बाराबंकी/लखनऊ। एबीवीपी कार्यकर्ताओं पर हुए पुलिस लाठीचार्ज ने यूपी की सियासत में हलचल मचा दी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे “परिषद बनाम वाहिनी” की लड़ाई बताते हुए सीधा निशाना साधा, तो आरएसएस खेमे में भी पीड़ा और बेचैनी की लहर दिख रही है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या यही बर्बरता हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं पर भी होती? सत्ता और संगठन के बीच की यह खाई अब कविता, वेदना और राजनीति के तीरों में बदलकर सामने आ रही है।
इस पूरे प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय एक के बाद एक तीन सोशल मीडिया पोस्ट में लिखते हैं-
समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव का बड़ा आरोप। ABVP के साथ हुई पुलिसिया मारपीट की घटना को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद बनाम योगी की हिंदू युवा वाहिनी के बीच की खाई से जोड़ा।

लिखा कि ये ‘परिषद’ बनाम ‘वाहिनी’ के दो पाटों के बीच पिस रहे और पिट रहे लोगों का मामला है।
सवाल उठ रहे हैं कि अगर ये ABVP की जगह हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता होते तो क्या पुलिस की लाठी अपनी जगह से हिलने की हिमाकत कर पाती?
सवाल साइबेरिया के जंगलों से घने हैं। जवाबों की सड़क उत्तर प्रदेश की शिक्षक भर्ती की तरह नदारद है!!
पुलिसिया बर्बरता के शिकार ABVP के कार्यकर्ताओं से मिलने के लिए BJP के तमाम नेता ट्रॉमा सेंटर पहुंचे!!
मुख्यमंत्री को भी जाना चाहिए था! उनका थोड़ा सा भरम तो बचा रहता कि जिस नेतृत्व की ख़ातिर सालहा-साल वे लड़ते भिड़ते रहते हैं,
उसके पास उनकी ओर एक नज़र झाँकने भर का वक़्त तो था!
ABVP की चोट, RSS की पीड़ा!!…
ABVP पर हुए लाठीचार्ज को लेकर आरएसएस की पीड़ा रह रहकर हूक की शक्ल में उठती दिखाई दे रही है। ऐसा लगता है कि मानो एक रहस्यमयी मौन के शांत तालाब के नीचे विवशता भरी कशमकश का कोई सुसुप्त ज्वालामुखी सांसे ले रहा हो!!

आप इस स्टेट्स पर गौर कीजिए। ये आरएसएस के पूर्वी क्षेत्र के सह प्रचार प्रमुख और राष्ट्रधर्म के निदेशक मनोज कांत की वेदना की ईंटों से निर्मित हुआ स्टेट्स है। वे ABVP की पीठ पर चली पुलिसिया बर्बरता की सख्त लाठियों से इस तरह द्रवित हैं कि वेदना कविता की शक्ल में फूट फूटकर बाहर आ रही है।
मानो दुष्यंत कुमार की भावनाओं को शब्द देते हुए वे कहना चाह रहे हों कि-
“मेरे सीने में न सही, तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।”
मगर यहां सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। अभी तो नौकरशाही के बेलगाम तंदूर की पहली आंच आप तक पहुंची है। किसी रोज जब आप आम जनता की तरह इसकी हाहाकार मचाती लपटों के दावानल को भोगने के लिए अभिशप्त होंगे, तो शायद स्टेट्स की ये कविता खंड काव्य या फिर किसी महाकाव्य में तब्दील हो जाए!!
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