कश्मीर से 370 हटाने का करिश्मा, एक राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने की उपलब्धि और आतंकवाद खत्म कर देने का प्रचार। फिर भी आतंकवादी हैं कि मानते नहीं। सरकार के 56 ईंची कारनामों के प्रचार में आजकल स्वास्थ्य मंत्री को लगाया गया है। राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस भी नहीं के बराबर है, नड्डा का सवाल छाया है, कांग्रेस सरकारों में क्यों हुए पेपर लीक?
संजय कुमार सिंह
आज टाइम्स ऑफ इंडिया में संसद नहीं चलने की चिन्ता सेकेंड लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, ‘हमारा समय बर्बाद न करें’ : भारत के मुख्य न्यायाधीश ने ‘पुलिस बर्बरता’ के खिलाफ याचिका खारिज कर दी। याचिका में अदालत से अपील की गई थी कि 20 जुलाई की घटनाओं के वीडियो फुटेज देखकर निष्पक्ष जांच के आदेश दिए जाएं। खबर के अनुसार, याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने कहा, हमारा समय बर्बाद न करें। कहने को मुख्य न्यायाधीश ने अधिवक्ता से अपना समय भी खराब नहीं करने के लिए कहा है लेकिन खबर के साथ हाईलाइट किए अंश के अनुसार सीजेआई ने यह भी कहा कि, हमारी दिलचस्पी वीडियो में नहीं है; हमारे पास वीडियो देखने का समय नहीं है। मुझे लगता है कि सोनम वांगचुक का मामला वीडियो के आधार पर ही बना था, उमर खालिद किसी वीडियो सबूत के आधार पर ही छह साल से जेल में है और टुकड़े-टुकड़े गैंग की पूरी अवधारणा जेएनयू के वीडियो से ही बनाई गई है और मामला अभी तक अंजाम पर नहीं पहुंचा है। इसलिए वीडियो देखना, नहीं देखना सुप्रीम कोर्ट का अधिकार या विवेक हो सकता है और वह मेरा विषय नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पास एक गंभीर मामले में शिकायत सुनने और उसपर कार्रवाई का आदेश देने का समय नहीं है तो खबर जरूर है। आज यह खबर कई अखबारों में पहले पन्ने पर ठीक-ठाक छपी है। मुख्य न्यायाधीश के पास वीडियो देखने का समय नहीं है यह उनका निजी मामला नहीं हो सकता है। आखिर उनका समय देश के लिए ही है और कम से कम कार्य समय में तो है ही। इसके लिए उन्हें वेतन-भत्ते और सुविधाएं मिलती हैं। रिटायरमेंट के बाद पेंशन भी मिलती होगी। अगर वे रिटायरमेंट के बाद की व्यवस्था नहीं कर रहे हैं तो उनके पास इस मामले में सुनवाई के लिए समय होना चाहिए था। निश्चित रूप से यह मामला सरकार की मनमानी के खिलाफ है जो उसकी नालायकी, निकम्मेपन के कारण नहीं भी हो तो शिक्षा क्षेत्र की खराब हालत के कारण शिक्षा मंत्री को हटाने की बहुत सामान्य मांग पर सुनवाई नहीं होने के कारण है। नालायक, निकम्मी सरकार ने छात्रों का दबाव बढ़ने पर ज्यादती और बर्बरता की। नजीततन आंदोलन फैलता जा रहा है और आम नागरिकों का जीवन मुश्किल हो रहा है। इसलिए इसपर सुनवाई कर जरूरी आदेश देना मुख्य न्यायाधीश की संवैधानिक जिम्मेदारी है। उनके पास समय नहीं है तो वे इसे किसी और जज को सौप सकते थे। सौंपना भी उन्हीं का काम है। इसलिए मुझे लगता है कि आज अखबारों ने इस खबर को उचित प्रमुखता नहीं दी है। आइए देखें कैसे?
