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मेरी थाईलैंड यात्रा (2) : …हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे!

हमारी टोली पटाया के होटल गोल्डन बीच पहुच चुकी थी. औपचारिकताओं के साथ ही हमने अपना पासपोर्ट वहीं रिशेप्सन पर एक लॉकर लेकर उसमें जमा कराया. युवाओं का कौतुहल और बेसब्री देखकर मनोज बार-बार उन्हें कह रहे थे कि पहले ज़रा आराम कर लिया जाए, फिर अपने मन का करने के बहुत अवसर बाद में आयेंगे. सीधे दोपहर में भोजन पर निकलने का तय कर हम सब कमरे में प्रविष्ट हुए. शानदार और सुसज्जित कमरा. हर कमरे के लॉबी में ढेर सारे असली फूलों से लदे पौधों का जखीरा. इस ज़खीरे के कारण तेरह मंजिला वह होटल सामने से बिलकुल फूलों से लदे किसी पहाड़ के जैसा दिखता है.

हमारी टोली पटाया के होटल गोल्डन बीच पहुच चुकी थी. औपचारिकताओं के साथ ही हमने अपना पासपोर्ट वहीं रिशेप्सन पर एक लॉकर लेकर उसमें जमा कराया. युवाओं का कौतुहल और बेसब्री देखकर मनोज बार-बार उन्हें कह रहे थे कि पहले ज़रा आराम कर लिया जाए, फिर अपने मन का करने के बहुत अवसर बाद में आयेंगे. सीधे दोपहर में भोजन पर निकलने का तय कर हम सब कमरे में प्रविष्ट हुए. शानदार और सुसज्जित कमरा. हर कमरे के लॉबी में ढेर सारे असली फूलों से लदे पौधों का जखीरा. इस ज़खीरे के कारण तेरह मंजिला वह होटल सामने से बिलकुल फूलों से लदे किसी पहाड़ के जैसा दिखता है.

ऐसे किसी होटल को अफोर्ड करने की कल्पना शायद भारत में मध्यवर्ग के लिए नामुमकिन ही है. समूह के सबसे बुजुर्ग सदस्य को हमारा रूममेट बना देना शुरू में तो ज़रा अखरा, लेकिन जल्द ही समझ में आ गया कि इससे ज्यादा माकूल व्यवस्था मेरे लिए और कुछ नहीं किया जा सकता था. लंच के समय जब फिर से बस में सबको एकत्र होना था तब तक तो कई युवा सदस्य बिना बताये कहीं विलीन हो चुके थे. उचित ही था, भोजन और नींद तो उन्हें अपने देश में मयस्सर था ही. यहां इन दोनों की परवाह क्यूं कर की जाय? बाद में कई सहचर ने बताया भी कि पूरे तीन दिन की यात्रा में बमुश्किल दो-चार घंटे ही वे सो पाए थे.

बस में बैठते ही याद आया कि आज हमारा देश आज़ादी का उत्सव मना रहा है. जी हां, 15 अगस्त का दिन ही था वो. हमारे लिए यह दिन क्या महत्व रखता है, यह हमने नत्थू दा को समझाया. अपने देश के सम्मान में ‘थाई’ नत्थू समेत सब लोग खड़े हो गए. बस सड़क पर सरक रही थी और माइक पर जन-गण-मन अधिनायक जय हे… गाते हुए हम सब खड़े सावधान की मुद्रा थे. राष्ट्रगान खत्म हुआ और तब तक हम रेस्तरां पहुंच गए थे. थाई निवासी, भले ही आदमी को छोड़ कर सभी जीवों को खा जाने के अभ्यस्त हों, मानव का ज़िंदा मांस भी भले उनके लिए तिजारत की वस्तु ही हो, लेकिन भारतीय रेस्तराओं की चेन देख कर राहत मिलेगी आपको. शाकाहारी भोजन के भी ढेर सारे विकल्प वहां मौजूद होने के कारण कोई समस्या नही थी. ‘चोटीवाला’ नामक जैन शाकाहारी भोजन का एक रेस्टोरेंट तो बस हमारे होटल के चंद कदम दूर पर ही था, हालांकि वहां भोजन करना हमारे पैकेज में शामिल नहीं था.

