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संसद हिंसा वाले घटनाक्रम को अमेरिकी अख़बारों ने फ्रंट पेज पर कैसे कवर किया, देखें

सौमित्र रॉय-

आज सुबह के अमेरिकी अखबारों में ट्रम्प छाए हैं।

4 में से 3 अखबारों की सुर्खियां उनके ही नाम से शुरू हो रही हैं। ट्रम्प अपने दोस्त मोदी के समान देश की मीडिया को पूरी तरह से खरीद नहीं पाए।

या यूं कहें कि मीडिया पूरा बिका नहीं।

उधर, चीन हंस रहा है। हांगकांग में लोकतंत्र समर्थकों के प्रदर्शन को अमेरिका ने समर्थन दिया था।

अमेरिका में हर छठवें व्यक्ति का हाथ सरकारी खैरात के लिए फैला हुआ है। रोज़ खाना न मिले तो भूखे मर जाएं।

चीन, रूस में लोकतंत्र नहीं है। आधे से ज़्यादा अफ्रीका गृह युद्ध में उलझा है। यूरोपीय देशों का बाज़ार ध्वस्त है।

अमेरिका का लोकतंत्र दुनिया को उम्मीद देता है और भारत का दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र ताक़त देता है।

आज दोनों पर खतरा है। अमेरिका 20 जनवरी को बाइडेन के हाथ में होगा। आज बाइडेन ने देश को सलीका सिखाया, सहनशीलता की सीख दी। लेकिन पूंजीवाद और बाज़ार को रोक पाना उनके भी बस में नहीं।

दुनिया एक ऐसा बाज़ार है, जहां इंसानों पर कम, वस्तुओं पर ज़्यादा निवेश हुआ है।

ये वही दुनिया है, जिसने इतिहास की सबसे भीषण आपदाओं, जंग, महामारियों और अकाल का सामना किया है। फिर भी इंसानियत नहीं मरी, क्योंकि हम एकजुट थे।

यही इंसानियत तेज़ी से मर रही है। लोकतंत्र और बाजार तंत्र में महीन से फर्क़ रह गया है।

भारत में इस फ़र्क़ को मिटाने में आर्थिक उदारीकरण का जितना रोल है, उससे भी बड़ी भूमिका मोदीनोमिक्स की रही है।

लोकतंत्र में से लोक को निकालकर तंत्र को कंपनियों के हवाले कर कांग्रेस ने अपनी ही कब्र खोदी।

आज अमेरिका सामने है।

कल भारत का नंबर आएगा।

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