धरती के सबसे ज्यादा आबादी वाले इलाकों में रातें खत्म होती जा रही हैं

गुजरात के चुनाव और राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना इतनी बड़ी खबरें हैं कि लगता है देश भर की सारी समस्याएं खत्म हो गई हैं, सारे मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं। राजनीतिज्ञों को तो जनता को अंट-शंट बातों से मुद्दे भुलाकर फुसलाने की आदत थी ही, अब मीडिया भी इस आदत का शिकार हो गया है और जनता के पास इसी मीडिया को बर्दाश्त करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। खुद मीडिया से जुड़े कई वरिष्ठ लोगों ने इस पर चिंता जाहिर की है, लेकिन इस स्थिति को बदलने के लिए मीडिया में कोई व्यवस्थित चिंतन हो रहा हो, ऐसा बिलकुल नहीं लगता। हम भूल गए हैं कि ट्विटर और मीडिया में काफी नाटकबाज़ी के बाद आखिरकार अरविंद केजरीवाल 15 नवंबर को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मिलने चंडीगढ़ आये थे।

उस मुलाकात के बाद दोनों मुख्यमंत्रियों ने सांझा बयान जारी करके जनता को आश्वासन दिया था कि दोनों सरकारें दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण की समस्या को लेकर गंभीर हैं और इस समस्या से निपटने के लिए सतत प्रयास करेंगे। बयान में यह भी कहा गया है कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अगले साल की सर्दियों में प्रदूषण की स्थिति की पुनरावृत्ति न हो। हमें नहीं मालूम है कि वे “सतत प्रयास” क्या होंगे, कब से शुरू होंगे, कैसे शुरू होंगे, उसमें शामिल दोनों सरकारों की भूमिका क्या होगी, किसानों द्वारा भूसा जलाने की समस्या से पार पाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे, उद्योगों और वाहनों के लिए क्या नियम बनाए जाएंगे, नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का रुख क्या होगा, आदि-आदि। दोनों सरकारें इन सभी मुद्दों पर फिलहाल खामोश हैं, पंजाब के मुख्यमंत्री ने तो खैर बैठक में शामिल होने से ही इन्कार कर दिया था। इसलिए पंजाब सरकार की ओर से इस समस्या के समाधान के लिए फौरी तौर पर किसी कदम की अपेक्षा तो की ही नहीं जा सकती। मज़ेदार बात यह है कि मीडिया भी इस मामले पर खामोश है। नहीं, नहीं, मीडिया खामोश नहीं है, वह चीख-चीख कर हमें गुजरात और राजधानी नई दिल्ली के अकबर रोड की खबरें बता रहा है।

कुछ वर्ष पूर्व भारतीय मौसम विभाग तथा अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (स्पेस एप्लीकेशन सेंटर) के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया था कि तमाम तरह के प्रदूषण के कारण सूर्य की रोशनी के पृथ्वी तक सीधे पहुंचने का समय लगातार घटता जा रहा है जिसके कारण धूप और रोशनी का तीखापन प्रभावित हो रहा है जिससे दिन की लंबाई का समय घट जाता है। इससे शाम जल्दी ढलती है और हमें सूर्य की ऊर्जा का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है, बल्कि इससे स्वास्थ्य संबंधी कई नई परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। आधुनिक जीवन शैली ने हमसे कई और सुविधाएं भी छीन ली हैं। शहरी जीवन में ऊंची अट्टालिकाओं में बने कार्यालय, एक ही मंजिल पर कई-कई कार्यालयों के होने से हर कार्यालय में सूर्य के प्रकाश की सीधी पहुंच की सुविधा नहीं है। यही नहीं, जहां यह सुविधा है, वहां भी बहुत से लोग भारी परदों की सहायता से सूर्य के प्रकाश को बाहर रोक देते हैं और ट्यूबलाइट तथा एयर कंडीशनर में काम करना पसंद करते हैं। घर से कार्यालय के लिए सुबह जल्दी निकलना होता है। हम बस पर जाएं, ट्रेन पर जाएं या अपनी कार से जाएं, गाड़ी में बैठे रहने पर सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होता, अधिकांश कार्यालयों में सूर्य का प्रकाश नहीं होता और शाम को दफ्तर से छुट्टी के समय भी फिर गाड़ी का लंबा सफर हमें सूर्य के प्रकाश से वंचित कर देता है। घर आकर हम परिवार अथवा टीवी में यूं गुम हो जाते हैं कि सूर्य के प्रकाश की परवाह नहीं रहती। इस प्रकार हम प्रकृति के एक अनमोल उपहार से स्वयं को वंचित रख रहे हैं और अपने स्वास्थ्य का नुकसान कर रहे हैं।

अब वैज्ञानिकों ने एक और चेतावनी दे डाली है। “साइंस अडवांसेज” नामक पत्रिका में प्रकाशित एक शोध में कहा गया है कि धरती के सबसे ज्यादा आबादी वाले इलाकों में रातें खत्म होती जा रही हैं। मतलब यह कि रात तो हो रही है लेकिन अंधेरे में कमी आई है, कालिमा घट रही है। इसका कारण है कृत्रिम प्रकाश में हो रही बढ़ोतरी। इसका इंसान की सेहत और पर्यावरण पर खतरनाक असर पड़ सकता है। जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंसेज के क्रिस्टोफर काएबा और उनकी टीम ने सैटलाइट की मदद से रात के वक्त धरती पर बल्ब, ट्यूबलाइट जैसी चीजों से विभिन्न इलाकों में होने वाली रोशनी को मापा और पाया कि धरती के एक बड़े हिस्से में रात के समय कुछ ज्यादा रोशनी रहने लगी है। वैज्ञानिक हमें याद दिला रहे हैं कि रात और दिन का बंटवारा यूं ही नहीं है बल्कि इसके पीछे प्रकृति का एक निश्चित प्रयोजन है।

चुनावों के इस दौर में शोर ही शोर है। हमें इस शोर से उबर कर सोचना होगा कि जीवन में और क्या आवश्यकताएं हैं? सुविधा और विकास के नाम पर हम अपने ही साथ क्या खिलवाड़ कर रहे हैं? हमारे नेताओं का, बुद्धिजीवी वर्ग का, और मीडिया का ध्यान इन मुद्दों से क्यों भटक जाता है? क्यों हम सिर्फ उथली राजनीति और पेज-3 के समाचारों तक सीमित हो जाते हैं? विकास की इस दौड़ में हम अंधेरा और उजाला दोनों खोते जा रहे हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारा देश विकसित देशों की श्रेणी में आ जाए तो हमें विकास की योजनाएं बनाते समय नागरिकों के स्वास्थ्य को भी केंद्र में रखना होगा और यह हम सब की जि़म्मेदारी है कि हम किसी को भी यह सच भूलने न दें। आशा की जानी चाहिए कि नेतागण, बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया सभी मिलकर इस दिशा में सार्थक प्रयत्न करेंगे। 

लेखक पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। सन् 1999 में उन्होंने अपनी जनसंपर्क कंपनी “क्विकरिलेशन्स प्राइवेट लिमिटेड” की नींव रखी। उनकी दूसरी कंपनी “दि सोशल स्टोरीज़ प्राइवेट लिमिटेड” सोशल मीडिया के क्षेत्र में है। उनकी एक अन्य कंपनी “विन्नोवेशन्स” राजनीतिज्ञों एवं राजनीतिक दलों के लिए कांस्टीचुएंसी मैनेजमेंट एवं जनसंपर्क का कार्य करती है। एक नामचीन जनसंपर्क सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर होने के साथ-साथ वे एक नियमित स्तंभकार भी हैं। 

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आइंस्टीन ने ग्रैविटेशनल वेव्ज़ को बिना किसी ऑब्ज़र्वेटरी के सौ साल पहले सुन लिया था!

Sushobhit Saktawat : अल्बर्ट आइंस्टीन उर्फ अल्बर्ट आइंश्टाइन के कान बहुत तेज़ थे! पूरे सौ साल पहले, वर्ष 1916 में, अल्बर्ट आइंश्टाइन ने एक दूरगामी प्रत्याशा जताई थी। उस प्रत्याशा की तरंगें आज आकर हमसे टकरा रही हैं लेकिन आइंश्टाइन ने उन तरंगों को बहुत पहले ही सुन लिया था। आइंश्टाइन के कान सचमुच सवा तेज़ थे!

“थ्योरी ऑफ़ जनरल रिलेटिविटी” के ब्योरों पर बात करते हुए आइंश्टाइन ने कहा था कि “हो ना हो, ब्रह्मांड में ऐसी तरंगें ज़रूर मौजूद हैं, जो सुदूर अतीत में हुए बड़े टकरावों के कारण निर्मित हुई हैं।” इन तरंगों को उसने “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” कहकर पुकारा था।

किसी पोखर में कंकर फेंके जाने से जो लहरें बनती हैं, वर्तुलाकार वलय के रूप में केंद्र से दूर खिसकते हुए, वैसी ही तरंगें अंतरिक्ष में भी होना चाहिए, देश, काल, दूरी, द्रव्यमान, घनत्व, परिविस्तार और सुदूर आरंभ की ख़बर देने वालीं, ऐसा आइंश्टाइन का मानना था।

स्टीफ़न हॉकिंग ने एक बार कहा था कि “अल्बर्ट वॉज़ ऑलवेज़ द स्मार्टेस्ट मैन इन द रूम!” इसलिए जब अल्बर्ट ने वैसा कहा तो उसके आसपास मौजूद लोगों ने सहमति में सिर हिलाकर कहा कि “जी, ठीक है, आप कह रहे हैं, तो वैसा ही होगा!”

लेकिन विज्ञान “होगा” की भाषा में नहीं सोचता है। विज्ञान को “है” चाहिए। विज्ञान के लिए प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। साक्ष्य ही सत्य है!

अल्बर्ट के समय वैसे यंत्र नहीं थे, जो इन “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” को सुन सकें, लेकिन अल्बर्ट ने कहा है तो ज़रूर उसका कोई आधार होगा, यह कल्पना एक सदी तक वैज्ञानिकों के ज़ेहन में गूंजती रही।

अल्बर्ट आइंस्टीन

और फिर, आइंश्टाइन की प्रत्याशा के पूरे सौ साल बाद, यानी वर्ष 2016 में, लिविंग्स्टन, अमेरिका की “लीगो ऑब्ज़र्वेटरी” में वैज्ञानिकों ने पहली बार “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” को सचमुच में सुना। उनकी ख़ुशी और हैरत का ठिकाना नहीं रहा!

1.3 अरब प्रकाशवर्ष पूर्व दो “ब्लैक होल” आपस में टकराकर एक-दूसरे में मिल गए थे, उनकी “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” अंतरिक्ष में उठी लहरों की तरह पृथ्वी को छूते हुए आगे बढ़ रही थीं। इन “वेव्ज़” को अभी तक हमारे कान सुनने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन “लीगो ऑब्ज़र्वेटरी” ने इन्हें सुन लिया।

उन लोगों ने उस अद्भुत ध्वनि को एक “जेंटल चर्प” की संज्ञा दी। यानी एक मुलायम सी चहचहाहट!

1.3 अरब प्रकाशवर्ष पहले घटित हुई एक घटना ने हमें हाथ हिलाकर “वेव” किया था। उसने कहा था कि “देखो, मैं यहां पर हूं, मेरा अस्त‍ित्व है। और तुम लोग अकेले नहीं हो!” अचानक, इस अंतरिक्ष में होने वाली घटनाएं एक सातत्य में श्रंखलाबद्ध हो गई थीं, और सबकुछ अंधेरे में नहीं था।

“ब्रोकाज़ ब्रेन” में नमक के एक कण पर विचार करते हुए कार्ल सैगन ने कहा था : “उस बुद्ध‍ि का कोई महत्व नहीं है, जो सबकुछ जान ले, या जिसके लिए सबकुछ अगम्य हो। हम इन दोनों अतियों के बीच में समय-समय पर कुछ चीज़ें जानते रहते हैं। और जो कुछ हम जानते हैं, वह अकारण नहीं होता।”

उसके बाद से तीन और “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” को सुना जा चुका है, जिसमें दो “न्यूट्रॉन स्टार्स” के आपस में टकराने से निर्मित हुई तरंगें भी शामिल थीं। अब उम्मीदें लगाई जा रही हैं कि शायद 13.8 अरब साल पुरानी उस परिघटना को भी सुना जा सकेगा, जब “बिग बैंग” के बाद ब्रह्मांड की उत्पत्त‍ि हुई थी!

जिस दिन “लीगो ऑब्ज़र्वेटरी” में पहली बार “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” को सुना गया, उसी दिन यह तय हो गया था कि यह खोज भौतिकी का नोबेल पुरस्कार जीतेगी!

लेकिन सवाल यह था कि नोबेल पुरस्कार दिया किसे जाए। इस प्रयोग में एक हज़ार से भी ज़्यादा वैज्ञानिक शामिल थे। और पिछले चालीस सालों से यह प्रयोग अनेक रूपों में जारी था।

पंद्रह दिन पहले भौतिकी के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की गई और “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” के अनुसंधान के लिए तीन अमेरिकियों को यह पुरस्कार दिया गया।

ठीक है! वे तीन अमेरिकी इस अभियान के दलनायक थे, प्रतीकात्मक रूप से उन्हें यह पुरस्कार दिया जा सकता था, यह भलीभांति जानते हुए कि वे तीन इस अनुसंधान का अंतिम निर्णायक बिंदु भर थे, संपूर्ण अनुसंधान नहीं।

जब मैंने सुना कि राइनर वेस्स ने “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार जीता तो “काव्य-न्याय” की एक युक्त‍ि मेरे ज़ेहन में कौंधी।

और वो ये कि वास्तव में राइनर वेस्स और उसके साथियों ने उस “तरंग” को सुना भर ही था, जो कि अल्बर्ट आइंश्टाइन के दिमाग़ में सौ साल पहले कौंधी थी!

कि अल्बर्ट आइंश्टाइन का सटीक “पर्सेप्शन” अपने आपमें किसी “बिग बैंग” से कम नहीं था, जिसने भौतिकी के भुवन में “वेव्ज़” उत्पन्न कर दी थीं।

भौतिकी की दुनिया कितनी मासूम है कि 1.3 अरब साल पहले हुए दो “ब्लैकहोल” के टकराव को वह आज सुनती है, लेकिन उसके आज सुने जाने को नहीं, उसकी उस पूरी की पूरी टाइमलाइन के प्रसार को वह रेखांकित करती है। लेकिन 100 साल पहले चली एक “विचार-तरंग” की टाइमलाइन को वह फ़रवरी 2016 में जाकर अवस्थित कर देती है और कहती है : “आख़ि‍रकार, “अब” जाकर हमने “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” को सुन लिया!”

इन “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” को अल्बर्ट आइंश्टाइन ने सौ साल पहले सुन लिया था, बिना किसी “लीगो ऑब्ज़र्वेटरी” की मदद के, “अब” तो हमने सहमति में सिर हिलाया है कि “हां अल्बर्ट, तुम सही थे।”

राइनर वेस्स और उनकी टीम को दिया गया नोबेल पुरस्कार केवल एक विनयशील स्मृति चिह्न भर है। वह एक सौजन्य पुरस्कार है। जीत का सेहरा “ग्रैविटेशनल वेव्ज़” के अनुसंधान के समूचे सौ साला उद्यम के सिर ही बांधा जावै, जिसका आरंभ बिंदु अल्बर्ट आइंश्टाइन के तेज़तर्रार कान थे।

एवमस्तु।

सोशल मीडिया के चर्चित लेखक और पत्रकार सुशोभित शक्तावत की एफबी वॉल से.

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मौत का दर्शन सुनाते इस आईएएस अफसर ने दे ही दी अपनी जान (देखें वीडियो)

शांति प्रिय और आध्यात्मिक स्वभाव वाले आईएएस अफसर मुकेश पांडेय बिहार में बक्सर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे. एक शाम वे सर्किट हाउस में अकेले रुकते हैं और खुद का एक वीडियो रिकार्ड करने लगते हैं. यह वीडियो अब उनके जीवन का अंतिम वीडियो बन चुका है. यह वीडियो उनकी निजी जिंदगी की दिक्कतों और जीवन के प्रति उनके नजरिए का गवाह बन जाता है. सुसाइड से ठीक पहले रिकार्ड किए गए इस वीडियो में उन्होंने पांच मिनट में ही काफी सारी बातें कही हैं. Continue reading

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यशवंत की कुछ एफबी पोस्ट्स : चींटी-केंचुआ युद्ध, दक्षिण का पंथ, मार्क्स का बर्थडे और उदय प्रकाश से पहली मुलाकात

Yashwant Singh : आज मैं और Pratyush Pushkar जी दिल्ली के हौज खास विलेज इलाके में स्थित डिअर पार्क में यूं ही दोपहर के वक्त टहल रहे थे. बाद में एक बेंच पर बैठकर सुस्ताते हुए आपस में प्रकृति अध्यात्म ब्रह्मांड आदि की बातें कर रहे थे. तभी नीचे अपने पैर के पास देखा तो एक बिल में से निकल रहे केंचुए को चींटियों ने दौड़ा दौड़ा कर काटना शुरू किया और केंचुआ दर्द के मारे बिलबिलाता हुआ लगा.

