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ईटीवी भारत के रिपोर्टर ने आफिसियल वाट्सअप ग्रुप में लिखा अलविदा लेटर

सीतापुर से ईटीवी भारत के रिपोर्टर नीरज श्रीवास्तव ने ऑफिसियल वाट्सअप ग्रुप में अपना दुख साझा किया और इसी लेटर को आखिरी कहकर ईटीवी भारत को अलविदा कह दिया. नीरज ने अपने वरिष्ठों पर आरोप लगाए हैं. ईटीवी भारत में रिपोर्टर्स और स्ट्रिंगर्स के साथ अत्याचार किया जाना कोई नई बात नहीं है. यहां जो भी वरिष्ठ अधिकारी आता है, एसी वाले कमरे में बैठकर रिपोर्टर्स और स्ट्रिंगर्स को अपनी उंगलियों पर नचाने का काम करता है. कोरोना काल में भी यहां इसी तरह अत्याचार किया जा रहा है. रिपोर्टर्स को जबरन स्ट्रिंगर बनाया जा रहा है. जो स्ट्रिंगर नहीं बनना चाहता उससे जबरदस्ती इस्तीफा लिखवाया जा रहा है. इस वजह से ज्यादातर रिपोर्टर नौकरी छोड़ने को मजबूर हैं. पढ़ें नीरज का लेटर-

अलविदा ईटीवी भारत,

तमाम उपलब्धियों और खट्टी मीठी यादों ही नहीं बल्कि अंतिम चरण के कड़वे अनुभवों के साथ ईटीवी ग्रुप में 17 बरस पूरे कर अठारवें बरस में प्रवेश करने के बाद पत्रकारिता का यह अध्याय आज पूरा हो गया.सबसे पहले तो मैं ईटीवी ग्रुप के चेयरमैन सर चेयरमैन रामोजी राव सर का आभार व्यक्त करना चाहूंगा जिनके सम्मानित मीडिया संस्थान में इतने लंबे समय काम करके अनुभव और मान-सम्मान तो खूब मिला साथ ही जीविकोपार्जन का स्रोत भी,किंतु पिछले डेढ़ वर्ष का कार्यकाल बेहद चुनौतीपूर्ण ही नहीं पीड़ादायक भी रहा.इस दौरान जितनी यातनाएं दी गई वह शायद इस जीवन मे अविस्मरणीय रहेंगी.इन तमाम परिस्थितियों में संस्थान से नाता तोड़ना मेरे आत्मसम्मान की रक्षा एवं तनावपूर्ण जीवन से शांति के लिए जरूरी हो गया था.वर्तमान समय मे इस मीडिया ग्रुप के वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यशैली और नीति बहुत ही अव्यवहारिक और अफ़सोसजनक है ऐसे में संस्थान से नाता तोड़ना ही श्रेयस्कर समझना पड़ा.

ईटीवी भारत को जब से शुरू किया गया है तो मैंने देखा कि यह प्लेटफार्म सिर्फ प्रयोगशाला का संस्थान बना दिया है. छोटे जिलों से स्टॉफर को मजबूरन स्ट्रिंगर बनाया जा रहा है. इसका तरीका भी बहुत ही गलत अपनाया जा रहा है.स्पेशल स्टोरी की मांग के नाम पर नाकारा की मुहर लगाई जाती है जो कि न्यायसंगत नही है.अगले एक माह के स्पेशल स्टोरी के प्लान तिथि और समय के साथ मांगकर उनके प्रकाशन का समय न तय कर पाना सिर्फ रिपोर्टर को परेशान करने की नीति जैसा साबित हो रहा है.

कोरोना संक्रमण काल और लॉकडाउन में रिपोर्टरों को कोई राहत न देकर खूब स्टोरी करवाई गई और फिर डेस्क पर लोगो को वर्क फ्रॉम होम की राहत देकर सिर्फ इमेज के साथ स्टोरी लगाई गई. एसी रूम में प्लानिंग करने वालों को समझना चाहिए कि फील्ड के रिपोर्टरों से बंधुवा मजदूर की तरह का बर्ताव ना करे क्योंकि इस संस्थान में अब आयाराम और गयाराम का दौर चल रहा है और अगला नम्बर उनका भी हो सकता है.पिछले करीब डेढ़ वर्ष और खासकर छह महीनों में सिर्फ घुटन और तनाव का ही अनुभव हुआ है इसलिए संस्थान को अलविदा कहने पर मजबूर हूं.

आप भी आत्ममंथन करे
धन्यवाद

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