बाद में 80 रूपये की चाय पीने ज़रूर हम वहां जाने लगे थे जो वहां सस्ता ही था. सभी लोग रेस्तरा में हिन्दी बोलनेवाले ही थे. एक थाई नैननक्श की पूनम नाम की लडकी को भी फर्राटे से हिन्दी बोलते हुए देख कर ज़रा आश्चर्यचकित हुआ था, बाद में पता चला कि वह मयन्मार की है और यहां ऐसे हज़ारों बर्मीज़ थाईलेंड काम करते हैं जो हिन्दी ही बोलते हैं. भोजन के बाद का समय फिर से आराम का ही था. शाम में यहां के सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक शो ‘अलकायजर’ देखने जाने का तय था. हालांकि कुछ मित्र ही होटल वापस आ पाए. सबने अपने-अपने हिसाब से अपना प्लान तब तक के लिए बना लिया हुआ था. उनमें से कुछ मित्र पहले भी आये थे तो उन्हें और उनके मित्रों को पता था कि ऐसे समय का भी ‘सदुपयोग’ कैसे किया जा सकता है. हालांकि हम कुछ अनाड़ियों के लिए यह कौतूहल का विषय था ही कि रात के ‘उजाले’ में घंटों काम कर थके, सो रहे पटाया के किस घर की कुंडी को उन्होंने भरी दुपहरिया के ‘अंधेरों’ में खटखटाया होगा. खैर.

समूचे एशिया की संस्कृति को एक साथ पिरो कर उसे दिखाने वाले अलकायजर शो एक अनूठा अनुभव देता है. नत्थू दादा ने पहले ही दिया था कि इस शो में विभिन्न देशों की प्रस्तुतियां एक-एक कर सामने आती है. जिसमें भारत की प्रस्तुति भी हमें देखने को मिलेगा. कॉम्पलीमेंट्री ड्रिंक का आनंद लेते हुए हम सब फटी आंखों से प्रकाश और अभिनय के उस अद्भुत सम्मिलन को देखते जा रहे थे. अलग-अलग थीम पर अलग-अलग देशों की प्रस्तुतियां सामने आ रही थी. कहीं किसी संग्रहालय में मूर्तियों में लगे रत्न के चोरी का, तो कहीं अलग-अलग थीम पर राजकुमार-राजकुमारियों का जीवंत दृश्य. कभी अचानक वह सारी मूर्तियां जीवंत  होकर नाचने लगती थी तो अपन भौचक्के रह जाते थे कि अरे, ये सब तो इंसान ही हैं जो मूर्तियों में परिणत कर दिए गए थे. एक से एक ख़ूबसूरत लड़कियों द्वारा किये जाने वाले शानदार और शालीन अभिनय तो उस शो को चार चांद लगा देता है. हर वह दृश्य आपको आपके भारत की, हिन्दू संस्कृति की याद दिलाता सा लगेगा, ऐसा महसूस होगा मानो अपने यहां होने वाले रामलीला-कृष्णलीला आदि का ही यह परिष्कृत रूप है.

दो मंजिला उस विशाल हॉल में गूंजती तालियों की संख्या से आपको यह समझ में आने लगता है कि अभी जिस देश की थीम है, उस देश के कितने लोग सभागृह में मौजूद हैं. बेसब्री से हम भारत की बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे. हमें यह उम्मीद थी कि आज चुकि हमारे यहां स्वतन्त्रता दिवस है तो शायद उसी थीम पर कोई प्रस्तुति हो, लेकिन ‘आजा नचले’ गीत के साथ भारतीय प्रस्तुति सामने आयी. वह भी कम रोचक नहीं थी. लेकिन निराश यह देख कर हुआ कि जहां अन्य नागरिक अपने-अपने देश की बारी आने पर ताली से सभागृह को गुंजायमान कर रहे थे वहीं भारतीय आज़ादी का दिन होने के बावजूद बड़ी संख्या में वहां उपस्थित भारतीयों ने कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखाया. शो खत्म होने के बाद वो सभी लड़कियां झट से अत्यधिक मादक रूप लेकर दर्शकों के साथ ही बाहर आ जाती हैं. आप दो सौ रूपये देकर उनका आलिंगन कर जैसे चाहें वैसे फोटो खिचा सकते थे. काफी लोगों ने इस मौके का भी लाभ उठाया.

इस शो में आने से पहले ही गाइड ने एक सस्पेंस रख लिया था जिसे शो के बाद उन्हें बताना था. जब वापस बस में सवार हुए तो उस सस्पेंस के बारे में जानकर कई मित्रों ने दो-चार सौ रूपये खर्च कर पाए गए फोटो अपारच्युनिटी से मुक्ति पा ली, कई ने अपने-अपने मोबाइल से लिए गए फोटो को डिलीट कर दिया. एक्चुअली गाइड ने अब जाकर यह बताया था कि इस शो में सभी पुरुष ही काम करते हैं. उनमें से कोई भी लड़की नहीं थी, न उस प्रदर्शन में और न ही लिपट-चिपट कर खिचाये गए फोटो में. सचमुच…. अर्द्धनारीश्वर के भारतीय कल्पना को भी उसी देश ने साकार कर रखा हुआ है. कुछ पुरुष वहां प्राकृतिक रूप से वैसे हैं और कुछ विभिन्न मेडिकल उपायों का सहारा लेकर सुन्दर युवती बन जाते हैं. खैर.