मैंने फौरन मोबाइल कैमरा आन किया और पूरे युद्ध को रिकार्ड करना शुरू किया. क्या ऐसा लगता नहीं कि ये जो नेचर है, प्रकृति है इसने हर तरफ हर वक्त प्रेम के साथ साथ युद्ध भी थोप रखा है, या यूं कहिए प्रेम के साथ-साथ युद्ध को भी सृजित कर रखा है. हर कोई एक दूसरे का शिकार है, भोजन है. डिअर पार्क की झील के बारे में प्रत्यूष पुष्कर बता रहे थे कि जो पंछी मर झील में गिरते हैं उन्हें मछलियां खाती हैं और जब मछलियां मर कर सतह पर आती हैं तो ये पंछी खा जाते हैं. ये अजीब है न दुनिया. जितना समझना शुरू कीजिए, उतना ही अज्ञान बढ़ता जाएगा. इस नेचर के नेचर में क्या डामिनेट करता है, प्रेम या युद्ध? मेरे खयाल से दोनों अलग नहीं है. इनमें अदभुत एकता है. केंचुआ-चींटी युद्ध का वीडियो देखें :

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क्या यशवंत दक्षिणपंथी हो गया है? ये सवाल करते हुए एक मेरे प्यारे मित्र मेरे पास आए. उनने सवाल करने से पहले ही बोल दिया कि पूरा रिकार्ड करूंगा. मैंने कहा- ”मेरे पास और क्या है जनपक्षधर जीवन के सिवा.” उनकी पूरी बातचीत इस इंटरव्यू में देख सकते हैं. देखें वीडियो :

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महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, कबीर… ये वो कुछ नाम हैं जिनसे मैं काफी प्रभावित रहा हूं. जिनका मेरे जीवन पर किसी न किसी रूप में गहरा असर रहा है या है. इन्हीं में से एक मार्क्स का आज जन्मदिन है. मार्क्स को पढ़-समझ कर मैंने इलाहाबाद में सिविल सर्विस की तैयारी और घर-परिवार छोड़कर नक्सल आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया. मजदूरों, किसानों, छात्रों के बीच काम करते हुए एक दिन अचानक सब कुछ छोड़छाड़ कर लखनऊ भाग गया और थिएटर आदि करते करते पत्रकार बन गया. मार्क्स ने जो जीवन दृष्टि दी, जो बोध पैदा किया, उससे दुनिया समाज मनुष्य को समझने की अदभुत दृष्टि मिली. आज मैं खुद को भले मार्क्सवादी नहीं बल्कि ब्रह्मांडवादी (मानवतावाद से आगे की चीज) मानता होऊं पर जन्मदिन पर मार्क्स को सलाम व नमन करने से खुद को रोक नहीं पा रहा. हालांकि यह जानता हूं कि आजकल विचारधाराएं नहीं बल्कि तकनालजी दुनिया को बदलने का काम कर रही है, फिर भी मार्क्स ने जो हाशिए पर पड़े आदमी की तरफ खड़ा होकर संपूर्ण चिंतन, उपक्रम संचालित करने की जो दृष्टि दी वह अदभुत है.

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You might be surprised to know that a spot on the surface of the Earth is moving at 1675 km/h or 465 meters/second. That’s 1,040 miles/hour. Just think, for every second, you’re moving almost half a kilometer through space, and you don’t even feel it.

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भड़ास4मीडिया इसी 17 मई को 9 साल का हो जाएगा. 17 मई 2008 को यह डोमेन नेम बुक हुआ था. जिस तरह पशु प्राणियों वनस्पतियों मनुष्यों आदि की एक एवरेज उम्र होती है, उसी तरह की उम्र वेबसाइटों-ब्लागों अचेतन चीजों की भी होती है, खासतौर पर उन उपक्रमों का जो वनमैन आर्मी के बतौर संचालित होते हैं, किसी मिशन-जुनून से संचालित किए जाते हैं. भड़ास के इस नौवें जन्मदिन पर कब और कैसा प्रोग्राम किया जाएगा, यह तय तो अभी नहीं किया है लेकिन कार्यक्रम होगा, ये तय है. मीडिया के कुछ उन साथियों को भी सम्मानित करना है जो लीक से हटकर काम कर रहे हैं, जिन्होंने साहस का परिचय देते हुए प्रबंधन को चुनौती दी, कंटेंट के लिए काम किया, सरोकार को जिंदा रखा. आप लोग भी इस काम के लिए उचित नाम सजेस्ट करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

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आजकल उन कुछ लोगों से मिल रहा हूँ जिनसे रूबरू बैठने बतियाने की हसरत ज़माने से थी। जिनको पढ़ पढ़ के बड़ा हुआ, जिनको हीरो की तरह प्रेम किया, उनसे आज दोपहर से मुखातिब होने का मौका मिला है।

इन्हें शानदार कवि कहूं या अदभुत कथाकार-उपन्यासकार या ग़ज़ब इंसान। इन्हें भारत का नाम विदेशों में रोशन करने वाला अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक व्यक्तित्व कहूं। वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ तब पढ़ा था मैंने जब फुल कामरेड हो गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुवेशन करने के बाद जब बीएचयू बतौर होलटाइमर कामरेड के रूप में पहुंचा तो Uday Prakash जी की लिखी पहली कहानी पढ़ने के बाद उनकी कई कहानियां-रचनाएं पढ़ गया, फिर खोजता पढ़ता ही गया। ये लिविंग लीजेंड हैं, भारतीय साहित्य जगत के। इनसे मिलवाने के माध्यम बने पत्रकार भाई Satyendra PS जी। चीयर्स 🙂 (photo credit : भाभी कुमकुम सिंह जी)

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आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे का गाजीपुर में जो सम्मान समारोह आयोजित किया गया, उसमें सबसे मजेदार पार्ट था ट्वंटी ट्वंटी के अंदाज में फटाफट सवाल जवाब. कई सवालों पर उन्हें नो कमेंट कहना पड़ा. उस आयोजन की पूरी रिपोर्ट कई वेबसाइटों, अखबारों, चैनलों पर आई लेकिन अभी तक भड़ास पर कुछ भी अपलोड नहीं किया गया. जल्द ही पूरी रिपोर्ट भड़ास पर आएगी और यह भी बताया जाएगा कि आखिर भड़ास ने इस आईपीएस को सम्मानित करने का फैसला क्यों किया. फिलहाल यह वीडियो देखें. शायद कुछ जवाब आपको मिल जाए. वीडियो में खास बात यह है कि आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे पूरी ईमानदारी से बेलौस सब कुछ बता गए. इस दौरान कुछ यूं लगे जैसे यह शख्स हमारे आपके बीच का ही है. उनकी खासियत भी यही है. वह सबसे पहले आम जन के अधिकारी हैं. इसी कारण उन्हें खुद के लिए उर्जा आम जन के लिए काम करने से मिलती है. आगे और भी वीडियो अपलोड किए जाएंगे. फिलहाल इसे देखें…

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ट्रेवल ब्लॉगर Yashwant Singh Bhandari पर दिल्ली पुलिस के जवानों ने बोला धावा। लाल किले की बाहर से तस्वीर ले रहे थे। एक डॉक्यूमेंट्री के लिए दूर से खड़े होकर लाल किले के आउटर साइड को शूट कर रहे थे। जवानों ने धावा बोलकर न सिर्फ पीटा बल्कि पैसे भी छीन लिए। जब उन्होंने मुझे कॉल किया मदद के लिए तो मैंने 100 नंबर डायल करने की सलाह दी। इस बीच पुलिस वाले भड़क गए और भंडारी की पिटाई करने लगे। किसी तरह वो जान बचाकर भागे। पर्यटन को ऐसे ही बढ़ावा देगी राजनाथ की दिल्ली पुलिस! हम सभी को इस घटना की निंदा करनी चाहिए और दोषी पुलिसवालों को बर्खास्त करने की मांग रखनी चाहिए।

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मोदी जी लग रहा है नाक कटवा देंगे. भक्त बेहद निराश हैं. मोदी जी में अचानक मनमोहन सिंह नजर आने लगे हैं जो न कुछ करता है न बोलता है. इतना कुछ देश विरोधी हो रहा है. कैंची की तरह चलने वाली जुबानें खामोश हैं. पाकिस्तान से लेकर नक्सलवाद तक, कश्मीर से लेकर महंगाई तक, सब कुछ भयंकर उठान पर है. लोग तो कहने लगे हैं कि जब देश चाय वाले के हवाले कर देंगे तो यही सब होगा. कुछ कर डालिए मोदी जी, आपसे भक्तों की पुकार आह्वान सुन सुन कर मेरी भुजाएं फड़कने लगी हैं. अब ऐसे में कैसे चुप रह सकते हैं. जरूर आप कोई नई योजना बना रहे होंगे. न भी बना रहे होंगे तो चैनल वाले अपने तीसरे आंख से योजना की भनक लगा लेंगे और आपके इंप्लीमेंट करने से पहले ही ‘दुश्मनों’ को मारे काटे गिराते जाते हुए दिखा देंगे और भक्त समेत पूरा देश एक बार फिर मोदीजीकीजैजै करने लगेगा… आंय.. मुझे कुछ आवाजें धांय धूंय धड़ाम की सुनाई पड़ने लगी हैं, वाया रजत शर्मा के इंडिया टीवी… कई अन्य चैनलों के एंकर भी तोप और राइफल तानने लगे हैं अपने अपने स्टूडियो में… आप आनंद से सोइए, मीडिया वाले आपका काम कर ही डालेंगे… आइए हम सब बोलें भामाकीजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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भारतीय वैज्ञानिक अशोक सेन की खोज- यह दुनिया बहुत ही महीन छोटे धागों से बनी है!

प्रवीण झा

Praveen Jha : भारत से विज्ञान का नोबेल अगर मेरे जीते-जी किसी को मिला, तो वो इलाहाबाद में अपना जीवन बिताने वाले मनुष्य को मिलेगा। भविष्यवाणी है, लिख कर रख लीजिए। दरअसल यह बात मुझे एक नोबेल विजेता ने ही कही। अब इसे भाग्य कहिए या इत्तेफाक, भौतिकी के नोबेल विजेता ऐंथॉनी लिगेट के साथ एक डिनर मैनें भी किया। मुझसे कोई लेना-देना नहीं था, पर मेरे रूममेट घोष बाबू के गाइड थे। तो उन्हें हमारे घर भोजन पर बुलाया था। लिगेट साहब ने कहा कि भारत के अशोक सेन को नॉबेल जरूर मिलेगा, बशर्तें की उनकी थ्योरी प्रूव हो जाए।

अशोक सेन एक अजीब सरपकाऊ थ्योरी पर काम करते रहे हैं, जिसका जिक्र मेरे किताब में भी है। आखिर दुनिया बनी किस चीज से है? वह मूलभूत कण है क्या? अणु, परमाणु, क्वार्क और पता नहीं क्या-क्या आ गए। पर सेन साहब कहते हैं, यह धागों से बनी है, बहुत ही महीन छोटे धागों से। यह तीन डाइमेंसन के कण नहीं, बल्कि ९ या उससे भी ज्यादा डाइमेंसन के धागे हैं। यही ‘स्ट्रिंग थ्योरी’ है जिसके सबसे बड़े प्रणेता वैज्ञानिकों में अशोक सेन हैं। कई लोगों ने स्ट्रिंग छोड़ दी, सेन साहब ने पकड़ा हुआ है।

मैं भी भूल गया था कि सेन साहब का क्या हुआ? वो डिनर तो २००२ ई. की बात है। पता लगा कि सेन साहब को एक दिन अलाहाबाद के बैंक से फोन आया कि उनके एकाउंट में तीन मिलियन डॉलर आ गए। कहाँ से आए, क्यूँ आए? अलाहाबाद का अदना प्रोफेसर इतनी बड़ी रकम कैसे कमा सकता है? हुआ यूँ कि उन्हें अचानक एक दिन भौतिकी का सबसे कीमती अवार्ड मिला जो नोबेल की तीन गुणा रकम थी। सेन साहब तो सोच से बढ़कर निकले।

ये लोग हैं ही सोच से बढ़ कर। मैं पहले भी चर्चा कर चुका हूँ कि लिगेट साहब ने कहा था, “लोग नैनोपार्टिकल बनाने में लगे हैं। डॉक्टर! तुम बताओ, ये जो वायरस है, वो तेजी से दौड़ने वाला जिंदा नैनोपार्टिकल नहीं है क्या?” और हँसने लगे। अभी हाल में नेचर मैगजीन से पता लगा कि किसी वैज्ञानिक ने वायरस को नैनोपार्टिकल बनाकर प्रयोग शुरू किया। जहाँ इनकी सोच शुरू हुई, वो तो लिगेट ने हँसते-खेलते पंद्रह बरख पहले कह दिया था।

वैज्ञानिक अशोक सेन के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें : 

Ashoke Sen: India’s million-dollar scientist

दरभंगा के निवासी और इन दिनों नार्वे में कार्यरत ब्लॉगर और रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर प्रवीण झाकी एफबी वॉल से.

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यशवंत का विकास, ब्रह्मांड और अध्यात्म चिंतन

Yashwant Singh : ब्रह्मांड में ढेर सारी दुनियाएं पृथ्वी से बहुत बहुत बहुत पहले से है.. हम अभी एक तरह से नए हैं.. हम अभी इतने नए हैं कि हमने उड़ना सीखा है.. स्पीड तक नहीं पकड़ पाए हैं.. किसी दूसरे तारे पर पहुंचने में हमें बहुत वक्त लगेगा.. पर दूसरी दुनियाएं जो हमसे बहुत पहले से है, वहां संभव है ऐसे अति आधुनिक लोग हों कि अब वे टेक्नालजी व बाडी को एकाकार कर पूरे ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे हों, कास्मिक ट्रैवल पर हों…उनके लिए हमारे रेडियो संदेश इतने पिछड़े हों कि वे उसे इगनोर कर दें या पढ़ कर जवाब दें तो उस जवाब को समझने में हमें सैकड़ों साल लग जाएं….

जरूरी नहीं कि जीवन वहीं हो जहां कार्बन हो… कार्बन विहीन लेकिन सिलिकान बहुल दुनियाओं में भी जीवन है और वहां के जीवन फार्मेट, पैरामीटर, शक्ल-सूरत अलग है… दूसरी दुनियाओं को समझने के लिए जिंदा होने की अपनी परिभाषा को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है. बेहद ठंढे और बेहद गर्म दुनियाओं में जीवन है… जीवन बहुत मुश्किल से मुश्किल स्थितियों में बहुत कम एनर्जी से भी कायम रह पाने में संभव है… सरवाइवल के लिए इंटेलीजेंस का होना जरूरी नहीं है… सरवाइवल बेहद मुश्किल हालात में बहुत कम एनर्जी से भी संभव है… जीवन पनपने के जो मूलभूत आधार धरती के लिए अनिवार्य हों वही अन्य दुनियाओं के लिए होना जरूरी नहीं…

धरती पर जो कुछ भी है वह दूसरी दुनियाओं से आया हुआ है.. हम मनुष्य खुद भी यहां धरती के नहीं हैं… हमारा सब कुछ स्टार डस्ट से बना है… यहां लोहा से लेकर कार्बन तक दूसरी दुनियाओं के उठापटक विस्फोट संकुचन के जरिए गिरता उड़ता गलता सुलगता फटता हुआ आया है… ऐसा संभव है कि ब्रह्मांड कि किसी दूसरी उन्नत दुनिया में कोई सुपर इंटेलीजेंट सुपर डेवलप सभ्यता हो जिसके सामने हम बच्चे ही नहीं बल्कि बिलकुल नए हैं.. वे हम पर नजर रखे हुए हों… ऐसा संभव है कि पूरे ब्रह्मांड के संचालन में कुछ बेहद समझदार और बेहद प्राचीनतम जीवन – सभ्यता का हाथ हो, जिन्हें हर तारे के बुझने, जन्मने, फटने, हर ग्रह और उपग्रह पर जीवन के पैदा होने व नष्ट होने का सही सही हिसाब पता हो… और इस कारण वे अपने को अपनी बेहतरीन तकनीक के जरिए, कास्मिक ट्रैवल के माध्यम से एक तारे से दूसरे तारे या एक ग्रह से दूसरे ग्रह या एक दुनिया से दूसरी दुनिया या एक गैलेक्सी से दूसरी गैलेक्सी या एक प्लानेट से दूसरे प्लानेट में शिफ्ट कर लेने में सक्षम हों…

जीवन की जो परिभाषा हमने गढ़ रखी है, वह काफी संकुचित और स्थानीय है. अदृश्य में भी जीवन संभव है, स्थिर में भी जीवन संभव है.. हमने इंटेलीजेंट एलियन्स को लेकर अपने मन-मुताबिक धारणाएं, तस्वीरें, कहानियां पाल रखी हैं.. वो दूसरी दुनियाओं में वहां के माहौल के हिसाब से बिलकुल अलग तरीके के जीवित हो सकते हैं जिन्हें संभव है हम जिंदा ना मानें…

डिस्कवरी साइंस चैनल पर यूनीवर्स को लेकर कई तरह के प्रोग्राम आते रहते हैं जिससे मिले ज्ञान के कुछ अंश की कड़ियों को अक्रमबद्ध रूप से जोड़ने-तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश 🙂 .. और इसी प्रक्रिया में उपजी ये चार लाइनें…

हर रोज खुद को तुम को सब को बड़े आश्चर्य से निहारता हूं
हर रोज ज़िंदगी होने, न होने के बीच के थोड़े मायने पाता हूं
हर रोज अपने अंदर-बाहर के दुनियादारी से दूर हुआ जाता हूं
हर रोज कुछ नया कुछ चमत्कार सा हो पड़ने का भ्रम पाता हूं

जैजै

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उपरोक्त तस्वीर को फेसबुक पर ”आजकल मेरी हालत ऐसी है” शीर्षक से डाला तो तरह तरह के कमेंट्स की बाढ़ आ गई. कमेंट व लाइक के लिए शुक्रिया. हंसने, मजाक मानने और मुझको मजाक समझने के लिए भी शुक्रिया. असल में यह तस्वीर देखकर मेरे दिमाग में जो बात तत्काल आई उसे आपके सामने रखना चाहता हूं.. जो इस प्रकार है….

