 में आधार क़ानून को मनी बिल के रास्ते पास कराया गया, ताकि राज्यसभा में बहस से बचा जा सके। जस्टिस चंद्रचूड़ ने देश को एक झुनझुना पकड़ाया था और अपने फ़ैसले में एक पॉपुलर बात कही थी कि यह ‘संविधान के साथ धोखा’ है। इससे हुआ क्या? कुछ नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद में बहुमत से इसे जायज़ ठहरा दिया। बैंक खाते और मोबाइल को आधार से जोड़ने की अनिवार्यता हटा दी गई, लेकिन कल्याणकारी योजनाओं और पैन कार्ड के लिए आधार ज़रूरी बना रहा।
मतलब, पैन कार्ड आधार से जुड़ेगा और पैन कार्ड के बिना सैलरी अकाउंट नहीं बनेगा, तो बैंकिंग किस तरह आधार से अलग हुई?
जितने चोर रास्ते थे, सब घुसा दिए गए।
आधार नागरिकता का सबूत नहीं है, यह ख़ुद आधार का क़ानून कहता है। आधार जन्मतिथि का सबूत भी नहीं है, यह UIDAI कहता है। जनवरी 2024 में EPFO ने इसे जन्मतिथि के दस्तावेज़ों की सूची से हटा दिया। बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के दौरान चुनाव आयोग ने आधार को मानने से ही इनकार कर दिया था। अलग बात है कि बाद में सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भी उसे सिर्फ़ पहचान के दस्तावेज़ के तौर पर स्वीकार किया। ध्यान रहे, पहचान के दस्तावेज़ के तौर पर, नागरिकता के तौर पर नहीं।
वजह? क्योंकि क़ानून आधार नागरिकता का दस्तावेज़ नहीं है। यह विदेशियों का भी बन सकता है। तो, डेटा इकट्ठा करने के अलावा इसका क्या काम है?
यानी आधार किसी चीज़ का पक्का सबूत नहीं है, फिर भी राशन, पेंशन, पैन, गैस कनेक्शन, और वोटर कार्ड तक, हर चीज़ को इससे जोड़ा गया।
अगर आप भूल गए हों, तो दोबारा याद दिला देता हूं कि झारखंड के सिमडेगा में 11 साल की संतोषी कुमारी की 2017 में भूख से मौत हो गई, क्योंकि आधार से न जुड़ने के कारण उसके परिवार का राशन कार्ड रद्द हो गया था।
अब SIR के साथ जो खेल चल रहा है उस पर लौटिए। SIR में लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से कटे और विपक्ष का आरोप है कि ज़्यादातर नाम बीजेपी-विरोधी इलाक़ों से कटे या बीजेपी विरोधी लोगों के कटे। अगर योजनाओं का पैसा अब वोटर ID से मिलेगा, तो जिसका नाम मतदाता सूची से कटा, वह ऑटोमैटिक तरीक़े से राशन और पेंशन की सूची से भी बाहर जाएगा।
वोट का अधिकार और योजनाओं का हक़, दोनों एक ही झटके में ख़त्म किए जा रहे हैं।
और आधार का डेटा? वह सरकार के पास है। उसकी हिफ़ाज़त कितनी पक्की है, यह 2018 में द ट्रिब्यून की पत्रकार रचना खैरा दिखा चुकी हैं, जिन्होंने सिर्फ़ ₹500 देकर आधार डेटाबेस तक पहुंच हासिल कर ली थी। उस समय इस स्टोरी पर काफ़ी चर्चा हुई थी।
देश का हर अंगूठा और हर पुतली एक नंबर में दर्ज है और उस नंबर की सुरक्षा ठन-ठन गोपाल है। 500 दीजिए, डेटा लीजिए।
जब लोग कह रहे थे कि वोटर कार्ड है, तो आधार से क्यों योजनाओं को लिंक कर रहे हो, तो इसी मोदी सरकार ने पारदर्शिता का हवाला दिया था। अब पंचायती राज मंत्री ललन सिंह कह रहे हैं कि लाभार्थियों को आधार से भुगतान नहीं मिलेगा। उसकी जगह वोटर ID (एपिक नंबर) और बायोमेट्रिक का इस्तेमाल होगा। कब से लागू होगा, पता नहीं। लेकिन कहा जा रहा है।
आपका पूरा डेटा एक जगह इकट्ठा कर लिया गया, जिसमें एक क्लिक में पता चल जाएगा कि आपके कितना खाते हैं, आपने कब यात्रा की थी, आप किस होटल में ठहरे थे, आप कितने कमाते हैं, आप कितनी शॉपिंग करते हैं, आप कितना हगते हैं। लेकिन इस कार्ड का आपके लिए कोई मतलब नहीं है। यह डेटा चोरों के लिए बड़ा खज़ाना है।