यात्रा रफ़्तार पकड़ चुकी थे और इसके साथ ही अब मनोज का पिटारा भी खुलना शुरू हो चुका था. यात्रा प्लान के अनुसार अभी तक आधिकारिक रूप से ऐसा कुछ रोचक सा सामने नहीं आया था जिसके लिए भाई लोग यहां तक की दूरी तय करके आये थे. कारवां आगे बढ़ा रसियन एडल्ट शो की ओर. इस शो के बारे में क्या कहा जाय? वहां किसी को कैमरा या मोबाइल आदि ले जाने की इजाज़त नहीं होती. बस आप देखिये और अनुभव कीजिये एक से एक अनिर्वचनीय दृश्यों को. शो का टिकट यूं तो 3 हज़ार रूपये का होता है लेकिन यात्रा पैकेज लेकर आये लोग बस 1400 रूपये में टिकट पा सकते हैं. यहां बस अनुभूति ही कीजिये, अभिव्यक्ति करना सीधे-सीधे पोर्न लिखे जाने की मानिंद होगा. फिलहाल इतना ही बता पाना मेरे वश की बात है कि स्त्री-पुरुष यौंनांगों का इस तरह प्रदर्शन और ऐसा इस्तेमाल आप, हम और सबकी कल्पना से बाहर की बात है. इसे देख कर ही समझा जा सकता है बस. हां, जलती हुई मोमबत्ती को मूंह में लेना और फिर पिघले मोम को अपने समूचे देह पर उड़ेलते रहना, बिना उफ़ तक किये. यह देखना बहुत घिनौना और कष्टप्रद लगा. सोचने लगा कि शायद सेक्स से मन भर जाने के बाद आने वाली नस्ल आनंद के लिए ऐसी-ऐसी तरकीबें ही इस्तेमाल में लायेंगे. शायद इसी लिए अपने यहां सेक्स को इतना ज्यादा गोपन रखा गया होगा ताकि आनंद की कल्पना सेक्स तक जा कर खत्म हो जानी चाहिए. पश्चिम में भी आनंद के लिए अपनाए जा रहे नए-नए घिनौने तरीकों ने हमें यही तो सन्देश दिया है कि कामनाओं की कभी तृप्ति संभव नहीं, इसलिए प्राकृतिक कामनाओं को ही इतना दुरूह बना दिया जाय ताकि मानव इसकी प्राप्ति में आजन्म व्यस्त रहे, कुछ नयी सनक न पाल ले.

हां, सेक्स से इतर अगर आप इन दृश्यों को समझना चाहेंगे तो सचमुच आश्चर्य होगा यह सोच कर कि कितनी हाड़ तोड़ मेहनत और प्रैक्टिस के बाद ऐसे करतब दिखा पाते होंगे ये ‘कलाकार’ लोग. अपने किसी अंग को इतना लचीला या ऐसा मज़बूत बना पाना निश्चय ही एक बड़ी साधना की मांग करता है. शो से निकल कर एक-दुसरे से आंख बचाते भाई लोग निकल पड़े अगले पड़ाव पर. अगला पड़ाव यही होना था जो पटाया या थाईलेंड का यूएसपी है, यानी उसका मसाज़ सेंटर.

थाई संस्कृति में यूं तो मसाज़ का रिवाज़ यहां काफी पुराना है. मसाज़ के द्वारा ही कई तरह की बीमारियों आदि का इलाज़ भी करना यहां की परंपरा है. आज भी वहां ऐसे कई मसाज़ केंद्र हैं जहां शालीन तरीके से भी इसका आनंद या लाभ उठाया जा सकता है. लेकिन यहां जिन मसाज़ केन्द्रों की बात हो रही है, वह सीधे तौर पर वैश्यालय ही है.