हरे-भरे खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, नदी-तालाब, फूल-पौधे, तारे-आसमान सब छोड़कर जब हम कहीं दूर चल पड़े तो कंकड़-पत्थर, धुआं-प्रदूषण, शोर-अशांति, भागमभाग-भीड़, एक खास किस्म के जानवरों यानि आदमियों की रेलमपेल के बीच फंस गए और उसमें जिंदा बचे रहने के लिए जो संघर्ष शुरू हुआ, उसका कोई अंत नहीं… हर दिन कुछ नष्ट होते जाने, कमजोर होते जाने, हारते जाने का भाव मन में बढ़ता गया…

हम मनुष्यों ने खूब विकास किया है, खूब तरक्की की है वाले डायलाग के उलट इस दुनिया का सबसे ज्यादा नुकसान हम मनुष्यों ने किया है.. और ऐसी स्थिति बना दी है कि सिर्फ हम मनुष्य ही नहीं, हर गैर-मनुष्य भी खुद के सरवाइवल को लेकर असुरक्षित, संघर्षरत, बीमार महसूस करने लगा है…

मैं चेतन हूं, गाड पार्टिकल हूं, आपमें हूं, आपसे इतर जो जिंदा हैं उनमें भी हूं. उनमें भी हूं जो जड़ है और स्थिर है.. सब मिलजुल कर मैं हूं, और यह मैं कोई एक नहीं पूरा ब्रह्रांड है, जिसके अनंत छोटे छोटे मैं यहां वहां जहां तहां बिखरा हुआ है… इसलिए मैं इस स्कूटर में भी हूं, बकरी में भी हूं, मिट्टी में भी हूं, पत्ती में भी हूं, आपमें भी हूं, खुद में भी हूं…
हम फंसे हुए लोग अक्सर महसूस नहीं कर पाते कि हम फंसे हुए हैं क्योंकि कई बार फंसना इतना स्थायी और जन्मना होता है कि हम फंसने को ही सहज-स्वाभाविक मान लेते हैं…
चलिए, मेरे हाल पर हंसिए… पर जरा गौर से देखिए,, कहीं ऐसा तो नहीं कि जो हाल मेरा है, वही हाल तेरा है… 🙂

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पेड़ पत्ती फूल आसमान धूप हवा
तेरी कारीगरी पर फ़िदा हूं दोस्त
इनसे अलग भला मेरा वजूद कहाँ

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की कुछ पुरानी एफबी पोस्ट्स का संकलन. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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पानी की कमी से जैसे हड़प्पा का नाश हुआ, वैसे ही आधुनिक शहरी-औद्योगिक सभ्यता का सत्यानाश होगा : अनिंद्य सरकार

Pushya Mitra : हड़प्पा में हाल के दिनों में हुए एक्सकेवेशन करने वाली टीम के मुखिया अनिंद्य सरकार से रंजीत और अखिलेश्वर पांडे ने लम्बी बातचीत की है। यह बातचीत प्रभात खबर में प्रकाशित हुई है। यह काफी महत्वपूर्ण बातचीत है। इसका विषय शहरी जीवन और पर्यावरण है। उत्खनन से यह पता चला है कि आठ हजार साल पहले अस्तित्व में आई इस महान सभ्यता का पतन पर्यावरण सम्बन्धी कारणों से हुआ। मानसून कमजोर पड़ने लगा और सरस्वती नदी सूख गयी।

मगर रोचक बात यह थी कि हड़प्पा वालों ने इसके बावजूद अपनी सभ्यता को तालाबों की मदद से हजारों साल तक जिन्दा रखा। जब कोई चारा नहीं बचा तो लोगों ने शहरों को नष्ट हो जाने दिया और गांवों को अपना लिया। इस सन्दर्भ में समझने वाली बात यह है कि इस बार हमारी नागरीय और औद्योगिक महज 200 साल पुरानी है। दो सौ सालों में ही हमने धरती को जीने लायक नहीं छोड़ा है और न ही हम इसे बचाने को लेकर गंभीर हैं। यह खोज हमें यह भी सिखाती है कि अगर लम्बे समय तक धरती पर इंसानी अस्तित्व को कायम रखना है तो हमें पर्यावरण प्रिय ग्रामीण जीवन को अपनाना होगा।

प्रकृति का सान्निध्य, फूस के घर, जैविक खेती, पशुपालन, प्रकृति का न्यूनतम दोहन। जो हमारे पूर्वज पिछले चार हजार साल से करते आये हैं। उन्होंने हड़प्पा की नगरीय सभ्यता को ठुकरा कर ग्रामीण जीवन शैली को अपनाया। भौतिक उपलब्धियों के बदले आध्यात्मिक उपलब्धियों को जीवन का लक्ष्य बनाया। हर बार भारत दुनिया को यही सन्देश देता रहता है। बुद्ध से लेकर गाँधी तक। मगर कई बार हम खुद अपने पूर्वजों के सिद्धन्तों पर भरोसा नहीं करते। पश्चिम के भौतिकतावाद को अपनाने के लिए आतुर हो जाते हैं।

अनिंद्य सरकार का पूरा इंटरव्य पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

Prabhat Khabar page interview

पत्रकार पुष्य मित्र के फेसबुक वॉल से.

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जानिए, अपने सूट में पेशाब करते हुए स्पेस में जाने वाले पहले व्यक्ति कैसे बन गए थे एलन शेफर्ड

POOP IN SPACE : कृपया नाक पर रुमाल रख कर के पोस्ट पढ़ें…

5 May, 1961… Freedom-2 स्पेस शटल…. के कैप्सूल कक्ष में बैठे अमेरिकन अन्तरिक्ष यात्री Alan Shephard उत्सुकता से उस पल का इन्तजार कर रहे थे जब…. विश्व के दुसरे….और अमेरिका के प्रथम अन्तरिक्ष यात्री बनने का सेहरा उनके सर पर सजने जा रहा था मन अन्तरिक्ष से अपनी पृथ्वी को निहारने की कल्पनाओं के जाल में उलझा था और उन्हें पता चला की उनकी फ्लाइट में विलम्ब होगा.. 5 घंटे बीत गए और उन्हें… पेशाब लग आई.

अब उनकी फ्लाइट चूँकि सिर्फ 15 मिनट की थी और विलम्ब हो जाएगा ऐसा किसी को आईडिया था नहीं …..नासा को लगा था की 15 मिनट तो आदमी पेशाब रोक ही सकता है तो उन्होंने इस स्थिति के लिए कोई तैयारी नहीं की थी. एलन शेफर्ड की हालत ख़राब हो चुकी थी. स्पेस सूट उतार के पेशाब करवाने और वापस स्पेस सूट पहनाने की जहमत कराने का वक़्त नहीं था तो… मरता क्या ना करता. इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के फ़ैल होने का ख़तरा होने के वावजूद… एलन शेफर्ड को कहा गया कि… “स्पेस सूट के अंदर ही कर दो मियां”… और इस तरह… एलन शेफर्ड अन्तरिक्ष में जाने वाले दुसरे इन्सान… या यूं कहें कि… अन्तरिक्ष में अपने मूत्र में सने सूट में जाने वे प्रथम व्यक्ति बन गए.

आपको क्या लगता है? अन्तरिक्ष यात्री होना बड़ा मजेदार है? Well Yes… But Not… When It Comes To Poop Or Pee In Space !!! आज बेशक नासा ने 19 मिलियन डॉलर की लागत से तैयार टॉयलेट… स्पेस शटल में लगाए है जिनमें ठीक से पोट्टी करने के लिए भी…बकायदा ट्रेनिंग दी जाती है क्युंकि कमोड का होल….आपकी पोट्टी को प्रेशर द्वारा खीच के Wastage Tank में पहुचा दे…इसके लिए बाकायदा आपको अपना Asshole.. कमोड के छेद के ऊपर 90 डिग्री के एंगल पर टिकाने की ट्रेनिंग दी जाती है Sounds weird… Right? और आज कल स्पेस शटल में रीसायकल सिस्टम इनस्टॉल होने के कारण आप पेशाब कर.. अपने ही पेशाब को रीसायकल कर दोबारा पीते है पर चीजे हमेशा इतनी आसान नहीं थी. एलन शेफर्ड वाले केस के बाद नासा को समझ आ गया कि अगर लम्बी दूरी के मिशन प्लान करने है तो… “नम्बर एक” और “नम्बर दो” का कुछ करना पडेगा.

शुरू में एस्ट्रोनॉट्स को एक “कंडोम शेप” पाइप कनेक्टेड पाउच दिया जाता था जिसमे अपने लिंग को डाल के उसके अन्दर पेशाब करते थे और यूरिन एक पाउच में इकठ्ठा हो जाता था. ये सिलसिला तब तक चला…जब तक की 1963 में प्रोजेक्ट “मरकरी स्पेस शटल” में तकनीकी खराबी के कारण उसे इमरजेंसी लैंडिंग नहीं कराना पडा …..क्योंकि बाद में पता चला की अन्तरिक्ष यात्री के पेशाब करते वक़्त मूत्र की कुछ बूंदे छिटक के स्पेस क्राफ्ट की मशीनरी में चली गई थी….जिससे यान में तकनीकी खराबी उत्पन्न हुई.

खैर….उसके बाद… ऐसा सिस्टम डेवलप किया गया…जिसमे अन्तरिक्ष यात्रियों का मूत्र सीधे अन्तरिक्ष में ड्राप कर दिया जाता था. पर मूत्र अन्तरिक्ष में जाने के बाद जम जाता था और पृथ्वी के चारो तरफ चक्कर लगा रहे स्पेस शटल से टकरा कर ये सैटेलाइट्स के विनाश का कारण बन सकता था. इसलिए यूरिन रीसायकल सिस्टम डेवलप किया गया खैर…

ये थी पुराने समय में मूत्र त्याग के तरीकों की कहानी. अब बात करते हैं नम्बर दो की.

स्पेस टॉयलेट ना होने के कारण… पहले की समय में हुई अंतरिक्ष यात्राओ में नासा की ओर से एस्ट्रोनॉट्स को एक प्लास्टिक पाउच दिया जाता था जिस पाउच को एस्ट्रोनॉट्स अपने पिछवाड़े में चिपका लेते थे और ये पाउच उनका मल इकट्ठा करता रहता था सिर्फ एक प्रॉब्लम थी Micro Gravity creates a lot of mess in space क्यूंकि जब आप मलत्याग करते है तो ग्रैविटी के अभाव में आपके Asshole से निकलने वाली सुगन्धित वस्तु ये नहीं जानती की उसे नीचे भी गिरना है और आपके गुदाद्वार से बाहर निकलते ही… मल छेद से चिपका चिपका हवा में तैरने लगता है और आपके पास कोई रास्ता नहीं बचता सिवाय इसके कि उस प्लास्टिक पाउच के चारो तरफ दी गई फिंगर कोटिंग की सहायता से आप खुद अपने छेद से बाहर लटक रही वस्तु को ऊँगली से साफ़ करें.

जब तक स्पेस टॉयलेट का आप्शन नहीं था तब तक एस्ट्रोनॉट्स को इसी तरीके से नम्बर दो करना पड़ता था और जब भी एस्ट्रोनॉट्स स्पेस शटल के बाहर अन्तरिक्ष में जाते थे तो उनके सूट के अन्दर ये दोनों पाउच फिट रहते थे जिससे अंतरिक्ष में किसी इमरजेंसी में… अस्ट्रॉनॉट्स हल्के हो सके. Regard Less To Say… जब नील आर्मस्ट्रांग ने पृथ्वी से लगभग 4 लाख किलोमीटर दूर मौजूद… चाँद की सतह पर मानवता का पहला कदम रखा तब….उनके सूट के अंदर वो पाउच फिट था.

A Giant Step For Mankind.. With A Load Of Shit Behind !! SHIT HAPPENS !!!

लेखक विजय सिंह ठकुराय फेसबुक पर यूनीवर्स और स्पेस को लेकर लिखने वाले लोकप्रिय राइटर हैं. विजय को एफबी पर फालो करने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : VST on FB


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…तब हमारा ब्रह्माण्ड लिंग नुमा सुरंग में धंसते हुए निकटवर्ती ब्रह्माण्ड में समाहित हो जाएगा!

(विजय सिंह ठकुराय)


अब बात ब्रह्माण्ड के अंत से लेकर आरम्भ तक की. THE BEGINNING OF EVERYTHING. लगभग 13.7 अरब वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड में समय और काल की अवधारणा शून्य थी. भौतिकी के नियम अस्तित्व में नहीं थे. दृश्य ब्रह्माण्ड का समस्त पदार्थ अपने फंडामेंटल स्वरुप (क्वार्क-ग्लुआन प्लाज़्मा) के रूप में एक पिन पॉइंट के आकार के द्रव्यमान (10^-26 मीटर) में सिमटा हुआ था. और एक विस्फोट हुआ.

ब्रह्माण्ड फैलने लगा विस्फोट के 0.00000000000000000000000000000000000000000001 (10^-43) सेकंड के बाद ये ब्रह्माण्ड एक क्षण के खरबवे हिस्से में अरबो खरबो गुणा फ़ैल चुका था. क्वार्क ग्लुआन प्लाज़्मा ने मिल कर प्रोटान न्युट्रान बनाने शुरू किये… अगले कुछ लाख वर्ष में ब्रह्माण्ड धीरे धीरे इतना शीतल होता गया कि ब्रह्माण्ड का “सुपर फ़ोर्स फील्ड” इलेक्ट्रो फ़ोर्स और स्ट्रांग तथा वीक फ़ोर्स में विभक्त होता गया. धीरे धीरे प्रोटान न्यूट्रान ने इधर उधर मंडराते लेप्टान कणों (इलेक्ट्रोन) को कैप्चर कर के परमाणुओ का निर्माण किया. फिर हाइड्रोजन बनी. फिर हीलियम, सितारे, सौरमंडल, पृथ्वी, प्रथम कोशिका… All the way through evolution… us Humans!.

जो लोग फंडामेंटल पार्टिकल्स के व्यवहार की सबसे सफल व्याख्या करने वाले “स्टैण्डर्ड मॉडल” को समझते है, उनके लिए इस “एटॉमिक एवोल्युशन” को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं. देखा जाए तो पिछली एक शताब्दी में हमें ऐसे अनगिनत सबूत मिले है जो “बिगबैंग थ्योरी” को सही साबित करते हैं. बिगबैंग थ्योरी निर्विवाद रूप से सत्य है. आज मेरा सवाल ये है कि चूँकि हमारे द्वारा नापी जा सकने वाली समय की सबसे छोटी इकाई (10^-43 सेकंड) है. इस कारण आज से 13.7 अरब वर्ष पूर्व शुरू हुए ब्रह्माण्ड के निर्माण के क्षण के 10^-43 सेकंड के बाद हमें मालुम है कि क्या हुआ था लेकिन…उस विस्फोट से पहले क्या था? विस्फोट हुआ ही क्यों? विस्फोट के आस पास क्या था? मै जानता हूँ कि ये सवाल अक्सर आपको परेशान करते होंगे.

हम समय के चक्र में पीछे जा कर उस विस्फोट को नहीं देख सकते. चूंकि हमें कुछ भी देखने के लिए “फोटान” की जरूरत होती है और चूंकि बिगबैंग के 380000 साल तक पदार्थ इतनी dense अवस्था में था कि फोटान का उस “उच्चतम घनत्व की बाल” को चीर कर निकल पाना संभव नहीं था. टेलिस्कोप की सहायता से भूतकाल में झाँक सकते हैं So all we have… is a faint picture of microwave radiation 380000 years afterwards “Big Bang”…. and few wild guesses!!! ब्रह्माण्ड निर्माण के 380000 साल बाद कैसा दिखता था, जानने के लिए ये फोटो देखें.

तो सवाल ये है कि ब्रह्माण्ड के आरंभ से पहले क्या था?” और जवाब है कि सही जवाब के लिए शायद हमें ब्रह्माण्ड की शुरुआत नहीं, बल्कि अंत को जानने की जरूरत है क्योंकि ब्रह्माण्ड का अंत ही हमें समझा सकता है The Beginning Of Universe. आगे के कंटेंट बहुत जटिल होने के कारण सरल भाषा में लिखने की कोशिश करूँगा. हम और आप तथा ब्रह्माण्ड की हर चीज फंडामेंटल लेवल पर ऊर्जा के तंतुओ (स्ट्रिंग्स) के वाइब्रेशन मात्र हैं. ऊर्जा का एक ख़ास गुण होता है कि ये उच्च स्थिति से निम्न स्थिति की ओर बहती है अर्थात अगर एक कमरे में आपने आइसक्रीम का एक कप रखा है तो आइस क्रीम पिघल के रूम टेम्परेचर पर आ ही जायेगी. हवा में छोड़े गए गुब्बारे पिचक के जमीन पर आ ही गिरेंगे. सितारे अपना ईंधन जला के एक ना एक दिन ठन्डे हो ही जायेंगे. ऊर्जा के वितरण को “एन्ट्रापी” में नापते हैं और ऊर्जा के समान वितरण साधने की इस प्रक्रिया में ब्रह्माण्ड एक ना एक दिन “परम संतुलन” अर्थात मैक्सिमम एन्ट्रापी की स्थिति प्राप्त कर लेगा अर्थात हर जगह ऊर्जा का समान लेवल होगा. हर जगह एक समान तापमान होगा और तब कुछ भी होना संभव नहीं होगा क्योंकि कुछ होने के लिए असंतुलन आवश्यक है. ऊर्जा का आदान प्रदान आवश्यक है. लहरों का लहरों से टकराना आवश्यक है.

इस परम संतुलन की स्थिति में ब्रहमाण्ड एक लहरों से विहीन सागर की शांत सतह के समान होगा. Universe Will Be Dead! ना दिन होगा ना रात. ना सत होगा ना असत. ना मृत्यु होगी ना अमरता. पर तभी इस लहरों से विहीन ब्रह्माण्ड में एक लहर उठती है अर्थात ‘इच्छा’ होती है जिसे हमारे पूर्वजों ने अपनी सीमित शब्दावली में “प्रथम विक्षोभ” अथवा “इच्छा” की संज्ञा दी. तो ये ऊर्जा की लहर उठी कहां से? Well…Fortunately Science has an answer. ये इच्छा और कुछ नहीं, Quantum Fluctuations कहलाती है अर्थात पूर्ण रूप से निर्वात/Vacuum में भी “हाईजेनबर्ग के अनिश्चिन्ता सिद्धांत” के कारण ऊर्जा की लहरें उठती हैं और गायब होती हैं जिन्हें “वर्चुअल पार्टिकल्स” कहते हैं. ये प्रायोगिक सत्य है. दूसरे शब्दों में “शून्य” अर्थात ऊर्जा का पूर्ण रूपेण लोप हो जाना हमारे ब्रह्माण्ड में संभव नहीं है और वो शायद इसलिए क्योंकि हम और हमारा ब्रह्माण्ड शून्य आयाम से बहुत दूर है. शून्य आयाम… जहां से ये ब्रह्माण्ड संचलित है.

