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उत्तर प्रदेश

अगर आप सांवले हैं और दलित एक्टिविस्ट हैं तो यूपी पुलिस आपको पकड़ सकती है…

Shesh Narain Singh : दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. राकेश सिन्हा (आरएसएस वाले) नोएडा के एक स्टूडियो में एक डिबेट के लिए जा रहे थे. उनको स्टूडियो के गेट पर ही पुलिस ने पकड़ लिया . अपशब्द कहे और पुलिस की गाडी में ज़बरदस्ती बैठाकर कुछ दूर तक ले गए. पुलिस वालों को किसी दलित नेता की तलाश थी, ठीक से पहचान नहीं पाए और राकेश को पकड़ लिया. प्रो.सिन्हा ने समझाने की कोशिश की कि वे दलित नहीं हैं, वे आरएसएस से सम्बद्ध हैं. किसी तरह उनकी जान बची वरना उत्तर प्रदेश में आजकल का ज़माना इनकाउंटर का है ,कुछ भी हो सकता था. राकेश सिन्हा के साथ दिल्ली के फिल्म सिटी में जो हुआ ,वह भयावह है. उस घटना से पैदा हो रही दहशत की कई परतें हैं. पहला तो यही कि अगर कोई दलित एक्टिविस्ट है तो उसको पुलिस पकड़ सकती है , दूसरा यह कि अगर आप सांवले रंग के हैं तो आपको दलित समझकर पकड़ा जा सकता है और तीसरा यह कि अगर आपकी सही जान पहचान नहीं है तो आपको पुलिस वाला पकड़ कर आपके साथ दुर्व्यवहार कर सकता है!

Satyendra PS : संघी विचारक राकेश सिन्हा दलित जैसे दिखे तो थानेदार शाही जी ने पकड़कर उन्हें पीट दिया। हालांकि जब सिन्हा ने बताया कि वह दलित नहीं हैं सिर्फ शक्ल से दलित दिखते हैं तो पुलिस ने उनको छोड़ दिया। फिर भी शाही जी सस्पेंड हो गए! यूपी से खबर है कि गाजियाबाद में कांग्रेस पार्षद और एक ग्राम प्रधान पर रासुका लगा है। राज्य भर में दलित कार्यकर्ता पकड़े जा रहे हैं और 8 जिलों में 125 मुकदमे दर्ज हुए हैं। गिरफ्तार होने वालों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाया जा रहा है। इस कानून के तहत गिरफ्तारी होने पर भी पूछताछ और जमानत नहीं सीधे जेल होती है। यूयू ललित,गोयल और मिश्र जी खामोश हैं, जबकि उन्हें भी पता है कि रासुका और देशद्रोह के 80% से ज्यादा मामले फर्जी हैं। उधर राजस्थान में बन्द के बदले की कार्रवाई में भाजपा विधायक और कांग्रेस के पूर्व मंत्री का घर फूंक दिया गया जो दलित समाज से हैं। दलितों की पिटाई पार्टी और वैचारिक सोच से हटकर हो रही है। चाहे जिस दल के वो हों, उनको मारना फूंकना है। इससे बेहतर रामराज और क्या हो सकता है?

Sheetal P Singh : जोगी जी, कृपया पुलिस के संचालन के लिये विशेषज्ञों से परामर्श करके नीति बनायें! कल राकेश सिन्हा बाल बाल बचे और आज कानपुर की एक लड़की को सुसाइड करना पड़ा! दोनों ही मामले पुलिस की कार्यप्रणाली की असलियत खोलने के लिये पर्याप्त हैं। कानपुर की बच्ची छेड़छाड़ से पीड़ित थी और शिकायत दर्ज कराने के बावजूद पुलिस छेड़खानी करने वालों की तरफ़ से लड़की को केस वापस लेने का दबाव बना रही थी! राकेश सिन्हा की निजी स्वीकारोक्ति है कि वे “दलित एक्टिविस्ट” समझे गये इसलिये बेवजह ज़बरन पुलिस द्वारा अपहृत कर लिये गये , संयोग कि पुलिस को समय रहते गलती का अहसास हो गया। दोनों घटनाएँ समाज के दो vulnerable तबक़ों स्त्री और दलित के प्रति आपकी पुलिस के रवैये की गवाही हैं! छोटे मोटे अपराधियों पर पच्चीस पचास हज़ार का इनाम रख देने और उन्हे फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार देने को प्रशासनिक कुशलता नहीं अत्याचार कहते हैं ! दुर्भाग्य से आपकी कुल योग्यता इसी फ़ैसले में निहित हो गई दिखती है! इससे पुलिस के उच्छ्रंखल होने और मनमानी करने के मामले ही बढ़ रहे हैं / बढ़ेंगे!

शेष, सत्येंद्र और शीतल की एफबी वॉल से.

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