थाई कानून के अनुसार वहां घोषित तौर पर वैश्यावृत्ति गैर-कानूनी ही है. लेकिन नगर में प्रवेश करते ही नत्थू ने यह आश्वासन दे दिया था कि ‘इस ओर’ से पुलिस पूरी तरह आंख मूंदे रहती है और आप पूरी तरह निश्चिंत हो सकते हैं. वस्तुतः वहां भी एक तबका है जिन्हें ये चीज़ें, विकास और समृद्धि की यह कीमत मंज़ूर नहीं. ऐसे समूहों का सरकार पर भी ज़रा दबाव रहता है कि इस कलंक को खत्म किया जाय, लेकिन देश जिस सीमा तक आगे बढ़ चुका है, वहां से लौट जाने की कोशिश थाईलेंड के लिए आत्मघाती ही हो सकता है, और ऐसा रिस्क कम से कम अब उठा लेना वहां किसी सरकार के वश की बात नहीं है.

एक बार 2008 के आसपास सरकार ने ज़रा इस पर कड़ाई करने की कोशिश की थी, लेकिन उस कोशिश के कारण थाई अर्थव्यवस्था पूरी तरह नष्ट होने की कगार पर आ गयी थी. फिर से सरकार को पिछले दरवाज़े से इसे लागू करना पड़ा जिसमें मसाज़, स्नान कराने आदि को कानूनी बना दिया गया है. ज़ाहिर है, बंद कमरे में नग्न युवती आपको स्नान करा रही है, मसाज़ कर रही है.. इतना कानूनी होने के बाद कौन सा पुलिसिया उस कमरे के भीतर जाकर तांक-झांक करने की हिमाकत कर पायेगा? हां, संसार के इस सबसे पुराने पेशे को जायज़ या नाजायाज़ ठहराने की मंशा लेकर यह वृत्तांत लिखा भी नहीं जा रहा है. सही और गलत का निर्धारण यहां व्यक्तिशः ही किया जाना समीचीन होगा. इस वृत्तांत का आशय बस जैसा है, और जिस तरह है उसे बता देना भर है. खैर.

कुछ और देर चहलकदमी कर लेने के बाद रात आधी होने से पहले ही अपन अपने कमरे में वापस आ गए थे. ज़ाहिर है वापस आने वाले साथियों की संख्या न्यून हो गयी थी. उचित ही है, तीसरी दुनिया के इस ‘सिटी ऑफ सिन’ यानि नए एशियाई लॉस वेगास आकर भी कमरे में सोये रहना कोई अक्लमंदी तो नहीं कहा जा सकता है. हां, मसाज़ केन्द्रों का अवलोकन किये जाने से पहले शहर के ‘गरम मसाला’ नाम के रेस्टुरेंट में सबने एक साथ ही डिनर किया. अलकायजर शो में भारतीयों के देशभक्ति संबंधी मेरी शिकायत उस रेस्तरा में आकर कुछ हद तक दूर हो गयी थी. भारतीय आजादी दिवस की उस रात को, उस रेस्टोरेंट में एक बड़ी कंपनी द्वारा प्रायोजित भारतीय पर्यटकों के एक बड़े समूह ने, वहां हॉल बुक कर लिया था. मेरा रंग दे वसंती चोला, मेरी जान तिरंगा है..आदि पर झूमते अपने लोगों को देख कर सुस्वादु भोजन का स्वाद कई गुना बढ़ गया. इस ठांस भोजन के बाद बस मेरी अगली ज़रूरत केवल चांप निद्रा की ही रह गयी थी. घोड़े सारे बिक गए थे, अपन जल्द से जल्द आकर पसर गए बिस्तर पर नींद के आगोश में. अगले दिन घंटे-डेढ़ घंटे की समुद्र यात्रा कर, समुद्र के बीच में ढेर सारे खेल आदि का आनंद उठाते हुए ‘कोरल आईलेंड’ तक की यात्रा का प्लान था.

यह वर्णन आगे……!

….जारी….

इस यात्रा संस्मरण के लेखक पंकज कुमार झा छत्तीसगढ़ भाजपा की मैग्जीन ‘दीपकमल’ के संपादक हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. पंकज बिहार के मिथिला इलाके के निवासी हैं. नौकरी भले ही भाजपा में करते हैं पर वक्त मिलते ही देश-विदेश की यात्राओं पर निकल पड़ते हैं, यायावर बन कर.


इसके पहले वाला पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें: 

मेरी थाईलैंड यात्रा (1) : कृपया भगवान बुद्ध के मुखौटे वाली प्रतिमा न खरीदें!

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1 Comment

1 Comment

  1. Arif Masih

    September 20, 2015 at 7:18 am

    झउआ बाबू बड़का मास्टर पीस निकले थाईलैंड बिना पत्नी के 🙄 , दूसरो का मजाक बना रहे हैं पक्का ई खुद भी वहां मजा लिये होंगे खिलवाओ इनसे बीबी बच्चों की कसम 😆 हम तो भइया दू बार गये मगर परिवार के साथ 🙁 🙂

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