अब चलते हैं सर्न में मौजूद “लार्ज हेड्रान कोलाइडर” की तरफ. वही जहां पिछले दिनों “ईश्वरीय कण” हिग्स बोसान की खोज चल रही थी और गुड न्यूज़ ये है कि “हिग्स बोसान”,  जो कणों को उनका द्रव्यमान प्रदान करता है, मिल गया है और बुरी खबर है “हिग्स बोसान का खुद का द्रव्यमान” जो साफ़ साफ़ कहता है कि हम जिस ब्रह्माण्ड के टुकड़े में रहते हैं वो वास्तविक शून्य आयाम नहीं” बल्कि क्षद्म आयाम है अर्थात False Vacuum.

इसे आप इस तरह समझ सकते हैं. मान लीजिये आप अपने कमरे में फर्श से थोड़ी ऊंचाई पर एक कपड़े के चारों कोनों को दीवार में कील की सहायता से बाँध देते हैं. अब कमरे का फर्श तो हुआ “शून्य आयाम” अर्थात Zero Energy Ground State और कपड़े के ऊपर हमारा ब्रह्माण्ड तैर रहा है. ये ब्रह्माण्ड स्टेबल नहीं है. कभी ना कभी कील उखड़ के वो ब्रह्माण्ड नीचे जरूर गिरेगा जिसे “False Vacuum Decay” कहते हैं. अब चूंकि थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी के कारण हम जानते हैं कि कमरे में मौजूद उस कपड़े के ऊपर “जितने द्रव्यमान का पिंड होगा” वो ब्रह्मांड के फैब्रिक को उतना ही bent करेगा और अक्सर कपड़े का ये झुकाव निचले आयाम में मौजूद ब्रह्माण्ड को touch कर जाता है और निचले ऊर्जा स्तर के ब्रह्माण्ड से हमारे ब्रह्माण्ड में “lower energy” के बुलबुले आते रहते हैं जो कि हमारे ब्रह्माण्ड के उच्च ऊर्जा स्तर होने के कारण कोई असर नहीं दिखा पाते पर अब वापस आते हैं.

मैक्सिमम एन्ट्रापी की अवस्था में जब ब्रह्माण्ड लहर विहीन, शांत और lower energy state में है तो एक छोटी सी लहर One small fluctuation can do A LOT. ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का स्तर नगण्य होने के कारण उस लहर से हमारे ब्रह्माण्ड का फैब्रिक नीचे झुकेगा और समानांतर ब्रह्माण्ड से एक निम्न ऊर्जा का हिग्स वैक्यूम का बुलबुला निकल कर हमारे ब्रह्माण्ड से आएगा और हमारे ब्रह्माण्ड से निकटवर्ती ब्रह्माण्ड में बीच एक “लिंग नुमा सुरंग” बन जायेगी (इसीलिए सीमित शब्दावली के कारण हमारे पूर्वजों द्वारा लिखित ब्रह्माण्ड विज्ञान में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति “लिंग नुमा आकृति” से मिलती है).

हमारे ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तब निम्न होने के कारण प्रतिरोध के अभाव में बाजू वाले ब्रह्माण्ड से आया वो बुलबुला प्रकाश गति से हर तरफ फैलता चला जाएगा और हमारा ब्रह्माण्ड उस सुरंग में धंसता हुआ नीचे मौजूद ब्रह्माण्ड के आयाम में जा कर एक जगह पर इकट्ठा होना शुरू हो जाएगा. अति उच्च घनत्व पर ग्रेविटी प्रतिकर्षण (Repulsion) उत्पन्न करती है इसलिए एक सीमा के पश्चात विस्फोट होगा. And That’s Called BIG BANG !!!

निचले आयाम में निम्न ऊर्जास्तर पर फिजिक्स के नए नियमों के साथ ब्रह्माण्ड खुद को दोहराता है. नयी कहानियों की नयी इबारतें लिखी जाती हैं जिनमें से किसी कहानी का हिस्सा शायद हम हैं. मेरे लास्ट टॉपिक में मेंशन ब्रह्माण्ड के अंत में बचे “ब्लैक होल्स” के द्वारा भी ये प्रक्रिया संपन्न हो सकती है. लास्ट मोमेंट जब वे ब्लैक होल अपनी आयु पूरी कर रेडिएट होने के अंतिम चरण में होते हैं उस वक़्त ब्रह्माण्ड के “फैब्रिक” पर उनके द्वारा उत्पन्न झोल अथवा curve सबसे ज्यादा होता है. तो संभव है कि अंतिम क्षणों में वे ब्लैक होल्स उस कमरे में मौजूद कपड़े पर इतना दबाब डाल दें कि कपड़ा कील सहित नीचे आ गिरे और ऊपर लिखी प्रक्रिया दोहराई जाए But… However… Through Black holes or Fluctuation ऐसा होगा जरूर… और नए ब्रह्माण्ड में कहानी उसी पन्ने पर ख़त्म होगी जो हमारे लिए वर्तमान में हमारी कहानी का पहला पन्ना है. और ये कहानी युगों युगों से अनवरत चलती आ रही है. हमारा ब्रह्माण्ड हमारा “बबल यूनिवर्स” इस कहानी का एक अकेला पन्ना है. उस शून्य आयाम से हर क्षण ना जाने कितने ब्रह्माण्ड रुपी बुलबुले जन्म लेते हैं और ना जाने कितने ब्रह्मांड हर पल एक नयी कहानी का साक्षात्कार करते हैं. So…. That’s All It Is !!! “Programming Of Nature”. ब्रह्माण्ड के अंत और आरम्भ की प्रक्रिया को समझ लीजिये, जल्द आपको “शून्य आयाम” जहा से ये प्रक्रिया संचलित है, वहां भी ले चलेंगे.

So Coming To The End, इस सब में हिग्स बोसान कहां है? Well… हमारा ब्रह्माण्ड हिग्स फील्ड से निर्मित है और हिग्स बोसाेन की “प्रॉपर्टीज” में बदलाव के कारण ही ब्रह्माण्ड “वैक्यूम फेज ट्रांजीशन” की प्रक्रिया से गुजर कर एक नयी शुरुआत करता है. तो इसे “ईश्वरीय कण” कहना उचित है?? शायद नहीं… Indeed Its A Match… Spark… Fuse Which Caused The Big Bang. IT IS THE BANG… IN BIG BANG! Call It.. TRIGGER OF BIG BANG!!!

लेखक विजय सिंह ठकुराय दिल्ली में रहते हैं. उनका खुद का अपना बिजनेस है. फिजिक्स का शौक है. ब्रह्मांड और विज्ञान के पढ़ाकू हैं. इन सबके बारे में लिखते रहते हैं. फेसबुक पर सक्रिय विजय एक लोकप्रिय साइंस राइटर हैं जिनके हजारों फालोअर हैं. विजय से फेसबुक के जरिए संपर्क कर सकते हैं, उनका पता Facebook.com/vijay.singh.thakurai है.


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13 अप्रैल 2029 की सुबह धरतीवासियों की जिंदगी की आखिरी सुबह होगी अगर 350 मीटर लंबा उल्का पिंड टकरा गया

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13 अप्रैल 2029 की सुबह धरतीवासियों की जिंदगी की आखिरी सुबह होगी अगर 350 मीटर लंबा उल्का पिंड टकरा गया

(विजय सिंह ठकुराय)


महाप्रलय… क़यामत… डूम्स डे… THE END OF EVERYTHING… 13 अप्रैल-2029… हो सकता है… इस दिन की सुबह आपकी जिन्दगी की आखिरी सुबह हो.. APOSPHIS नामक 350 मीटर लम्बा उल्का पिंड 13 अप्रैल 2029 को, आज से ठीक 14 साल बाद, पृथ्वी की तरफ आएगा और 97.3% चांस है कि पृथ्वी की ग्रेविटी के कारण इस उल्कापिंड की कक्षा विचलित हो जाने के कारण ये पृथ्वी से 29470 km की दूरी से निकल जाएगा… इतनी कम दूरी होने के कारण आप “अपनी मौत के सामान” को नंगी आँखों से आसमान में जाते हुए देख सेल्फी ले पाएंगे लेकिन… 2.7% चांसेज है कि (हमारी कैलकुलेशन गलत हो सकती है) टकरा जाए और अगर ऐसा हुआ तो अगले क्षण की तुलना आप उस तबाही से कर सकते हैं जो “हिरोशिमा और नागासाकी” पर गिराए आणविक बम जैसे 65000 बम एक साथ पृथ्वी पर गिरा देने से आयेंगे… 2.7% यानि 1 in 37 chance… लेकिन मायूस होने की जरूरत नहीं….

भले ही ये उल्का पिंड पृथ्वी से टकरा जाए फिर भी आर्गुमेंट के लिए कहा जा सकता है कि मानव जाति का अंत नहीं होगा.. हममें से कुछ पृथ्वी के किसी ना किसी हिस्से में जरूर बच जायेंगे जो भविष्य की सभ्यताओं के ध्वज वाहक बनेंगे लेकिन… एक 1.5 किलोमीटर से लम्बी चट्टान अगर ब्रह्माण्ड से आ कर पृथ्वी से टकरा जाए तो हममे से एक भी अगले दिन का सूरज देखने के लिए ज़िंदा नहीं बचेगा. पृथ्वी के चारों तरफ ऐसी करोड़ों अरबों चट्टानें चक्कर लगा रही हैं, भले ही हम कितने भी स्मार्ट हो जाएं… Who knows… कब किसी रात को सोते हुए मौत दबे पाँव उतरे और हम सबका अंत कर दे.. वैसे ही…. जैसे 6 करोड़ साल पहले “डायनासोर” प्रजाति का अंत हो गया था.

But हम डायनासोर नहीं हैं… We are HOMO SAPIENS… और हम इन्सान निहायती स्मार्ट हैं… We Have Technology… और शायद भविष्य में और बेहतर तकनीक के साथ इस प्रकार के खतरों को भांप कर बचाव करना शायद ज्यादा मुश्किल ना हो. अपनी बेहतरीन टेक्नोलॉजी, और विज्ञान में अदभुत प्रगति के साथ इन्सान कितना भी एडवांस भले ही हो जाए पर… फिर भी… एक ना एक दिन उसे समर्पण करना होगा और तैयार होना पड़ेगा अपने अंत का सामना करने के लिए….

मानव जाति के लिए वो कौन सा पल होगा जब अपने ज्ञान, विज्ञान और सम्पूर्ण क्षमताओं के बावजूद वो उस दिन का साक्षात्कार करेगा जिसे कहा गया है.. क़यामत…. महाप्रलय…. जजमेंट डे….. ब्रह्मा का कल्पान्त… डूम्स डे… इन्साफ का दिन… THE END OF EVERYTHING… और, कहानी शुरू होती है आज से 5 अरब साल के बाद जब हमारा अपना सूर्य अपना सम्पूर्ण ईंधन जला कर “लाल दानव” में तब्दील हो चुका होगा धीरे धीरे… पृथ्वी पर मौजूद सभी महासागर सूख जायेंगे… ओजोन परत नष्ट हो जायेगी… और अगर पृथ्वी पर कोई सभ्यता मौजूद हुई तो. उसका हाल वही होगा जो भाड़ में झोंक दिए गए चने का होता है… सूर्य का महाघातक रेडिएशन पृथ्वी पर सभी प्रकार के जीवन को नष्ट कर चुका होगा और बीतते वक़्त के साथ आसमान में सूरज का साइज़ बड़ा होता जाएगा… मानो कोई आग का दानव मुंह खोले पृथ्वी को लील लेने के लिए चला आ रहा हो.

शायद उस वक़्त सौर मंडल में मौजूद सूर्य से अपेक्षाकृत दूर स्थित ग्रह जैसे शनि के “moon” आदि को किसी तरह “टेराफॉर्म” कर के जीवन योग्य बना के मानव जाति के साथ कूच कर जाना ही जीवन का एकमात्र तरीका होगा. आप कह सकते हैं कि पांच अरब सालों में इन्सान इतनी तरक्की अवश्य कर चुका होगा कि सौरमंडल में दूसरे ग्रहों पर बस्ती बना पाए… yeah.. शायद लेकिन…. दूसरे ग्रहों पर बस्ती बना लेना काफी ना हो बल्कि हो सकता है कि हमें तब दूसरी गैलेक्सीज में ही शरण ढूंढ़नी पड़े क्योंकि जब एक तरफ हम सूर्य की असहनीय गर्मी से जूझ रहे होंगे उसी वक़्त हमारी पड़ोसन गैलेक्सी “एंड्रोमेडा” दबे पाँव हमारी तरफ बढ़ रही होगी 300 किमी प्रति सेकंड की स्पीड से… आज से 3-4 अरब वर्षों में रात के आसमान में देखने पर किसी साइंस-फिक्शन मूवी की तरह हमारी तरफ बढ़ते खरबों पिंड दिखाई देंगे… साल दर साल.. आसमान में एंड्रोमेडा और बड़ी होती जायेगी और 5-6 अरब साल में…BOOOOOOOM !!!!

इस टक्कर के परिणाम सामान्य होने में 3-4 अरब वर्ष लगेंगे और दोनों गैलेक्सी एक हो जायेगी और इस नयी गैलेक्सी का नाम होगा “मिल्क-द्रोमेडा”. लेकिन माना जा सकता है कि स्मार्ट ह्यूमन इस टक्कर को भांप के किसी नजदीक की गैलेक्सी में शिफ्ट हो चुके होंगे और रात के आसमान में अपने बच्चों के साथ इस “टक्कर” को देखते हुए बियर पीने का मजा लूटेंगे.. Nothing To Worry!!! Or may be…. Many more reasons to worry…. वर्तमान में एंटी ग्रेविटेशनल फ़ोर्स “डार्क एनर्जी” के कारण ये ब्रह्माण्ड फैलता जा रहा है… गैलेक्सीज के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है… इसकी तुलना आप इस दृश्य से कर सकते हैं कि मैं और आप सड़क के दो कोनों में खड़े हैं.. हम दोनों अपनी जगह स्थिर हैं लेकिन…. हमारे बीच की दूरी बढती जा रही है…

हमारे गैलेक्सी के लोकल ग्रुप की इंटरनल ग्रेविटी इतनी शक्तिशाली है कि हम आपस में जुड़े हुए हैं पर दूर दूर की गैलेक्सी हर बीतते पल के साथ हमसे दूर होती जा रही है… 100 अरब सालो में दूरस्थ गैलेक्सी इतनी दूर जा चुकी होगी कि हम ब्रह्माण्ड में अकेले पड चुके होगे.. इंटरगैलेक्टिक ट्रेवल और कम्युनिकेशन संभव नहीं होगा… किसी भी दिशा में देखने पर हमें किसी भी गैलेक्सी के दर्शन नहीं होगे… अगर दूसरी किसी गैलेक्सी में मानवों की कोई दूसरी सभ्यता हुई तो हमें उन्हें उनके हाल पर छोड़ देने के लिए मजबूर हो जाना पड़ेगा… May be we will feel quite alone…. Or… may be less “Energetic”.

1 ट्रिलियन (1000000000000) साल में वर्तमान में मौजूद सभी तारे अपना सम्पूर्ण ईंधन जला के खपा चुके होगे और धीरे धीरे.. अपनी आभा खोने लगेंगे. One Star At A Time…. And… 100 ट्रिलियन सालों में सभी तारे मृतप्राय स्थिति में पहुच गए होगे और ब्रह्माण्ड शनै शनै अन्धकारमय होने लगेगा. इस वक़्त हमारे लोकल ग्रुप में मौजूद 54 गैलेक्सीज इंटरनल ग्रेविटी के कारण आपस में जुड़ के एक बड़ी महाविशालकाय गैलेक्सी में तब्दील हो चुकी होगी…. धीरे धीरे समय बीतता जाएगा… भले ही आसपास देखने रिसर्च करने के लिए कोई दूसरी आकाश गंगा ना हो.. फिर भी… कुछ अरब साल इन्सान पहले की तरह जिन्दादिली से जीते हुए दूर चली गई दूसरी गैलेक्सीज में मौजूद अपने दोस्तों, रिश्तेदारों की कहानियां अपने बच्चों को सुनाता हुआ बिता सकता है लेकिन… Fun time is seriously over now!!!

शायद… अब इन्सान का असली इम्तिहान होगा.. क्योंकि…अब वक़्त है… उनके जागने का जिन्हें कल्प गाथाओ में कहा गया है “महाकाल”. 10000 अरब वर्षो में Orbital Decay” के कारण गैलेक्सी में सभी मौजूद ग्रहों के घूमने की गति का क्षय होने लगेगा और अंत में अपनी गति खो के सभी ग्रह आकाश गंगा के केंद्र में मौजूद ब्लैक होल की तरफ गिरने लगेंगे.. ब्लैकहोल ब्रह्माण्ड में मौजूद एक काले धब्बे के समान है जिसकी ग्रेविटी इतनी शक्तिशाली होती है कि 3 लाख किमी/सेकंड की रफ़्तार से चलने वाला प्रकाश भी इनसे बच के नहीं निकल सकता… इस कारण इसमें गिरने के बाद किसी चीज के साथ क्या होता है… ये देखा नहीं जा सकता… But To Be Sure…. इनमें जाने के बाद पदार्थ हो या ऊर्जा, गायब हो जाती है…

अभी तक मौजूद हर आकाश गंगा के केंद्र में ब्लैकहोल देखे गए हैं जो इस बात का सबूत है कि “प्रकृति ने आकाशगंगाओ के जन्म के साथ ही… उनके अंत की प्रोग्रामिंग कर दी थी”.. Regardless to say जब हमारे लोकल ग्रुप की आकाश गंगाए टकराएगी तो सभी गैलेक्सीज के केंद्र में मौजूद ब्लैकहोल आपस में मिल के एक अत्यंत महाकाय ब्लैकहोल को जन्म देगी जो आगे चल कर सम्पूर्ण गैलेक्सी को ही खा जाएगा पर हो सकता है कि.. हम बच जाएं! “Orbital Decay” के कारण जब सभी पिंड ब्लैक होल का भोजन बनने के लिए….. तेजी से ब्लैक होल की तरफ बढ़ रहे होगे तब…. इस प्रक्रिया में कई पिंड और लार्ज स्टेलर ऑब्जेक्ट आपस में टकराएंगे तो हो सकता है कि… इन भीषण टक्करो में कई पिंडों को इतनी गतिज ऊर्जा मिले कि… उनकी “Escape Velocity” गैलेक्सी की ग्रेविटी की सीमा को तोड़ दे ऐसा शत प्रतिशत होगा तो बस हमें इतना करना है कि… किसी प्रकार से “उपयोग में ला सकने वाली ऊर्जा का संचय कर” किसी स्पेस शिप में मानव सभ्यता को बैठा के हम इस गैलेक्सी से दूर स्पेस में चले जाए और इस टक्कर के पश्चात जो पिंड आकाश गंगा में हुई टक्कर से उछल के आकाशगंगा से बाहर आ जाए उस पिंड पर सफलतापूर्वक लैंड कर… “उसे टेराफॉर्म” करके हम फिर से अपनी बस्तिया बना लें और ब्रह्माण्ड में एक अनजान सफ़र पर धीमी गति से बढ़ते अपने नए ग्रह पर बैठ… हम अपने पीछे छोड़ आई गैलेक्सी में… ब्लैक होल में गिरते चाँद सितारों के अवशेषों को निहार पायेंगे.

