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राजस्थान

अडानी के लिए भजनलाल सरकार मोदी की न्यूक्लियर परियोजनाओं को ठिकाने लगाने पर उतरी!

राजस्थान सरकार मौजूदा कोयला संयंत्रों में किए गए निवेश को बेकार करने, नवीकरणीय ऊर्जा पर सवाल उठाने और मोदी सरकार की न्यूक्लियर परियोजना को भी अविश्वसनीय बताने पर उतर आई है। वजह सिर्फ एक—3,200 मेगावाट की ऐसी नई मेगा कोयला परियोजना को मंजूरी दिलाना, जो पूरी तरह अडानी समूह की विस्तार योजनाओं में फिट बैठती है।

नई दिल्ली। बीजेपी शासित राजस्थान सरकार एक बार फिर 3,200 मेगावाट के विशाल कोयला आधारित बिजली संयंत्र को आगे बढ़ाने की कोशिश में जुटी है। यह प्रस्ताव सीधे तौर पर अडानी पावर की राजस्थान के कवाई (Kawai) स्थित 1,320 मेगावाट के मौजूदा प्लांट के 3,200 मेगावाट विस्तार से मेल खाता है। इससे पहले राज्य विद्युत नियामक आयोग (RERC) इस प्रस्ताव को खारिज कर चुका है, लेकिन अब सरकार पुराने तर्कों को पलटते हुए नई रणनीति के साथ वापस लौटी है।

पुराने प्लांट “अच्छे” थे, अब अचानक रिटायर करने की तैयारी

राज्य सरकार अब अपने ही कुछ मौजूदा कोयला संयंत्रों को समय से पहले बंद (रिटायर) करने की बात कह रही है, जबकि कुछ समय पहले तक इन्हें “अच्छा प्रदर्शन करने वाला” और “2030 के बाद तक चलने योग्य” बताया गया था। इन प्लांट्स में सरकार ने भारी निवेश कर अपग्रेडेशन और मरम्मत भी करवाई है।

केंद्र की योजनाओं और CEA के आकलन पर भी सवाल

राजस्थान सरकार ने न सिर्फ केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के रिसोर्स एडिक्वेसी प्लान को “अत्यधिक सतर्क (कंज़र्वेटिव)” बताया, बल्कि केंद्र सरकार के साथ किए गए कोयला बिजली विस्तार के एमओयू (MoU) को भी अनिश्चित करार दे दिया।

CEA के अनुसार 2035 तक राजस्थान में कोयला बिजली की कमी 1,905 मेगावाट की है, जबकि राज्य सरकार इसे 5,500 मेगावाट बताने पर अड़ी है। नियामक आयोग ने इस दलील को तथ्यों के अभाव में खारिज किया था।

न्यूक्लियर और रिन्यूएबल को भी किया दरकिनार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित माही बांसवाड़ा न्यूक्लियर प्रोजेक्ट (2,400 मेगावाट)—जिसका 1,400 मेगावाट हिस्सा राजस्थान को मिलना है—को भी राज्य सरकार ने “अनिश्चित” बताकर किनारे कर दिया। जबकि पहले यह परियोजना 2031 तक चालू मानी जा रही थी।

राज्य सरकार ने रिन्यूएबल एनर्जी और बैटरी स्टोरेज (BESS) को भी नाकाफी बताते हुए कहा कि “कोयला ही ग्रिड की रीढ़ बना रहेगा” और बिना नए कोयला प्लांट के आर्थिक विकास संभव नहीं है।

नियामक आयोग ने पहले ही लगाई थी फटकार

18 नवंबर 2025 को RERC ने इस 3,200 मेगावाट के प्रस्ताव को चार प्रमुख कारणों से खारिज कर दिया था—

  • प्लांट को ज़रूरी तौर पर राजस्थान में ही लगाने की शर्त
  • CEA के आधिकारिक आकलन की अनदेखी
  • केंद्र सरकार के साथ तय की गई परियोजनाओं को गणना से बाहर रखना
  • 1,350 मेगावाट के पुराने प्लांट रिटायरमेंट की बिना तकनीकी जांच घोषणा

आयोग ने कहा था कि बिना ठोस तकनीकी–आर्थिक अध्ययन किसी भी संयंत्र को बंद नहीं किया जा सकता।

फिर भी नहीं मानी सरकार

आयोग के आदेश के सिर्फ छह दिन बाद राजस्थान सरकार ने CEA को पत्र लिखकर नए तर्क गढ़े और अब उसी पत्र का सहारा लेकर फिर से RERC के पास पहुंच गई है। सरकार का दावा है कि पुराने प्लांट पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप नहीं रह गए हैं, जबकि इन्हीं प्लांट्स को चलाए रखने के लिए हाल ही में करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं।

अडानी के अनुरूप टेंडर?

विशेषज्ञों का कहना है कि 3,200 मेगावाट का आंकड़ा, लोकेशन की शर्तें और दीर्घकालिक थर्मल टेंडर की शर्तें अडानी पावर के विस्तार प्लान के बिल्कुल अनुरूप हैं। यही वजह है कि इस पूरे मामले को “कॉरपोरेट-फ्रेंडली पॉलिसी” के तौर पर देखा जा रहा है।

27 जनवरी को फिर सुनवाई

RERC में सरकार की रिव्यू पिटिशन पर अगली सुनवाई 27 जनवरी को होनी है। आयोग की मंजूरी के बिना यह टेंडर लागू नहीं हो सकता, क्योंकि यह केंद्र सरकार की मॉडल बिडिंग गाइडलाइंस से अलग है।

राज्य सरकार, CEA और अडानी ग्रुप से इस मुद्दे पर सवाल पूछे गए हैं, लेकिन खबर लिखे जाने तक किसी की ओर से जवाब नहीं आया।

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