पत्रकारिता की राह पर शंभूनाथ शुक्ला का सफर… कुछ यादें, कुछ बातें

मैं बनवारी जी से मिलने साढ़े चार सौ किमी की यात्रा तय कर दिल्ली आ गया वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल जब से विजुअल मीडिया का दौर आया है पत्रकारिता एक ग्लैमरस प्रोफेशन बन गया है। पर हमारे समय में दिनमान ही पत्रकारिता का आदर्श हुआ करता था और रघुवीर सहाय हमारे रोल माडल। लेकिन उनकी …

मेरी थाईलैंड यात्रा (3) : …अपमान रचेता का होगा, रचना को अगर ठुकराओगे

कोरल आईलेंड की यात्रा से पहले थाईलेंड के बारे में कुछ बातें कर ली जाय. हवाई अड्डे से ही लगातार नत्थू की एक इच्छा दिख रही थी कि वो अपने देश के बारे में ज्यादा से ज्यादा हमें बताये. शायद इसके पीछे उसकी यही मंशा रही हो कि हम जान पायें कि केवल एक ही चीज़ उसके देश में नहीं है, इसके अलावा भी ढेर सारी चीज़ें उनके पास हैं जो या तो हमारी जैसी या हमसे बेहतर है. बाद में यह तय हुआ कि जब-जब बस में कहीं जाते समय खाली वक़्त मिलेगा तो थाईलैंड के बारे में नत्थू बतायेंगे और मैं उसका हिन्दी भावानुवाद फिर दुहराऊंगा. उस देश के बारे में थोड़ा बहुत पहले पायी गयी जानकारी और नत्थू की जानकारी को मिला कर अपन एक कहानी जैसा तैयार कर लेते थे और उसे अपने समूह तक रोचक ढंग से पहुचाने की कोशिश करते थे. नत्थू तो इस प्रयोग से काफी खुश हुए लेकिन ऐसे किसी बात को जानने की कोई रूचि साथियों में भी हो, ऐसा तो बिलकुल नहीं दिखा. उन्हें थाईलैंड से क्या चाहिए था, यह तय था और इससे ज्यादा किसी भी बात की चाहत उन्हें नहीं थी. खैर.

मेरी थाईलैंड यात्रा (2) : …हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे!

हमारी टोली पटाया के होटल गोल्डन बीच पहुच चुकी थी. औपचारिकताओं के साथ ही हमने अपना पासपोर्ट वहीं रिशेप्सन पर एक लॉकर लेकर उसमें जमा कराया. युवाओं का कौतुहल और बेसब्री देखकर मनोज बार-बार उन्हें कह रहे थे कि पहले ज़रा आराम कर लिया जाए, फिर अपने मन का करने के बहुत अवसर बाद में आयेंगे. सीधे दोपहर में भोजन पर निकलने का तय कर हम सब कमरे में प्रविष्ट हुए. शानदार और सुसज्जित कमरा. हर कमरे के लॉबी में ढेर सारे असली फूलों से लदे पौधों का जखीरा. इस ज़खीरे के कारण तेरह मंजिला वह होटल सामने से बिलकुल फूलों से लदे किसी पहाड़ के जैसा दिखता है.

मेरी थाईलैंड यात्रा (1) : कृपया भगवान बुद्ध के मुखौटे वाली प्रतिमा न खरीदें!

(दाहिने से तीसरे नंबर पर लेखक पंकज कुमार झा)


इस पंद्रह अगस्त की दरम्यानी रात को बंगाल की खाड़ी के ऊपर से उड़ते हुए यही सोच रहा था कि सचमुच आपकी कुंडली में शायद विदेश यात्रा का योग कुछ ग्रहों के संयोग से ही बना होता है. मानव शरीर में आप जबतक हैं, तबतक लगभग आपकी यह विवशता है कि आप पृथ्वी नामक ग्रह से बाहर कदम नहीं रख सकते. हालांकि इस ग्रह की ही दुनियादारी को कहां सम्पूर्णता में देख पाते हैं हम? अगर भाग्यशाली हुए आप तब ज़रा कुछ कतरा इस धरा के आपके नसीब में भी देखना नसीब होता है.

सुशील झालानी ने एक तरह से मेरा गरेबान पकड़ कर मुझे पत्रकार बना दिया

: मीडिया की मंडी में हम (1) : मेरे खानदान का पत्रकारिता से दूर- दूर तक लेना देना नहीं था और ना ही मेरा। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि पत्रकार बनूंगा। पर वक्त ने बना दिया और ऐसा बना दिया कि चाह कर भी इस पहचान से मुक्त नहीं हो सका। राजस्थान के भरतपुर जैसे छोटे कस्बेनुमा शहर में पला बढ़ा मैं एक नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार का सदस्य। पिता जरूर परिवार की नौकरी परंपरा छोड़कर इंटक से जुड़कर लेबर लीडरी में सक्रिय हो गए थे। ताऊ कृषि वैज्ञानिक थे, तो एक चाचा हैडमास्टर थे तो एक डॉक्टर, एक फूफा तहसीलदार थे। हमारे तो करीब-करीब सभी मामा भी सरकारी नौकरियों में ही थे। हम नौ भाई थे और हमारे बीच पाँच बहनें।