तो अब क्या आप अमर है? क्या आपने प्रकृति पर विजय पा ली? शायद नहीं…. क्योंकि… एक चीज ऐसी है जिसका कोई तोड़ कभी नहीं ढूँढा जा सकता और वो है “Decay Process”. आपके आस पास हर चीज एटॉमिक पार्टिकल्स की बनी है और इन पार्टिकल्स की एक निश्चित आयु होती है. तो चूँकि… इस वक़्त तक… ब्रह्माण्ड में बिग बैंग में जन्मे आपके शरीर के और आपके आजू बाजू के सभी कण लगभग अपनी उम्र पूरे कर चुके होंगे शायद… कुछ अरब वर्ष और… और उसके बाद… उनका और मूलभूत कणों का सब-एलेमंटरी पार्टिकल्स क्षय होना शुरू हो जाएगा और धीरे धीरे… आपका ग्रह… आप… आपके बच्चे… आपकी बीवी समस्त मानव जाति कणों के क्षय के कारण… उसी प्रकार गायब होना शुरू हो जायेगी जैसे रबर से कागज़ पर लिखी इबारते धीरे धीरे मिटती जाती है… That’s Law… 2nd Law Of Thermodynamics!!!

आपके ज्ञान, क्षमता और विज्ञान की असीमित सीमाओं के बावजूद आपको प्रकृति के सामने समर्पण करना ही होगा… और ऐसा ब्रह्माण्ड में हर जगह होगा “Ultimate Surrender Of Mankind”. But Story Does Not End here. वे ब्लैक होल याद हैं? आपके जाने के बाद भी… इस ब्रह्माण्ड में वे ब्लैक होल्स ज़िंदा रहेंगे और सितारों को खाने की प्रक्रिया में… ब्लैक होल के चारो तरफ धुल की एक चकरी “Accretion Disc” बनती चली जायेगी जैसे जैसे ब्लैक होल सितारों को खायेगा वैसे वैसे ये धुल की चकरी और ज्यादा चमकती जायेगी और इस धुल की चकरी से निकला प्रकाश इस कदर अंधा कर देने वाला होता है कि… इन्हें एक ख़ास नाम दिया गया है “QUASARS” अर्थात क्वेजार…  क्वेजार… एक गैलेक्सी में मौजूद अरबो तारो से भी ज्यादा चमकदार होते है और… दम तोड़ते उस अन्धकारमय ब्रह्माण्ड में… ये क्वेजार… शायद आखिरी उजाला हो.  एक मरते…. दम तोड़ते ब्रह्माण्ड का आखिरी सलाम !!!

और धीरे धीरे अधिकतम 10^100 वर्षो में ये क्वेजार भी अपनी आभा खो के लुप्त हो जायेंगे और भोजन की अनुपलब्धता के कारण ब्लैकहोल भी धीरे धीरे रेडीएट हो के विलुप्त हो जाएगा. ब्रह्माण्ड में रह जायेंगे दूर दूर उड़ते सब एलीमेंटरी पार्टिकल्स जो आपस में कभी इंटरैक्ट नहीं कर पायेंगे. धीरे धीरे ऊर्जा का स्तर हर जगह एक समान हो जाएगा. ब्रह्माण्ड “Maximum Entropy” की स्थिति को प्राप्त कर लेगा. हर जगह समान तापमान होगा. हर जगह ऊर्जा का संतुलन समान होगा. और, इस परम संतुलन की स्थिति में कुछ भी नहीं हो सकेगा क्योंकि कुछ होने के लिए ऊर्जा का आदान प्रदान होना जरूरी है… अर्थात असंतुलन जरूरी है और ब्रह्माण्ड की ऊर्जा के परम संतुलन की स्थिति में किसी प्रकार का असंतुलन संभव नहीं होगा. ब्रह्माण्ड एक सागर की शांत सतह के समान होगा. ना सत होगा… ना असत… ना दिन होगा… ना रात…. ना मृत्यु होगी… ना अमरता….. समय और काल की अवधारणा भी शून्य हो जायेगी… और, खरबों सितारों से जगमगाता हमारा ये ब्रह्माण्ड तब अनंत काल तक गहन अन्धकार में किसी आहट के इन्तजार में दम तोड़ता रहेगा… This Will Be…… THE END OF EVERYTHING.

लेकिन…. उसके बाद उसके आगे खरबों अरबों वर्षो के इन्तजार के पश्चात अचानक “कुछ होता है” जो है अदभुत… अवर्णनीय… अतुलनीय..

…जारी…


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तब हमारा ब्रह्माण्ड लिंग नुमा सुरंग में धंसते हुए निकटवर्ती ब्रह्माण्ड में समाहित हो जाएगा!


लेखक विजय सिंह ठकुराय दिल्ली में रहते हैं. उनका खुद का अपना बिजनेस है. फिजिक्स का शौक है. ब्रह्मांड और विज्ञान के पढ़ाकू हैं. इन सबके बारे में लिखते रहते हैं. फेसबुक पर सक्रिय विजय एक लोकप्रिय साइंस राइटर हैं जिनके हजारों फालोअर हैं. विजय से फेसबुक के जरिए संपर्क कर सकते हैं, उनका पता Facebook.com/vijay.singh.thakurai है. उपरोक्त राइटअप पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ के जवाब विजय ने दिए हैं, जिसे कंपाइल कर प्रस्तुत किया जा रहा है. पढ़ने के लिए नीचे लिखे Next पर क्लिक करें>>

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मेरी थाईलैंड यात्रा (3) : …अपमान रचेता का होगा, रचना को अगर ठुकराओगे

कोरल आईलेंड की यात्रा से पहले थाईलेंड के बारे में कुछ बातें कर ली जाय. हवाई अड्डे से ही लगातार नत्थू की एक इच्छा दिख रही थी कि वो अपने देश के बारे में ज्यादा से ज्यादा हमें बताये. शायद इसके पीछे उसकी यही मंशा रही हो कि हम जान पायें कि केवल एक ही चीज़ उसके देश में नहीं है, इसके अलावा भी ढेर सारी चीज़ें उनके पास हैं जो या तो हमारी जैसी या हमसे बेहतर है. बाद में यह तय हुआ कि जब-जब बस में कहीं जाते समय खाली वक़्त मिलेगा तो थाईलैंड के बारे में नत्थू बतायेंगे और मैं उसका हिन्दी भावानुवाद फिर दुहराऊंगा. उस देश के बारे में थोड़ा बहुत पहले पायी गयी जानकारी और नत्थू की जानकारी को मिला कर अपन एक कहानी जैसा तैयार कर लेते थे और उसे अपने समूह तक रोचक ढंग से पहुचाने की कोशिश करते थे. नत्थू तो इस प्रयोग से काफी खुश हुए लेकिन ऐसे किसी बात को जानने की कोई रूचि साथियों में भी हो, ऐसा तो बिलकुल नहीं दिखा. उन्हें थाईलैंड से क्या चाहिए था, यह तय था और इससे ज्यादा किसी भी बात की चाहत उन्हें नहीं थी. खैर.

नत्थू द्वारा बतायी गयी ढेर सारी जानकारियों में से कुछ का जिक्र पहले आ चुका है शेष यह कि थाईलैंड मोटे तौर पर एक ग्राम प्रधान, कृषि प्रधान देश है. यहां की 70 प्रतिशत जनता खेती पर ही आश्रित है और लगभग इतने ही प्रतिशत लोग गांवों में निवास करते हैं. बकौल नत्थू इस देश को ‘दुनिया का रसोई’ कहे जाने का गौरव प्राप्त है. यहां से चावल, मक्का, गन्ना समेत अनेक कृषि उत्पाद और फल आदि अमेरिका, जापान आदि देशों तक को निर्यात किये जाते हैं. इन्हें इस बात की प्रसन्नता है कि दुनिया के कई देशों तक ये अपना कृषि उत्पाद पहुचाते हैं. थाईलैंड में लगभग सभी नागरिक शिक्षित हैं. ख़ास कर शहरी इलाकों में ऐसा शायद ही कोई हो जिसने स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त नहीं की हो.

यह वृत्तांत लिखते समय नेट से इन आंकड़ों को क्रॉस चेक भी करते जा रहा हूं तो लगभग नत्थू के बताये सारे तथ्य और आंकड़े सही साबित हो रहे हैं. नेट बता रहा है कि 92 प्रतिशत की साक्षरता दर तो थाईलैंड ने दस वर्ष पहले 2005 में ही हासिल कर लिया था. उस देश की प्रति व्यक्ति आय 14000 डॉलर है, इंटरनेट की तरफ कातर निगाहों से देख रहा हूं और वह बता रहा कि हमारी प्रति व्यक्ति आय कूथ-काथ कर अभी 1610 डॉलर तक पहुच पाया है. आश्चर्य यह कि बावजूद इसके चाहे थाई एयर की उड़ान हो या भारतीय कंपनियों की, थाईलेंड से भारत आने वाले या वहां वापस जाने वाले सभी ऐसे विमानों में शत-प्रतिशत भारतीय ही मिलेंगे आपको. यानी किसी थाई नागरिक को इस बात की गरज नहीं है कि वह भारत आये. हम ही वहां जा-जा कर अपना सब कुछ वहां निवेश कर आते हैं, अपनी गरीबी के बावजूद. खैर.

नत्थू आगे बताये जा रहे थे कि इस देश के हर व्यक्ति तक स्वास्थ्य सेवा मुफ्त है. बेहतर सुविधा प्रात सभी सरकारी और निर्दिष्ट अस्पतालों में दवाओं के साथ इलाज मुफ्त किया जाता है. थाईलैंड मोटे तौर पर स्त्री प्रधान देश है. यहां नर-नारी अनुपात लगभग बराबर है. वयस्क स्त्रियों की संख्या इस देश में पुरुषों से ज्यादा है. यह भी कि लिंग आधारित किसी भी तरह का भेदभाव करना यह देश नहीं जानता है. घर में बच्ची का पैदा होना यहां समान या ज्यादा आनंद का विषय होता है. वहां के निवर्तमान प्रधानमंत्री यिंकगल शिवानात्रा का भ्रष्टाचार, उसके द्वारा विभिन्न निर्माण प्रोजेक्टों में की गयी धांधली, ठेके में रिश्वत, रिश्तेदारों आदि को प्रश्रय आदि की कहानी और उसके कारण लोगों में फैले रहे असंतोष की कथा वह गाइड बताते जा रहा था और लगा जैसे ये भारत की कहानी सुनाने लगा हो. बक़ौल नत्थू ‘भारतीय नाम वाले सेनाध्यक्ष- प्रयुथ चान ओछा’ ने अंततः शिवानात्रा का तख्तापलट किया और देश में सब खुश हुए इससे. राजा ‘रामा नाइन’ की संवैधानिक अध्यक्षता में सेनाध्यक्ष ने सत्ता बेहतर तरीके से सम्हाल ली है. खैर.

होटल से वाकिंग डिस्टेंस पर ही पटाया का प्रसिद्द बीच था जहां से कुछ दूर घुटने भर तक पानी में पैदल जा कर फिर स्पीड बोट के सहारे कोरल आइलैंड तक की दूरी तय करने थी. इतना नज़दीक होते हुए भी इस बीच पर आने का यह पहला मौका था. कुछ देर रेत पर खड़ा-खड़ा ही महसूस कर रहा था, इमैजिन करने लगा लगभग पचास साल पहले के उस समय को जब मछुआरे के इस गांव में ‘पश्चिम’ ने दस्तक दी होगी. कैसा रहा होगा गरीब और पिछड़ा सा यह गांव जब वियतनाम युद्ध से थके-मांदे सौ अमेरिकन सैनिकों का जत्था यहां तक पहुचा था और फिर देखते ही देखते यह तटीय इलाका गर्म गोश्त के कारोबार में खुद को आसमान तक पहुचा आज इतने कम समय में ही दुनिया के सबसे फेवरेट गंतव्यों में से एक बन चुका है. कभी शायद मछुआरों की झोपड़ियां ही यहां रही होंगी जहां आज गगनचुंबी होटलों की श्रृंखला खड़ी हो गयी है. कभी मछली का शिकार करने वाले इन थाई लोगों के बच्चे आज खुद ही शिकार बने फिर रहे हैं, दुनिया भर से आये हवस के शिकारियों का.

स्पीड बोट रवाना हुआ रफ़्तार से. समुद्री हवाओं ने उमस से बेचैन हम सबको जरा राहत पहुचाई. लगभग बीस मिनट की सैर के उपरान्त बीच समुद्र में ही, दो-चार ज़हाजों को लंगर डालकर एक प्लेटफार्म जैसा बना दिया गया था जहां आप पेरासेलिंग कर सकते थे. एक हज़ार भारतीय रुपया में वहां आपको पैराशूट में बांध कर उसे एक तेज़ रफ़्तार बोट से जोड़ दिया जाता है. वह बोट उस प्लेटफार्म के चक्कर लगाता है और आप आकाश में उड़ते रहते हैं. चक्कर लगाते हुए आसमान में उड़े जा रहे थे कि अचानक लगा मानो बोट में कुछ खराबी आ गयी. धड़ाम से अपन पानी में गिरने लगे. करीब जंघा भर पानी में डूब जाने के बाद फिर से बोट ने रफ़्तार पकड़ी और कुछ देर के बाद फिर मैं जहां से उड़ा था वहीं सुरक्षित पहुंच गया था. एक्चुअली पानी में अकस्मात उतार देना भी इस खेल का सुनियोजित हिस्सा होता है ताकि इस खेल को भी ज़रा ज्यादा रोमांचक बनाया जा सके. हां, ऊंचाई से डरने वाले लोगों को ऐसे करतबों से परहेज़ ही करना चाहिए. आगे ज़रा और भयानक करतब वाला खेल इंतज़ार कर रहा था.

ऐसे ही आधा घंटा और समुद्र में भागते रहने पर एक ऐसा ही प्लेटफार्म मिला जहां आपको समुद्र की सतह तक भेजने की जुगत बिठाई गयी थी. यानी पहले वाले में आसमान के बाद अब पाताल तक पहुच जाना था आपको. आकाश से पाताल तलक, जल, थल और नभ तीनों की यात्रा एक ही घंटे में कर लेने का यह अनोखा अवसर तो था ही. यहां करीब 25 सौ रुपया खर्च कर आपको समुद्र की सतह पर उतरना था. पानी से दम घुटने के कारण ज़ाहिर है पहले तो मैंने मना किया था उस ‘स्कूबा डाइविंग’ करने को. लेकिन एक-एक कर युवाओं को पानी में उतरते और समुद्र में विलीन होता हुआ देख कर खुद को भी रोक नहीं पाया. बजाप्ता भीतर जाने की ट्रेनिंग दी गयी. यह पूछा गया कि अस्थमा या ह्रदय रोग तो नहीं है. अपन ने इंकार में सर हिलाते हुए सोचा, चलो सफल स्कूबा कर लेने पर ये तो पता चल जाएगा कि अपन इन दोनों रोग से मुक्त हैं.

करीब पचीस किलो भारी आक्सीजन वाला हेलमेट सर पर पहना कर पानी में अंततः धकेल दिया गया. आप ज़मीन पर अगर वैसा हेलमेट पहन कर दो कदम चलें तो शायद गर्दन टूट जाए लेकिन पानी के भीतर, हम जानते हैं कि वज़न का पता हमें नहीं चलता. ज़ाहिर है नीचे हम बात भी नहीं कर सकते सो किसी आपात स्थिति के लिए कमांड बता दिया गया था. अगर आप ठीक हैं तो अंगूठे और तर्ज़नी का गोला बनाते हुए आपको ऑल राइट का इशारा करना है. और अगर कोई दिक्कत हो, आप बाहर निकलना चाहें तो चार अंगुलियों को समेट कर बस अपने अंगूठे को बार-बार ऊपर की ओर दिखाना है. पानी में जाते ही ऐसी घबराहट हुई, ऐसा दम घुटा कि क्या कहें. बार-बार बाहर ले जाने का कमांड देते रहने पर भी पानी के मौजूद दो-दो गाइडों में से कोई भी ऊपर ले जाने को तैयार नहीं हुआ. उस कुछ क्षण में जीवन और ज़मीन का महत्व समझ में आया. सचमुच ढेर सारी ऐसी नेमतें हमें सहज प्राप्त हो गयी है, जिसका महत्त्व हमें पता भी नहीं चलता. क्षण भर को भी उन सुविधाओं से हमें महरूम कर दिया जाय, तब पता चलता है कि क्या होती हैं वे चीज़ें. हवा, पानी, भोजन, ज़मीन, परिवार, देश, नागरिकता……! खैर.

