दक्षिण अफ्रीका की बिजली व्यवस्था के आधुनिकीकरण से जुड़ी करीब 25–26 अरब डॉलर की महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस परियोजना में भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी के समूह की भागीदारी की खबर सामने आते ही सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। ऑनलाइन बहसें देश में वर्षों से जारी बिजली संकट और अहम राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे में विदेशी कंपनियों की भूमिका को लेकर गहरी असहजता को उजागर कर रही हैं।
दक्षिण अफ्रीका सरकार ने इस सप्ताह पुष्टि की कि सात अंतरराष्ट्रीय कंसोर्टियम को देश की राष्ट्रीय ट्रांसमिशन ग्रिड के विस्तार के लिए बोली लगाने के लिए पूर्व-योग्य (प्री-क्वालिफाई) किया गया है। इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 26 अरब डॉलर है।
दक्षिण अफ्रीकी मीडिया बिजनेस इनसाइडर की रिपोर्ट के अनुसार, प्रिटोरिया में बिजली मंत्री कोगोसिएंत्शो रामोकोपा ने इसे देश की बिजली रीढ़ को आधुनिक बनाने और ऊर्जा सुरक्षा बहाल करने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया।
पूर्व-योग्य कंपनियों में अडानी पावर की मिडिल ईस्ट यूनिट भी शामिल है, जो गौतम अडानी के अडानी समूह का हिस्सा है। अडानी समूह के कारोबार बंदरगाहों, बिजली उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स तक फैले हुए हैं। इसके अलावा फ्रांस की इलेक्ट्रिसिते द फ्रांस (EDF) और चीन की सरकारी कंपनियां स्टेट ग्रिड इंटरनेशनल डेवलपमेंट तथा चाइना साउदर्न पावर ग्रिड इंटरनेशनल भी इस दौड़ में शामिल हैं।
हालांकि सरकार ने इसे एक तकनीकी उपलब्धि के तौर पर पेश किया, लेकिन जनता की प्रतिक्रिया जल्द ही भरोसे, स्वामित्व और क्षमता जैसे मुद्दों पर केंद्रित हो गई। फेसबुक और एक्स (पूर्व ट्विटर) पर कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि विदेशी कंपनियों को इस अहम परियोजना में क्यों शामिल किया जा रहा है।


डरबन निवासी सिफिसो ज़ोंडो ने लिखा कि यह कदम “जाने से पहले सब कुछ नीलाम करने” जैसा लगता है। यह टिप्पणी निजीकरण और रणनीतिक संपत्तियों पर नियंत्रण को लेकर फैली आशंकाओं को दर्शाती है। वहीं, खुद को दक्षिण अफ्रीकी बताने वाले एल वान जेंट ने खुलकर विरोध जताते हुए कहा कि यह काम स्थानीय हाथों में ही रहना चाहिए, क्योंकि देश में “इसे करने के लिए कुशल कंपनियां और लोग मौजूद हैं।”
हालांकि सभी प्रतिक्रियाएं नकारात्मक नहीं रहीं। कुछ लोगों ने विदेशों में अडानी समूह के रिकॉर्ड को उम्मीद की वजह बताया। भारत में रह रहे दक्षिण अफ्रीकी नागरिक सागर सिंह ने अपने अनुभव साझा करते हुए लिखा कि अडानी की बिजली सेवा भरोसेमंद रही है—बिना किसी कटौती के और दक्षिण अफ्रीका की तुलना में काफी कम बिल के साथ। उनका यह पोस्ट व्यापक रूप से साझा किया गया, खासकर उन लोगों के बीच जो वर्षों से जारी बिजली कटौती से त्रस्त हैं।
क्षेत्रीय स्तर पर भी चर्चा हुई। बोत्सवाना से लिखने वाले ओटेंग फिलिप ने करीब 2.1 अरब डॉलर की एक अलग ऊर्जा परियोजना का जिक्र करते हुए कहा कि अगर सही तालमेल हो, तो क्षेत्रीय निवेश दक्षिण अफ्रीका की बिजली समस्या को कम कर सकते हैं।
वहीं, कुछ प्रतिक्रियाएं व्यंग्यात्मक और अविश्वास से भरी रहीं। एक यूजर ने टिप्पणी की कि “लुटेरे पहले ही पैसे का स्वाद लेने लगे हैं,” जो ऊर्जा क्षेत्र में अतीत के भ्रष्टाचार घोटालों के कारण जनता में जमी गहरी शंका को दर्शाता है।
सोशल मीडिया शोर से परे, इस परियोजना का महत्व बेहद बड़ा है। दक्षिण अफ्रीका अपनी ऊर्जा संक्रमण योजना के तहत पुराने कोयला संयंत्रों पर निर्भरता घटाकर नवीकरणीय ऊर्जा, गैस और अन्य स्रोतों को ग्रिड से जोड़ना चाहता है। पहले चरण में ही 1,100 किलोमीटर से अधिक नई ट्रांसमिशन लाइनें बिछाने और 3,000 मेगावाट से ज्यादा अतिरिक्त क्षमता को जोड़ने की योजना है। साथ ही सरकार ने हाल ही में नवीकरणीय ऊर्जा के लिए चार पसंदीदा बोलीदाताओं की घोषणा भी की है।
लेकिन आम लोगों के लिए तकनीकी विवरणों से ज्यादा अहम सवाल यही है—क्या इससे बिजली संकट खत्म होगा? वर्षों की लोड शेडिंग से जूझ चुके देश में जनता एक ओर भरोसेमंद बिजली के लिए बेताब है, तो दूसरी ओर इस बात को लेकर सशंकित भी कि आखिर यह जिम्मेदारी किसे सौंपी जा रही है।
बोली प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, यह साफ होता जा रहा है कि जीतने वाली कंपनी को सिर्फ इंजीनियरिंग की चुनौती ही नहीं, बल्कि एक थकी हुई और अविश्वासी जनता का भरोसा भी जीतना होगा—ताकि इस बार सचमुच बत्तियां जलती रहें।