शायद उस गाइड को मालूम था कि मैं सुरक्षित हूं, बस डर और घबराहट के कारण बाहर निकलने के लिए इतना बहाना कर रहा हूं. अतः अंततः उसने समुद्र की सतह पर ले जा कर धकेल ही दिया. कुछ क्षण सुस्ताने के बाद लगा कि ऑक्सीजन की आपूर्ति भी सामान्य हो गयी है. फिर गाइड के बताये रास्ते पर चलने लगा समुद्र पर बिलकुल ज़मीन जैसा. तरह-तरह की मछलियों के झुण्ड, अजीब-अजीब समुद्री जीवों, शैवाल, शायद मोती वाले सीप, समुद्री वनस्पति आदि को देखते-देखते चल रहे थे. डर भी रहे थे की कहीं ऊपर से अकस्मात आक्सीजन आना बंद हो गया तो क्या होगा. फिर भी टहलते-टहलते ही वक्त गुजारना था. बीच में उन लोगों ने अपने हाथ में अजीब सी वस्तु थमा कर उसे मसल कर फेकने का इशारा किया. यंत्रवत अपन फेकने लगे मसल कर उस स्पंज जैसी चीज़ को. आह … वो मछली के लिए कुछ खाने लायक चीज़ थी. उसे लपकने हज़ारों मछलियां इस तरह आपकी परिक्रमा करने लगती है जिसका वर्णन करना मुश्किल है. कितना लाज़वाब होती हैं मछलियां न? ये अलग बात है कि ‘मुझे मछलियां पसंद हैं’ ज़मीन पर यह कहने का मतलब होता है कि मछलियां खाना आपको पसंद है. गोया किसी व्यक्ति के प्रति हम पसंदगी ज़ाहिर करें तो उसका अर्थ उन्हें खा जाना हो. पूरे नियत जगह पर आपको घुमा देने के बाद स्टील की एक सीढ़ी के पास ले जाकर उस सीढ़ी का पाईप पकड़ा कर ऊपर की ओर धकेल दिया जाता है. शेष कार्य खुद पानी ही कर लेती है. कुछ देर तक यंत्रवत सीढ़ी दर सीढ़ी फलांगते आप कुछ क्षण में ऊपर ज़मीन पर होते हैं. उस सीढ़ी के माध्यम से ऊपर की ओर उठते हुए यही सोच रहा था कि रावण स्वर्ग तक जैसी सीढ़ी का निर्माण करना चाह रहा था, वह कुछ इसी तरह का होता शायद. खैर, जान बची तो लाखों पाए, लौट के बुद्धू फिर आगे कोरल आईलेंड की तरफ जाए.

बोट निकल पड़ा आगे की ओर. ज़मीन से घंटे भर दूर यानी बीच समुद्र की ताज़ी हवाओं का फेफड़ा भर-भर पान करते हुए आगे बढ़े. नत्थू ने बताना शुरू किया कि आगे एक सुन्दर सा, छोटा सा आईलेंड मिलेगा. हम सब वहां घंटे भर रुकेंगे, घूमेंगे, मन हो तो स्वीमिंग करेंगे, खायेंगे-पीयेंगे फल-फूल, समुद्र उत्पाद आदि. लेकिन वहां यह चेतावनी भी साथ ही दे दी गयी कि ‘बूम-बूम’ की फरमाइश कोई नहीं करे. भाई लोग इस बात पर भी जरा निराश सा हो गए थे. यह बताना रह गया था कि समूचे थाईलेंड में ‘बूम-बूम’ शब्द सेक्स के लिए इस्तेमाल होने वाला कोड वर्ड है. यात्रा की शुरुआत में ही नत्थू ने यह ताकीद कर दी थी कि इस काम के लिए यही शब्द इस्तेमाल किया जाय. नत्थू के अनुसार यह कोई थाई या अंग्रेज़ी शब्द नहीं है लेकिन ‘सेक्स’ कहना बड़ा ही अभद्र लगता है, इसलिए हमारे यहां यह ज़रा डिसेंट कोड कहने की रीत बन गयी है. सचमुच, जिसे करने में किसी तरह का संकोच नहीं उसे कह देने भर में दुनिया भर की लाज ले आने का दोगलापन तो अपने देश में भी कम कहां है. क्या हुआ अगर ज़रा सा हमारी तरह ही थाईलेंड भी संकोची हो गया तो.

ज़रूरत से ज्यादा लंबा और शायद उबाऊ होते जा रहे इस यात्रा वृत्तांत को अब समेट लेना ही उचित है. कहने को अभी भी ढेर सारी बातें हैं लेकिन मोटी-मोटी दो-चार बातों के साथ यह सभा समाप्त की जाय. दो घंटे बाद उस द्वीप से वापसी हुई. अपने लोगों द्वारा समय का सम्मान न करने की परंपरा समूचे यात्रा में शर्मसार करता रहा. इस आईलेंड की उमस भरी गर्मी में भी घंटे भर के बदले दो घंटे से ज्यादा समय बर्बाद कर भाई लोग वापस आये. तबतक हम जैसे दो-तीन लोग तपती रेत पर कुर्सी लगा कर बैठे हुए उन साहबों का इंतज़ार करते रहे. यह समस्या विदा होने से लेकर वापस पहुंचने तक कायम रही. समय के पालन का आग्रह करते हुए नत्थू द्वारा हर बार मुस्कुरा देने पर ऐसा लगता जैसे कलेजे में कोई तीर सा बींध दिया हो. सोच कर शर्म से गड़ जाता था कि आखिर मेरे देश के बारे में क्या सोचते होंगे ये लोग. कतार में खड़े होने में आनाकानी करने पर एयरपोर्ट पर किसी विदेशी ने टिप्पणी भी कर ही दी थी हमलोगों को देख कर कि ये भारतीय कभी नहीं सुधर सकते. ऐसी ढेर सारी नागरिक बोध की कमी महसूस करते हुए यात्रा करना एक तरह की यातना को ही आमन्त्रण करने जैसा होता है. जैसे होटल के स्वीमिंग पूल में नग्नप्राय एक विदेशी जोड़ा को देख कर एक बुजुर्ग मित्र धड़ाधड़ मोबाइल से फोटो लेने लगे थे. उसके बाद तो इतनी फटकार पड़ी उन्हें की पूछिए मत. बड़ी मुश्किल से वो भारी जुर्माना अदा करने से बच पाए. हालांकि ‘देश’ तो ऐसे हर कारनामों का जुर्माना भरता ही है, अपनी छवि को ज़रा सा और खराब कर. लेकिन साथ चल रहे ग्लोबल टूर एंड ट्रेवेल एजेंसी के मनोज राठौर का धैर्य ही एक राहत थी जिसके सहारे सबको झेलते हुए भी हंसी-मजाक द्वारा सफ़र आसान और आरामदायक बना हुआ था.

कोरल से वापसी हुई. लॉबी में बैठ कर पहली बार मोबाइल को ज़रा वाय-फाय से कनेक्ट किया था कि दिल्ली से घबराई हुई सी एक मित्र का wattsap पर सन्देश चमका. तुम सब ठीक तो हो न? चिंता का सबब पूछने पर पता चला कि बैंकॉक में भीषण आतंकी हमला हुआ है. निशाने पर विदेशी पर्यटक ही हैं और विस्फोट की श्रृंखला जारी है. तीन से चार मिनट पहले ही हुआ था वह हमला और हमारा तेज़ चैनल झटपट परोस चुका था खबर सारे देश को. जबकि मेरे होटल की लॉबी में सभी टीवी स्क्रीन पर कोई मनोरंजक कार्यक्रम चल रहा था, सभी गेस्ट उसका आनंद उठा रहे थे. समूचे पटाया को तबतक पता नहीं था कि पहली बार उनके इस प्यारे देश पर भी आतंक ने दस्तक दी है. उस लेखिका मित्र को धन्यवाद के साथ अपनी खैरियत बताते हुए पत्नी को watsap पर ही कॉल किया. कनेक्ट हो जाने पर चन्दा को बता दिया कि कुछ देर बाद तुम चिंतित होने वाली थी जब पता चलता कि थाईलेंड पर आतंकी हमला हुआ है. सो हम सब बिलकुल ठीक हैं, किसी का फोन आये तो उन्हें भी यही बता देना. आशंका सही निकली. कुछ ही देर बाद सभी रिश्तेदारों-परिवारजनों का फोन चन्दा के पास घनघनाने लगा था. वह सबको हमारी खैरियत बताती जा रही थी, जो वापस आने पर पता चला.

लेकिन पटाया बिलकुल आम दिनों की तरह ही मशगूल था. अलबत्ता पहली बार दो-चार बार पुलिस सायरन की गूंजती आवाज़ सुनाई दी. अमूमन सायरन क्या, कोई भी हॉरन आप कभी थाईलेंड में (या किसी भी सभ्य देश में) सड़क पर कभी नहीं सुनेंगे. हम भारतीयों के लिए ही मोटर का हॉरन संगीत की तरह है अन्यथा सभ्य हो गए देशों में इसे असभ्यता समझा जाता है. पटाया के वाकिंग स्ट्रीट में भी चहल-पहल कायम थी लेकिन पश्चिमी लोगों की भीड़ ज़रूर ज़रा कम हो गयी थी जिन्होंने अपने होटल के कमरे में न्यूज़ देख लिया होगा, वे कमरे से बाहर नहीं निकल पाए थे. शेष सब सामान्य था.

पटाया का वाकिंग स्ट्रीट भी उस शहर का एक हॉट डेस्टिनेशन है. या यूं भी कह सकते हैं कि वह पटाया की पहचान भी है. शहर के बीच पर आप खड़े हो जायें और उत्तर की ओर एक तरफ समुद्र और दूसरी ओर अट्टालिकाओं-बाजारों, और बीच में लड़कियों-अर्द्ध लड़कियों सबको निहारते चलते चले जाय तो कुछ किलोमीटर के बाद ही एक बड़ा सा गेट दिखेगा. उसी में भीतर की सड़क ‘वाकिंग स्ट्रीट’ के नाम से जाना जाता है. बिलकुल लॉस वेगास की तर्ज़ पर उस एक सड़क पर ही ‘सबकुछ’ परोस दिया गया है. वहां गाड़ियों का जाना प्रतिबंधित है. आप टहलते हुए घूमिये, लुभाइये, लोभित होइए, मज़े लीजिये, ठगाइये, लुटाइए… ऐसी बरबादियों का हर सामान वहां सुन्दर तरीके से मौजूद है. साथ के एक मित्र की चमचमाती चेन उनके गले से कब गायब हो गयी, पता ही नहीं चला. पता चलने पर दुःख मनाने के बजाय हम सब ठठा-ठठा कर हंस पड़े. सहानुभूति सी हो आयी उस लुटेरिन पर क्यूंकि आभूषण नकली था.

लेकिन यह प्रसन्नता ज्यादे समय तक कायम नहीं रह पायी. भोजन करने जिस होटल में गए थे वहां से निकल कर मनोज राठौर बाहर खड़े थे, कुछ लोगों का खाना भीतर चल ही रहा था. अकस्मात दो सुन्दरी (या अर्द्ध सुन्दरी यानी शी-मेल भी हो सकती है) स्कूटी पर आयी. मनोज से बिलकुल लिपटने-चिपटने लगी. उनके चश्मे से खेलने लगी, देह से भी. इस अकस्मात घटना का वह आनंद लें या आक्रमण से डरें ऐसा जबतक मनोज तय कर पाते तबतक उनके गले से हार तोड़कर वह दोनों चम्पत हो गयी थी. कुछ देर तक पीछा करने की भी कोशिश हुई, लेकिन गली-गली से परिचित उन लुटेरों का पीछा कर पाना किसी परदेसी के लिए कहां संभव था. इस बार चेन असली थी. यात्रा के दौरान सबको लुटेरों से हमेशा सचेत करते रहने वाले मनोज खुद ही लुट गए थे. एक्चुअली चेन के साथ किसी मुल्युवान रत्न का लॉकेट भी था, जिसे हमेशा धारण किये रहने की ताकीद के कारण उसे उतारा नहीं गया था और पल भर में लाख रूपये के आसपास का नुकसान हो चुका था.

हमारा मत था कि पुलिस में रपट दर्ज होनी चाहिए. ज़रा धुंधला ही सही लेकिन सारा वाकया रेस्तरा के सीसीटीवी में भी दर्ज हो गया था. लेकिन संदेहास्पद ढंग से वह भारतीय रेस्तरा वाला, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने से मना कर रहा था. उस दिन आतंकी हमले के कारण शायद पुलिस भी व्यस्त रही होगी और हमलोगों ने बीमा भी नहीं कराया था, अतः अंततः जो नुकसान हुआ उसे भूल आगे की तैयारी में हम सब जुट गए. यह ज़रूर वहां सबने तय किया कि आगे से कहीं भी जाने से पहले बीमा ज़रूर सब करा लेंगे. मनोज ने भी तय किया कि आगे से यात्रा पैकेज में ही बीमा को शामिल कर लेंगे. अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान हम सब एक लाख डॉलर का बीमा करा कर गए थे, मात्र कुछ हज़ार की प्रीमियम पर. ऐसा सभी को करना चाहिए हमेशा.  

वृत्तांत को समेटने से पहले एक और किस्सा. समूह का सबसे स्मार्ट एक लड़का अमूमन किसी भी सामूहिक योजना में शामिल नहीं हो पाता था. वह चुपके से किसी अनंत-अनजान की ओर निकल पड़ता था. यात्रा की समाप्ति वाली रात सबने तय किया कि आज इसका पीछा किया जाय कि आखिर यह जाता कहां है. जल्दी ही जेम्स बांडों को पता चल गया कि बगल के ही ‘पूल बार’ में उसने स्थायी ठिकाना बनाया हुआ है. वहां बीयर पीते हुए रात-रात भर वह ‘पूल’ (बिलियर्ड्स जैसा खेल) खेलता रहता है. उस शहर की रीत के अनुसार एक लडकी ज़ाहिर है हमेशा साथ देने के लिए तत्पर थी ही. वह लड़की थाईलेंड के मानदंडों के अनुसार औसत से भी कम सुन्दर थी, ठिगनी सी और ज़रा मोटी भी. जबकि बालक अपना बिलकुल छः फीट का छैल-छबीला. इतना स्मार्ट कि कई बार मुफ्त में ही साथ चलने का प्रस्ताव उसे वारांगनाएं दे देती थी. लेकिन अपने परिवार से बेहद प्यार करने वाला, अपनी बेटी के फोटो का गोदना हज़ारों खर्च कर अपनी बांह पर गुदा लेने वाला यह मित्र उस पूल वाली लड़की के ‘प्यार’ में खो गया था. अमूमन ऐसा पूल खेलते हुए आप साथ की लडकी के लिए वहां चार से छः सौ बाथ (हज़ार-बारह सौ रुपया तक) खर्च करते हैं.

वहां सारे मित्रों के एक साथ पहुचने पर मित्र ज़रा झेंप सा गया था. फिर एक दुसरे मित्र ने पूल खेलने देने की गुजारिश की. मित्र तो तैयार हो गया लेकिन लड़की टस से मस नहीं हुई. आश्चर्यजनक किन्तु सत्य कि मात्र पांच सौ बाथ में रात भर साथ देने वाली यह लड़की किसी भी कीमत पर मिनट भर के लिए उस मित्र को छोड़ने को राजी नहीं हुई. दूसरा लड़का बौखला कर 1 हज़ार बाथ से शुरू कर 7 हज़ार बाथ तक का प्रस्ताव उस लड़की को दिया लेकिन किसी भी मूल्य पर वह ‘मैदान’ छोड़ने या मित्र को छोड़ने को तैयार नहीं हुई. जहां अपने देश में सभ्य कहे जाने वाले समाज में भी आज के लड़के-लड़कियों के लिए रिश्ते खेल की मानिंद हो गए हों, वहां कोई विदेशी वारांगना का किसी परदेसी के प्रति इतना निष्ठावान हो जाना निश्चय ही बॉलीवुड की फिल्मों के लिए मसाला सा देता नज़र आ रहा था. सच भी है.. इंद्राणी मुखर्जियों से आहत हमारे समाज को तो अब रिश्तों का नजीर लेने भी कहीं दूर देश की सफर ही करनी ही होगी. भारत तो शायद अब रीता जा रहा है इन चीज़ों से.

अगले दिन ढेर सारी सुन्दर यादों को समेटे हम सब विदा हो गए पटाया से. दोपहर तक बैंकॉक. फिर अगले दिन रात को वापसी की फ्लाईट वाया कोलकता, रायपुर के लिए लेनी थी. बैंकॉक में भी ढेर सारे अच्छे अनुभव रहे लेकिन उन सबका विवरण देना कहीं न कहीं दुहराव जैसा ही होगा. वहां के जेम्स गैलरी की सैर, रत्नों के चकाचौंध को देखना सचमुच शानदार अनुभव था. खरीदना तो उस गैलरी में कुछ भी संभव नहीं था. 20 से 30 लाख रुपया तक खर्च कर आप वहां सामान्य खरीदारी ही कर सकते थे. अल्प प्रवास में ही वहां भी एक क्लब में जाना और सबसे बढ़ कर डिजनीलैंड की तर्ज़ पर बने वहां के एक पार्क में दिन भर रह कर, एक से एक कलेजा मूंह को आ जाने वाले करतबों को करते हुए, अपने-अपने बच्चों को मिस करना आदि वर्णन भी विस्तार की मांग करता है. लेकिन फ़िलहाल इस वृत्तांत को यहीं विराम देना उचित होगा. हां, जेम्स गैलरी के बाहर एक मित्र का हज़ार बाथ खो जाना और हमारे गाइड नत्थू द्वारा वह पैसा खुद की जेब से देने की जिद्द करना एक अनूठा और भावुक कर देने वाला अनुभव था. नत्थू का तर्क था कि चुकि हम सब उसका दायित्व हैं यहां, इसलिए पैसा गायब हो जाने का  जिम्मेदार वह है. ज़ाहिर है नत्थू से पैसा लेने से मित्र ने इनकार किया, ऐसा करना ही था. आगे हम सब निकल पड़े थे अपने वतन की ओर. नत्थू अंतिम छोर तक छोड़ने आया. इस तीन दिन में ही उसने एक रिश्ता सा बना लिया था हमलोगों से.

सुबह-सुबह हम सब कोलकाता पहुचे. अगली फ्लाईट तीन घंटे बाद थी. किसी ने बाहर जाने की इच्छा व्यक्त की तो झट से मेरे मूंह से निकल गया कि वीजा थोड़े है यहां जो अपन बाहर जायेंगे. फिर अपनी बेवकूफी पर खुद ही हंस पड़े थे हम. याद आ गया कि हम अब अपने देश में हैं. चार दिन में ही देश के बिना रहने का महत्त्व मालूम हो गया था. जहां आपको हर वक़्त अपनी पहचान अपने सर पर चिपकाए घूमना पड़ता है. अब तो अपनी माटी अपने लोगों के बीच में था. विमान फिर रायपुर के लिए उड़ान भर चुकी थी, यादों का पिटारा एक-एक कर खुलना शुरू हो चुका था, झपकी सी लग गयी थी.

…समाप्त…

इस यात्रा संस्मरण के लेखक पंकज कुमार झा छत्तीसगढ़ भाजपा की मैग्जीन ‘दीपकमल’ के संपादक हैं. उनसे संपर्क jay7feb@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. पंकज बिहार के मिथिला इलाके के निवासी हैं. नौकरी भले ही भाजपा में करते हैं पर वक्त मिलते ही देश-विदेश की यात्राओं पर निकल पड़ते हैं, यायावर बन कर.


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मेरी थाईलैंड यात्रा (2) : …हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे!

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मेरी थाईलैंड यात्रा (2) : …हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे!

हमारी टोली पटाया के होटल गोल्डन बीच पहुच चुकी थी. औपचारिकताओं के साथ ही हमने अपना पासपोर्ट वहीं रिशेप्सन पर एक लॉकर लेकर उसमें जमा कराया. युवाओं का कौतुहल और बेसब्री देखकर मनोज बार-बार उन्हें कह रहे थे कि पहले ज़रा आराम कर लिया जाए, फिर अपने मन का करने के बहुत अवसर बाद में आयेंगे. सीधे दोपहर में भोजन पर निकलने का तय कर हम सब कमरे में प्रविष्ट हुए. शानदार और सुसज्जित कमरा. हर कमरे के लॉबी में ढेर सारे असली फूलों से लदे पौधों का जखीरा. इस ज़खीरे के कारण तेरह मंजिला वह होटल सामने से बिलकुल फूलों से लदे किसी पहाड़ के जैसा दिखता है.

ऐसे किसी होटल को अफोर्ड करने की कल्पना शायद भारत में मध्यवर्ग के लिए नामुमकिन ही है. समूह के सबसे बुजुर्ग सदस्य को हमारा रूममेट बना देना शुरू में तो ज़रा अखरा, लेकिन जल्द ही समझ में आ गया कि इससे ज्यादा माकूल व्यवस्था मेरे लिए और कुछ नहीं किया जा सकता था. लंच के समय जब फिर से बस में सबको एकत्र होना था तब तक तो कई युवा सदस्य बिना बताये कहीं विलीन हो चुके थे. उचित ही था, भोजन और नींद तो उन्हें अपने देश में मयस्सर था ही. यहां इन दोनों की परवाह क्यूं कर की जाय? बाद में कई सहचर ने बताया भी कि पूरे तीन दिन की यात्रा में बमुश्किल दो-चार घंटे ही वे सो पाए थे.

बस में बैठते ही याद आया कि आज हमारा देश आज़ादी का उत्सव मना रहा है. जी हां, 15 अगस्त का दिन ही था वो. हमारे लिए यह दिन क्या महत्व रखता है, यह हमने नत्थू दा को समझाया. अपने देश के सम्मान में ‘थाई’ नत्थू समेत सब लोग खड़े हो गए. बस सड़क पर सरक रही थी और माइक पर जन-गण-मन अधिनायक जय हे… गाते हुए हम सब खड़े सावधान की मुद्रा थे. राष्ट्रगान खत्म हुआ और तब तक हम रेस्तरां पहुंच गए थे. थाई निवासी, भले ही आदमी को छोड़ कर सभी जीवों को खा जाने के अभ्यस्त हों, मानव का ज़िंदा मांस भी भले उनके लिए तिजारत की वस्तु ही हो, लेकिन भारतीय रेस्तराओं की चेन देख कर राहत मिलेगी आपको. शाकाहारी भोजन के भी ढेर सारे विकल्प वहां मौजूद होने के कारण कोई समस्या नही थी. ‘चोटीवाला’ नामक जैन शाकाहारी भोजन का एक रेस्टोरेंट तो बस हमारे होटल के चंद कदम दूर पर ही था, हालांकि वहां भोजन करना हमारे पैकेज में शामिल नहीं था.

बाद में 80 रूपये की चाय पीने ज़रूर हम वहां जाने लगे थे जो वहां सस्ता ही था. सभी लोग रेस्तरा में हिन्दी बोलनेवाले ही थे. एक थाई नैननक्श की पूनम नाम की लडकी को भी फर्राटे से हिन्दी बोलते हुए देख कर ज़रा आश्चर्यचकित हुआ था, बाद में पता चला कि वह मयन्मार की है और यहां ऐसे हज़ारों बर्मीज़ थाईलेंड काम करते हैं जो हिन्दी ही बोलते हैं. भोजन के बाद का समय फिर से आराम का ही था. शाम में यहां के सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक शो ‘अलकायजर’ देखने जाने का तय था. हालांकि कुछ मित्र ही होटल वापस आ पाए. सबने अपने-अपने हिसाब से अपना प्लान तब तक के लिए बना लिया हुआ था. उनमें से कुछ मित्र पहले भी आये थे तो उन्हें और उनके मित्रों को पता था कि ऐसे समय का भी ‘सदुपयोग’ कैसे किया जा सकता है. हालांकि हम कुछ अनाड़ियों के लिए यह कौतूहल का विषय था ही कि रात के ‘उजाले’ में घंटों काम कर थके, सो रहे पटाया के किस घर की कुंडी को उन्होंने भरी दुपहरिया के ‘अंधेरों’ में खटखटाया होगा. खैर.

समूचे एशिया की संस्कृति को एक साथ पिरो कर उसे दिखाने वाले अलकायजर शो एक अनूठा अनुभव देता है. नत्थू दादा ने पहले ही दिया था कि इस शो में विभिन्न देशों की प्रस्तुतियां एक-एक कर सामने आती है. जिसमें भारत की प्रस्तुति भी हमें देखने को मिलेगा. कॉम्पलीमेंट्री ड्रिंक का आनंद लेते हुए हम सब फटी आंखों से प्रकाश और अभिनय के उस अद्भुत सम्मिलन को देखते जा रहे थे. अलग-अलग थीम पर अलग-अलग देशों की प्रस्तुतियां सामने आ रही थी. कहीं किसी संग्रहालय में मूर्तियों में लगे रत्न के चोरी का, तो कहीं अलग-अलग थीम पर राजकुमार-राजकुमारियों का जीवंत दृश्य. कभी अचानक वह सारी मूर्तियां जीवंत  होकर नाचने लगती थी तो अपन भौचक्के रह जाते थे कि अरे, ये सब तो इंसान ही हैं जो मूर्तियों में परिणत कर दिए गए थे. एक से एक ख़ूबसूरत लड़कियों द्वारा किये जाने वाले शानदार और शालीन अभिनय तो उस शो को चार चांद लगा देता है. हर वह दृश्य आपको आपके भारत की, हिन्दू संस्कृति की याद दिलाता सा लगेगा, ऐसा महसूस होगा मानो अपने यहां होने वाले रामलीला-कृष्णलीला आदि का ही यह परिष्कृत रूप है.

दो मंजिला उस विशाल हॉल में गूंजती तालियों की संख्या से आपको यह समझ में आने लगता है कि अभी जिस देश की थीम है, उस देश के कितने लोग सभागृह में मौजूद हैं. बेसब्री से हम भारत की बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे. हमें यह उम्मीद थी कि आज चुकि हमारे यहां स्वतन्त्रता दिवस है तो शायद उसी थीम पर कोई प्रस्तुति हो, लेकिन ‘आजा नचले’ गीत के साथ भारतीय प्रस्तुति सामने आयी. वह भी कम रोचक नहीं थी. लेकिन निराश यह देख कर हुआ कि जहां अन्य नागरिक अपने-अपने देश की बारी आने पर ताली से सभागृह को गुंजायमान कर रहे थे वहीं भारतीय आज़ादी का दिन होने के बावजूद बड़ी संख्या में वहां उपस्थित भारतीयों ने कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखाया. शो खत्म होने के बाद वो सभी लड़कियां झट से अत्यधिक मादक रूप लेकर दर्शकों के साथ ही बाहर आ जाती हैं. आप दो सौ रूपये देकर उनका आलिंगन कर जैसे चाहें वैसे फोटो खिचा सकते थे. काफी लोगों ने इस मौके का भी लाभ उठाया.

इस शो में आने से पहले ही गाइड ने एक सस्पेंस रख लिया था जिसे शो के बाद उन्हें बताना था. जब वापस बस में सवार हुए तो उस सस्पेंस के बारे में जानकर कई मित्रों ने दो-चार सौ रूपये खर्च कर पाए गए फोटो अपारच्युनिटी से मुक्ति पा ली, कई ने अपने-अपने मोबाइल से लिए गए फोटो को डिलीट कर दिया. एक्चुअली गाइड ने अब जाकर यह बताया था कि इस शो में सभी पुरुष ही काम करते हैं. उनमें से कोई भी लड़की नहीं थी, न उस प्रदर्शन में और न ही लिपट-चिपट कर खिचाये गए फोटो में. सचमुच…. अर्द्धनारीश्वर के भारतीय कल्पना को भी उसी देश ने साकार कर रखा हुआ है. कुछ पुरुष वहां प्राकृतिक रूप से वैसे हैं और कुछ विभिन्न मेडिकल उपायों का सहारा लेकर सुन्दर युवती बन जाते हैं. खैर.

यात्रा रफ़्तार पकड़ चुकी थे और इसके साथ ही अब मनोज का पिटारा भी खुलना शुरू हो चुका था. यात्रा प्लान के अनुसार अभी तक आधिकारिक रूप से ऐसा कुछ रोचक सा सामने नहीं आया था जिसके लिए भाई लोग यहां तक की दूरी तय करके आये थे. कारवां आगे बढ़ा रसियन एडल्ट शो की ओर. इस शो के बारे में क्या कहा जाय? वहां किसी को कैमरा या मोबाइल आदि ले जाने की इजाज़त नहीं होती. बस आप देखिये और अनुभव कीजिये एक से एक अनिर्वचनीय दृश्यों को. शो का टिकट यूं तो 3 हज़ार रूपये का होता है लेकिन यात्रा पैकेज लेकर आये लोग बस 1400 रूपये में टिकट पा सकते हैं. यहां बस अनुभूति ही कीजिये, अभिव्यक्ति करना सीधे-सीधे पोर्न लिखे जाने की मानिंद होगा. फिलहाल इतना ही बता पाना मेरे वश की बात है कि स्त्री-पुरुष यौंनांगों का इस तरह प्रदर्शन और ऐसा इस्तेमाल आप, हम और सबकी कल्पना से बाहर की बात है. इसे देख कर ही समझा जा सकता है बस. हां, जलती हुई मोमबत्ती को मूंह में लेना और फिर पिघले मोम को अपने समूचे देह पर उड़ेलते रहना, बिना उफ़ तक किये. यह देखना बहुत घिनौना और कष्टप्रद लगा. सोचने लगा कि शायद सेक्स से मन भर जाने के बाद आने वाली नस्ल आनंद के लिए ऐसी-ऐसी तरकीबें ही इस्तेमाल में लायेंगे. शायद इसी लिए अपने यहां सेक्स को इतना ज्यादा गोपन रखा गया होगा ताकि आनंद की कल्पना सेक्स तक जा कर खत्म हो जानी चाहिए. पश्चिम में भी आनंद के लिए अपनाए जा रहे नए-नए घिनौने तरीकों ने हमें यही तो सन्देश दिया है कि कामनाओं की कभी तृप्ति संभव नहीं, इसलिए प्राकृतिक कामनाओं को ही इतना दुरूह बना दिया जाय ताकि मानव इसकी प्राप्ति में आजन्म व्यस्त रहे, कुछ नयी सनक न पाल ले.

हां, सेक्स से इतर अगर आप इन दृश्यों को समझना चाहेंगे तो सचमुच आश्चर्य होगा यह सोच कर कि कितनी हाड़ तोड़ मेहनत और प्रैक्टिस के बाद ऐसे करतब दिखा पाते होंगे ये ‘कलाकार’ लोग. अपने किसी अंग को इतना लचीला या ऐसा मज़बूत बना पाना निश्चय ही एक बड़ी साधना की मांग करता है. शो से निकल कर एक-दुसरे से आंख बचाते भाई लोग निकल पड़े अगले पड़ाव पर. अगला पड़ाव यही होना था जो पटाया या थाईलेंड का यूएसपी है, यानी उसका मसाज़ सेंटर.

थाई संस्कृति में यूं तो मसाज़ का रिवाज़ यहां काफी पुराना है. मसाज़ के द्वारा ही कई तरह की बीमारियों आदि का इलाज़ भी करना यहां की परंपरा है. आज भी वहां ऐसे कई मसाज़ केंद्र हैं जहां शालीन तरीके से भी इसका आनंद या लाभ उठाया जा सकता है. लेकिन यहां जिन मसाज़ केन्द्रों की बात हो रही है, वह सीधे तौर पर वैश्यालय ही है.

थाई कानून के अनुसार वहां घोषित तौर पर वैश्यावृत्ति गैर-कानूनी ही है. लेकिन नगर में प्रवेश करते ही नत्थू ने यह आश्वासन दे दिया था कि ‘इस ओर’ से पुलिस पूरी तरह आंख मूंदे रहती है और आप पूरी तरह निश्चिंत हो सकते हैं. वस्तुतः वहां भी एक तबका है जिन्हें ये चीज़ें, विकास और समृद्धि की यह कीमत मंज़ूर नहीं. ऐसे समूहों का सरकार पर भी ज़रा दबाव रहता है कि इस कलंक को खत्म किया जाय, लेकिन देश जिस सीमा तक आगे बढ़ चुका है, वहां से लौट जाने की कोशिश थाईलेंड के लिए आत्मघाती ही हो सकता है, और ऐसा रिस्क कम से कम अब उठा लेना वहां किसी सरकार के वश की बात नहीं है.

एक बार 2008 के आसपास सरकार ने ज़रा इस पर कड़ाई करने की कोशिश की थी, लेकिन उस कोशिश के कारण थाई अर्थव्यवस्था पूरी तरह नष्ट होने की कगार पर आ गयी थी. फिर से सरकार को पिछले दरवाज़े से इसे लागू करना पड़ा जिसमें मसाज़, स्नान कराने आदि को कानूनी बना दिया गया है. ज़ाहिर है, बंद कमरे में नग्न युवती आपको स्नान करा रही है, मसाज़ कर रही है.. इतना कानूनी होने के बाद कौन सा पुलिसिया उस कमरे के भीतर जाकर तांक-झांक करने की हिमाकत कर पायेगा? हां, संसार के इस सबसे पुराने पेशे को जायज़ या नाजायाज़ ठहराने की मंशा लेकर यह वृत्तांत लिखा भी नहीं जा रहा है. सही और गलत का निर्धारण यहां व्यक्तिशः ही किया जाना समीचीन होगा. इस वृत्तांत का आशय बस जैसा है, और जिस तरह है उसे बता देना भर है. खैर.

कुछ और देर चहलकदमी कर लेने के बाद रात आधी होने से पहले ही अपन अपने कमरे में वापस आ गए थे. ज़ाहिर है वापस आने वाले साथियों की संख्या न्यून हो गयी थी. उचित ही है, तीसरी दुनिया के इस ‘सिटी ऑफ सिन’ यानि नए एशियाई लॉस वेगास आकर भी कमरे में सोये रहना कोई अक्लमंदी तो नहीं कहा जा सकता है. हां, मसाज़ केन्द्रों का अवलोकन किये जाने से पहले शहर के ‘गरम मसाला’ नाम के रेस्टुरेंट में सबने एक साथ ही डिनर किया. अलकायजर शो में भारतीयों के देशभक्ति संबंधी मेरी शिकायत उस रेस्तरा में आकर कुछ हद तक दूर हो गयी थी. भारतीय आजादी दिवस की उस रात को, उस रेस्टोरेंट में एक बड़ी कंपनी द्वारा प्रायोजित भारतीय पर्यटकों के एक बड़े समूह ने, वहां हॉल बुक कर लिया था. मेरा रंग दे वसंती चोला, मेरी जान तिरंगा है..आदि पर झूमते अपने लोगों को देख कर सुस्वादु भोजन का स्वाद कई गुना बढ़ गया. इस ठांस भोजन के बाद बस मेरी अगली ज़रूरत केवल चांप निद्रा की ही रह गयी थी. घोड़े सारे बिक गए थे, अपन जल्द से जल्द आकर पसर गए बिस्तर पर नींद के आगोश में. अगले दिन घंटे-डेढ़ घंटे की समुद्र यात्रा कर, समुद्र के बीच में ढेर सारे खेल आदि का आनंद उठाते हुए ‘कोरल आईलेंड’ तक की यात्रा का प्लान था.

यह वर्णन आगे……!

….जारी….

इस यात्रा संस्मरण के लेखक पंकज कुमार झा छत्तीसगढ़ भाजपा की मैग्जीन ‘दीपकमल’ के संपादक हैं. उनसे संपर्क jay7feb@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. पंकज बिहार के मिथिला इलाके के निवासी हैं. नौकरी भले ही भाजपा में करते हैं पर वक्त मिलते ही देश-विदेश की यात्राओं पर निकल पड़ते हैं, यायावर बन कर.


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मेरी थाईलैंड यात्रा (1) : कृपया भगवान बुद्ध के मुखौटे वाली प्रतिमा न खरीदें!

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मेरी थाईलैंड यात्रा (1) : कृपया भगवान बुद्ध के मुखौटे वाली प्रतिमा न खरीदें!

(दाहिने से तीसरे नंबर पर लेखक पंकज कुमार झा)


इस पंद्रह अगस्त की दरम्यानी रात को बंगाल की खाड़ी के ऊपर से उड़ते हुए यही सोच रहा था कि सचमुच आपकी कुंडली में शायद विदेश यात्रा का योग कुछ ग्रहों के संयोग से ही बना होता है. मानव शरीर में आप जबतक हैं, तबतक लगभग आपकी यह विवशता है कि आप पृथ्वी नामक ग्रह से बाहर कदम नहीं रख सकते. हालांकि इस ग्रह की ही दुनियादारी को कहां सम्पूर्णता में देख पाते हैं हम? अगर भाग्यशाली हुए आप तब ज़रा कुछ कतरा इस धरा के आपके नसीब में भी देखना नसीब होता है.

यह भी याद कर रहा था कि पिछले साल उसी समय नियति ने हमें प्रशांत महासागर के ऊपर से उड़ाए ले जा कर ‘पाताललोक’ अमेरिका में पटका था तो इस बार अपने पड़ोस के थाईलैंड नामक ‘हिन्दू देश’ की, मुस्कानों के उस फुलवारी की यात्रा करने को निकल पड़ा था. महज़ 15-17 घंटे पहले यात्रा का कार्यक्रम बना और अगले प्रहर ब्रम्ह मुहूर्त की बेला में अपन बैंकॉक के स्वर्णभूमि एयरपोर्ट पर थे.

इस संक्षिप्त यात्रा में 3 दिन पटाया तो एक दिन बैंकॉक में रुक कर वापस आ जाने का प्लान था. हुआ यह था कि अपने एक वरिष्ठ मित्र ‘ग्लोबल टूर एंड ट्रेवेल्स’ नाम से एक पर्यटन एजेंसी चलाते हैं. कंपनी ने सदा की तरह एक सस्ता सा लेकिन सुन्दर और टिकाऊ पैकेज बनाया हुआ था. यात्रा पर निकलने से एक दिन पहले ही एक यात्री की दुर्घटना हो जाने के कारण उसकी यात्रा रद्द हो गयी तो एजेंसी के आग्रह पर अपन ही निकल पड़े थे उस सीट को कब्जा कर. बैंकॉक हवाई अड्डे से सीधे पहले पटाया जाने का ही प्लान था. इमिग्रेशन से बाहर निकलते ही मधुर मुस्कान के साथ गाइड ‘नट्टू’ ने स्वागत किया. साथ में मार्गदर्शक का काम करते हुए एजेंसी के प्रतिनिधि मनोज राठौर भी थे ही. यानी दो-दो मार्गदर्शकों के गिरफ्त में आपको देश-दर्शन करना था.

इमिग्रेशन पर तमाम देशों के नागरिकों की उमड़ी भीड़ देख कर लगा कि इस देश की दाल-रोटी तो शायद वीजा के शुल्क से ही चल जाती होगी. भीड़ के मामले में दिल्ली के किसी व्यस्त बस अड्डे जैसा हाल रहता है हमेशा उस एयरपोर्ट का. तभी तो कुछ दशक पहले तक अनजाना अनदेखा सा, भारत की संस्कृति को सीने में छुपाये यह देश अपने विकास की गाथा अब एयरपोर्ट से ही दिखाना शुरू कर देता है. तभी तो देखते ही देखते भारतीय मुद्रा के मुकाबले इस छोटे देश की मुद्रा ‘बाथ’ दोगुनी कीमत का हो गया. हां, यहां तक पहुचने में इस देश ने क्या कीमत अदा की है, यह विमर्श ज़रा सा आगे करने की कोशिश करूंगा, हालांकि बिना जजमेंटल हुए या पाठकों पर ही उचित-अनुचित को तय करने का भार डाल देना ही इस यात्रा प्रसंग को रोचक बना सकता है.

हम सब जानते ही हैं कि कई अन्य देशों की तरह ही थाईलैंड ने भी चयनित देशों के पर्यटकों के लिए ‘ऑन एरायवल वीजा’ की सुविधा दी हुई है. यानी अगर आपके पास केवल पासपोर्ट हो तो आप सीधे बैंकॉक की उड़ान पकडिये, कुछ घंटे क़तर में खड़े होकर दो से ढाई हज़ार रूपये का शुल्क अदा कीजिये और फिर इमिग्रेशन काउंटर के उस पार कोई नट्टू या नैन्सी नामक गाइड फूल लेकर आपके स्वागत में तत्पर मिलेगा, हाथ जोड़कर नमन करने की ‘थाई परंपरा’ को निभाते हुए. यात्रा की थकान के बावजूद कुछ घंटे कतार में खड़े रहते हुए जब आप वीजा काउंटर पर पहुचेंगे तो एक ‘सूचना’ पढ़ कर ही मानो थकान आपकी हवा हो जायेगी. पढ़ कर आप आनंदित हो जायेंगे यह सोच कर कि हमारे देश के एक राजकुमार को किस तरह सहेज कर इस देश ने रखा हुआ है. पहली ही चेतावनी आपको यह मिलेगी कि इस देश में कृपया भगवान बुद्ध के मुखौटे वाली प्रतिमा नहीं खरीदें. ऐसी क्षत-विक्षत प्रतिमा खरीदना या बेचना थाई क़ानून के अनुसार दंडनीय अपराध है.

मन में अनेक तरह के सवाल और सुखद जबावों के साथ पटाया की यात्रा शुरू हो गयी थी. आगे काफी जिज्ञासाओं का समाधान होना था, आनंद तो खैर इस देश का पर्याय ही हो गया है, जिसे उठाने भाई लोग आये थे. बस रफ़्तार पकड़ चुकी थी. सबने एक झपकी मात्र ली कि माइक पर दोनों गाइड बंधुओं का थाई मिश्रित अंग्रेज़ी और छत्तीसगढ़ी मिश्रित हिन्दी में तक़रीर शुरू हो गया. मनोज की चेतावनी ये कि बस दो काम यहां नहीं करें, ‘यहां के राजा के बारे में कुछ भी कहना नहीं और दूसरा सड़क पर कहीं भी थूकना नहीं’ इस बात का सब कड़ाई से पालन करेंगे. शेष हर काम करने को आप आज़ाद हैं. आखिर ‘थाई’ शब्द का मतलब भी ‘आज़ाद’ ही होता है हालांकि अभी तक हमारे सहचर बंधु इस शब्द का अर्थ ‘जंघा’ समझ कर ही यहां आने को प्रेरित हुए थे. मैंने देखा कि थूकने की आज़ादी छीन जाने का भान होते ही कई मित्र बेचैन से हो गए थे. उनके गुटखे के शौक का क्या होगा, इस चिंता ने मानो कुछ के मन में यहां आने के उत्साह को ज़रा पस्त सा कर दिया हो.

वैसे भी पस्त तो हम सब ज़रा हो ही गए थे. शाम में रायपुर से चल कर सुबह थाईलैंड पहुंचते हुए, तीन-तीन हवाई अड्डों पर बोरियत भरी औपचारिकताओं ने थका तो दिया ही था. वैसे भी घंटे-दो-घंटे की हवाई यात्रा भी पता नहीं क्यू ट्रेन के चौबीस घंटों की सफ़र से ज्यादा भारी पड़ जता है देह को, ऐसा आप सबने महसूस किया ही होगा. तो बैंकॉक से पटाया तक की 127 किलोमीटर की यात्रा में फिलहाल कुछ ज्यादा समझ देख नहीं पाए थे. जल्द से जल्द होटल पहुच कर पहले कुछ देर आराम कर लेना चाहते थे हम. हालांकि गाइड बताते जा रहा था कि किस तरह आपको हाथ जोड़ कर प्रणाम करने की थाई परंपरा का पालन करना है. सच ही है, अब ये भी हमें किसी पूरब के देश से ही सीखना होगा, ख़ास कर उस देश से जहां आप हाथ मिलाकर अभिनन्दन करने की पाश्चात्य परंपरा को अपनाते हुए किसी को नहीं देखेंगे.

नट्टू, जिसे भारतीय पर्यटकों ने अपनी सुविधा से ‘नाथू दादा’ का नाम दे दिया था, जिसे उन्होंने खुद ही खुशी से बताया, थाईलैंड के बारे में अपनी जानकारी का व्यावसायिक प्रदर्शन करने लगे. पहले पॉकेटमारों आदि से सावधान करने के बाद उसने बताना शुरू किया कि थाईलैंड की कुल आबादी 6.5 करोड़ है, और केवल राजधानी बैंकॉक में ही देश की 1 करोड़ 30 लाख आबादी निवास करती है. मैं हिसाब लगाने लगा कि इस अनुपात में तो दिल्ली में 20 करोड़ से अधिक लोगों को होना चाहिए था. लेकिन अपनी दिल्ली जहां देश की दो प्रतिशत जनसंख्या के साथ ही हांफ रही है वहां बैंकॉक अपने 20 प्रतिशत नागरिकों को एक ही शहर में समेटे रख कर किस तरह व्यवस्थित और सुसंगत तरीके से अपना काम कर रहा है, यह सीखने हमारे कर्णधारों को वहां जाना चाहिए. ‘अध्ययन यात्रा’ पर यूं तो सारे सरकारी बाबू भी जाते ही रहते हैं, लेकिन कैसा अध्ययन करते हैं वहां जाकर यह पाठकों की कल्पना पर छोड़ना ही मुनासिब है. खैर.

नाथू दादा ने बड़े ही गर्व से बताया कि बताया कि इस देश के 95 प्रतिशत नागरिक हिन्दू हैं, 3 प्रतिशत मुस्लिम और शेष अन्य मतावलंबी. आश्चर्यजनक जानकारी को हमने फिर से एक बार क्रॉस चेक किया. वढेरा के अंदाज़ में पूछ बैठा था नाथू से, नाथू आर यू सीरियस? यस, आयम सीरियस कहते हुए उसने समूचे आत्मविश्वास के साथ अपने आंकड़ों को दोहराया और फिर बताया कि हमारे देवता बुद्ध हैं, और हम सब हिन्दू. उसकी बातें सुनकर अनायास अम्बेडकर हमें लिलिपुट सा दिखने लगे. पहली बार हमें अपने कथित संविधान निर्माता के प्रति नफरत सी हुई जिन्होंने बुद्ध की तमाम ठेकेदारी को हड़पने की कोशिश करते हुए भारत में ही बुद्ध को बेगाना और उनके मत को हिन्दू आस्था के बरक्स खड़ा कर देने का ऐतिहासिक अपराध किया था. हालांकि दोषी केवल आंबेडकर नहीं थे, सचमुच हम ब्राम्हण हिन्दुओं का भी कसूर ज़रा भी कम नहीं है, जिसने जातिगत शोषण और छूआछूत आदि को प्रश्रय देकर ऐसी हरकतों के लिए खाद-बीज मुहय्या कराया था.

नाथू बताते जा रहा था और हमारे मानस पटल पर चलचित्र की तरह कथित दलित चिंतकों, भारतीय नव बौद्ध कठमुल्लों का चेहरा एक एक कर सामने आता जा रहा था. ऐसे सभी हिन्दू विरोधी भारतीय नव बौद्ध चिन्तक एक-एक कर मेरे मन के कठघरे में अपराधी की तरह आते जा रहे थे जिन्होंने हमारी संस्कृति को उतना ही नुकसान पहुचाया जितना सहेज कर पूरब के इस देश के हमारे बंधुओं ने रखा है. स्वाभाविक ही है कि आंबेडकर नामक किसी प्राणी का नाम बुद्ध के उपासक इन करोड़ों थाई हिन्दुओं ने कभी सुना ही नहीं था. उन्हें बौद्ध का टेंडर केवल भारत के लिए ही मिला था. थाईलैंड तो अपने माथे पर किस तरह तरह हिन्दू मुकुट को सजाया है इसकी गवाही तो एयरपोर्ट पर ही वह अद्भुत विशालकाय पाषाण कृत देता नज़र आता है जिसमें भारतीय शास्त्रों में वर्णित ‘समुद्र मंथन’ के पौराणिक दृश्य को शानदार एस्थेटिक सेन्स के साथ सहेजा हुआ है, उसके लिखित विवरण के साथ.

थाई एयरपोर्ट का नाम स्वर्णभूमि, हाथ जोड़ कर प्रणाम की मुद्रा में अभिनन्दन करने की थाई परंपरा, राजा का नाम ‘राम’ (अभी नवमें राम का राज्य है), पहले इस देश का नाम ‘सियाम’ होना, इसकी पुरानी राजधानी का नाम ‘अयोध्या’ होना, बैंकॉक का पुराना नाम देवभूमि… आदि तथ्य सुनते हुए हम अपनी जानकारी को दोहराते हुए उसे पुख्ता कर रहे थे, लग्जरी बस समूची रफ़्तार से भागी जा रही थी, रास्ते के खेत-पथार, बिल्डिंगों आदि को तेज़ी से पीछे छोड़ते हुए. हम खुद भी अपने गौरव बिन्दुओं की तलाश में काफी पीछे चले गए थे कि साथ चल रहे युवाओं की चिल्लाहट से तंद्रा भंग हुई.

पटाया-पटाया चिल्लाते हुए साथ चल रहे युवाओं ने ऐसा शोर मचाना शुरू किया मानों ये सब कोलंबस या वास्को डी गामा जैसा किसी भूमि की तलाश करने निकले हों और अब अकस्मात् इन्हें अपनी इच्छित भूमि मिल गयी हो. भोर की पहली किरण के साथ नियोंन लाईटों से लिखे गए ‘पटाया सिटी’ का जगमगाता बोर्ड तेज़ी से बड़ा होता जा रहा था. सारे युवा और वृद्ध युवा मित्र भी जल्द से जल्द इस ‘तीर्थ’ पर पांव रखने को बेताब से हो रहे थे, मानसिकता समझ में आ रही थी. भरोसा हो गया था कि आगे की यात्रा कम से कम मेरी ज़रा कठिन होने वाली है, क्यूंकि सारे प्यासे-तरासे लोग उस ज़मीन पर उतरते ही कहीं खो जाने वाले हैं.

जीवन की हर यात्रा में आपको अपने मन का सहयात्री मिले ही, ऐसा कहां संभव होता है भाई? यात्रा चाहे नगर-डगर की हो या जीवन की, ‘समझौता’ इसकी पहली ही शर्त है शायद. किसी ने कहा भी तो है कि जीवन सफ़र में ‘अगर आपको अपने लायक एक मित्र मिल जाय तो समझिये आप भाग्यशाली हैं, अगर दो ऐसे मित्र मिलना संभव हो तब तो आपके भाग्य का पारावार ही समझिये, और दो से अधिक मित्र? ऐसा होना तो असंभव ही है.’ तो जब समूचे जीवन में ही ऐसा होना संभव नहीं है, तब आप कैसे सोच सकते हैं कि अनजाने लोगों की भीड़ के साथ आप किसी बेगाने देश की यात्रा पर हों और वहां आपको सारे अपनी तरह के लोग मिलेंगे? तो अपने टीम के लोगों के साथ तादात्म्य बिहते हुए, उन्हें अपने ढंग से घूमने-घामने को छोड़ देने, और खुद अपनी मर्जी का करने का मानस लेकर ही आप ऐसे किसी यात्रा को सरल बना सकते हैं.

मैंने खुद के बारे में भी सोचा कि अपन भी कोई तीर्थ यात्रा करने का मानस लेकर तो निकले नहीं हैं. ज़ाहिर है कम या ज्यादा, कुछ न कुछ भौतिक लालसा के साथ ही आये होंगे यहां तक. हां, इतना तय करके ज़रूर निकले थे अपन कि भले रूप और यौवन का बाज़ार बने इस देश को हमें भी जीना है जी भर, लेकिन कम से कम मांस-मज्जा की खरीद से खुद को बचाने की भरसक कोशिश करूंगा. बकौल अकबर इलाहाबादी साहब- ”दुनिया में हूं, दुनिया का तलबगार नहीं हूं, बाजार से गुजरा हूं, खरीददार नहीं हूं.’’ हालांकि यहां आकर इलाहाबादी का ही एक दूसरा मिसरा ज्यादा काबिलेगौर हो जाता है- ”इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई है, कि हर सूरत कलेजे से लगा लेने के काबिल है.”

तो वियतनाम और अमेरिका नामक दो सांढों की लड़ाई में नाहक अपनी ‘फसल’ बर्बाद कर, काफी कुछ हारकर सुन्दर, सरस और पावन यह देश किस तरह आज ज़िंदा मांसों का बाज़ार बना फिर रहा है, बुद्ध का अपना यह प्यारा देश किस तरह अपनी बेटियों को आज ‘आम्रपाली’ बना देने पर स्वेच्छया मजबूर है, यह उसकी विवशता मात्र है या सामयिक ज़रूरत? हर तरह के सांसारिक दोगलापन के खिलाफ एक चिर विद्रोही का शंखनाद है यह या इस चोले को माटी का समझ इस्तेमाल कर लेने की आस्था इसमें इन्होने जोड़ दिया है, यह चर्चा आगे की कड़ियों में. हालांकि इस संबंध में जजमेंटल होने से पहले हमको-आपको यह भी खुद ही तय करना होगा कि अपने नंबर का बिल्ला लगाए पटाया के मसाज़ बाज़ारों में बैठी थाई यौवनाओं का चित्र आपको ज्यादा अश्लील लगता है या दिल्ली के जेठ की दुपहरी में लाल बत्ती पर हाथ में कटोरा थामे अपनी ही चार-छः साल की दुधमुंही बेटियों का दृश्य. अंततः तय हमें ही करना है कि समाज के माथे पर ‘भूख’ ज्यादा बड़ा कलंक है या उसके सीने पर उगा हनी मसाज़ सेंटर….!

…जारी…

इस यात्रा संस्मरण के लेखक पंकज कुमार झा छत्तीसगढ़ भाजपा की मैग्जीन ‘दीपकमल’ के संपादक हैं. उनसे संपर्क jay7feb@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. पंकज बिहार के मिथिला इलाके के निवासी हैं. नौकरी भले ही भाजपा में करते हैं पर वक्त मिलते ही देश-विदेश की यात्राओं पर निकल पड़ते हैं, यायावर बन कर.


पंकज इसके पूर्व अपनी अमेरिका यात्रा का वृत्तांत लिख चुके हैं:

मेरी अमेरिका यात्रा (1) : वो झूठे हैं जो कहते हैं अमेरिका एक डरा हुआ मुल्क है

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मेरी अमेरिका यात्रा (2): जहां भिखारी भी अंग्रेज़ी ही बोलते हैं!

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मेरी अमेरिका यात्रा (3): अमेरिकी बाज़ार पर सबसे ज्यादा छाप आपको चीन की मिलेगी

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