आज ही हिन्दुस्तान टाइम्स में 15 लाइन की एक सिंगल कॉलम खबर है जिसका शीर्षक तीन लाइन में है। विस्तार अंदर है। खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि 14 जुलाई के उसके आदेश का पालन करते हुए विवादास्पद भोजशाला मंदिर कमल मौला मस्जिद परिसर के पास जुम्मे की नमाज के लिए अलग जगह मुहैया कराई जाए। यह अंतरिम व्यवस्था होगी और अदालत ने यह आदेश इस सूचना के बाद दिया है कि प्रशासन ने जो जगह दी है वह करीब दो किलोमीटर दूर है। इस खबर के आलोक में मैंने एआई जेमिनाई से पूछा, 1991 के पूजा स्थल विधेयक के संदर्भ में इस आदेश पर आम नागरिक को क्या समझना चाहिए या इसका क्या अर्थ निकलता है। एआई के जवाब इटैलिक्स में हैं – कानूनी विवाद (ASI संरक्षित स्मारक बनाम 1991 का कानून) : 1991 का पूजा स्थल अधिनियम कहता है कि 15 अगस्त 1947 को किसी भी धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था, उसे बदला नहीं जा सकता। मुझे लगता है कि अदालत के पास समय की कमी है तो इस मामले को विचारार्थ स्वीकार ही नहीं किया जाना चाहिए और जितनी जल्दी संभव हो 15 अगस्त 1947 की स्थिति बहाल कर दी जानी चाहिए। लेकिन भारतीय जनता पार्टी की सरकार को यह पसंद नहीं आएगा। मुझे शक है कि यह मामला इसीलिए चलाया जा रहा है। मीडिया का काम है कि वह वास्तविकता बताए। पक्षपाती और सांप्रदायिक भी होगा तो पाठक समझ जाएगा लेकिन चुप्पी गलत में सहयोग करना हो सकता है। मैं मीडिया की चुप्पी की चर्चा कर रहा हूं। वैसे भी भारत के मुख्य न्यायाधीश का काम सिर्फ फैसले देना नहीं है। प्रशासनिक काम भी उन्हीं के जिम्मे है और ऐसे मामले निपटाना भी उनका काम है। लेकिन दुनिया जानती है कि उनपर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और फिर भी मुख्य न्यायाधीश हैं तो संभव है आम नेताओं की तरह उन्हें भी डराया जाता हो या वे मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने का अहसान चुका रहे हों। ऐसे में ‘समय नहीं है’ का बहाना चाहे जितना वैध हो हर तरह के मामले में दिखना चाहिए। लेकिन दिख यह रहा है कि उनके पास सरकार के हित में काम करने के लिए समय है। सरकार के खिलाफ काम करना नहीं चाहते हैं। मैं नहीं जानता मेरा यह शक कितना सही है या मामला शक करने लायक है भी या नहीं लेकिन सामान्य नहीं है और मीडिया का काम है कि ऐसे मामलों की पड़ताल करे। एआई के अनुसार, मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि 1947 के समय से वहां जुम्मे की नमाज होती आ रही थी और 2003 के एएसआई के आदेश से दोनों पक्षों (मंगलवार को हिंदू पूजा, शुक्रवार को नमाज) को अनुमति थी, इसलिए 1991 का कानून लागू होना चाहिए।
मुझे लगता है कि मुस्लिम पक्ष की मांग काफी उदार है या मजबूरी। 1991 के कानून के अनुसार मंगलवार को पूजा 2003 के बाद शुरू हुई है जिसे 1947 की स्थिति के अनुसार (संभवतः) बंद कर दिया जाना चाहिए। लेकिन हो क्या रहा है? एआई के अनुसार हाई कोर्ट ने माना था कि यह परिसर प्राचीन स्मारक अधिनियम के तहत एएसआई संरक्षित स्थल है, इसलिए इस पर 1991 के कानून की धारा 4(3)(a) की छूट लागू हो सकती है। और शुरू कर दिया गया विवाद – मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में अंतिम रूप से विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी 1991 के एक्ट पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है, बल्कि केवल अंतिम सुनवाई होने तक अंतरिम व्यवस्था बनाई है। जाहिर है, अंतिम फैसला सुना दिया जाए तो विवाद खत्म हो जाएगा (या सुनाकर किया ही जाना चाहिए) लेकिन सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकता में अंतिम फैसला नहीं है। जगह देने का आदेश है जो दो किलोमीटर दूर दिया गया और फिर सुनवाई हुई, किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं। इस तरह हार जीत का खेल या विवाद चल रहा है। मेरे हिसाब से इसलिए भी मीडिया इसमें मुखर नहीं है। मामला डबल इंजन की सरकार का है और उसे ऐसे विवाद जमाने से प्रिय विषय रहे हैं। अब देखिए एआई के अनुसार अंतरिम व्यवस्था का अर्थ – शांति और व्यवस्था बनाए रखना: अदालत का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में किसी तरह का तनाव या कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा होने से रोकना है। जब तक पूरे मामले और 1991 के कानून की व्याख्या पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक किसी भी पक्ष के अधिकार पूरी तरह खारिज न हों। “पास में ही जगह” देने पर जोर: प्रशासन द्वारा दो किलोमीटर दूर जगह तय किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। इसका अर्थ यह है कि प्रशासनिक उपायों को महज खानापूर्ति नहीं होना चाहिए। अदालत मानती है कि जुम्मे की नमाज के लिए पास की व्यावहारिक और सुलभ जगह मिलना जरूरी है ताकि श्रद्धालुओं को असुविधा न हो। दोनों पक्षों के अधिकारों का संतुलन: बिना मुख्य केस (अंतिम अधिकार/1991 एक्ट) पर अंतिम फैसला सुनाए, कोर्ट ने एक मध्यस्थ या अस्थायी व्यावहारिक रास्ता निकाला है ताकि न्यायिक प्रक्रिया चलने के दौरान सामाजिक सौहार्द बना रहे। कहने की जरूरत नहीं है कि एआई का यह ज्ञान सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी की बात नहीं कर रहा है। मामले को लटकाए रखने पर शांति है लेकिन शांति व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश को गंभीर बता रहा है। जबकि इसकी जरूरत मामले को जिन्दा और गर्म रखने के लिए भी है। यहां समय की कमी क्यों नहीं है? एआई को मिलीभगत शायद न पता हो लेकिन यहां तो दिख ही रहा है वरना अदालत का आदेश (अक्षरशः और भावना के अनुरूप) माना क्यों नहीं गया और नहीं माना जा रहा है तो किस बात की सहानुभूति? 1991 के कानून के अनुसार 1947 की स्थिति बहाल करने का आदेश दीजिए, मामला खत्म। यह राम मंदिर जैसा मामला नहीं हो सकता है क्योंकि अब 1991 का कानून है और जाहिर है उसकी उपेक्षा की जा रही है।
मीडिया के दोगलेपन की बात करूं तो आज राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस कम है और कॉक्रोच, शिक्षा व केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे के मामले में स्वास्थ्य मंत्री को आगे कर दिया जाना छाया हुआ है। अमर उजाला ने दोनों को बराबर में छापा है जैसे आदर्श पत्रकारिता कर रहा हो। दैनिक भास्कर में यही दोनों लीड है जबकि नड्डा के सवाल का मतलब ही नहीं है। कोई पुराना पापी चोर, किसी को किसी और का माल चुराते पकड़ ले तो आप शिकायत नहीं सुनेंगे? उसे चोरी का माल ले जाने देंगे? ठीक है कि नड्डा अपनी राजनीति या नौकरी कर रहे हैं लेकिन प्रदर्शन ऐसा नहीं है कि पहले पन्ने पर जगह दी जाए। नवोदय टाइम्स में भी नड्डा पहले पन्ने पर हैं। उन्होंने कहा है, कांग्रेस राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश में। देशबन्धु ने राहुल गांधी की बातों को लीड बनाया है। नड्डा साब को शीर्षक समेत आठ लाइनों में निपटा दिया है। मुख्य शीर्षक है, छात्रों से बर्बरता के लिए प्रधानमंत्री माफी मांगें। उपशीर्षक है, परीक्षा प्रणाली में हुई गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो। अंग्रेजी अखबारों में भी नड्डा पहले पन्ने पर नहीं हैं। द टेलीग्राफ ने राहुल गांधी के इस आरोप को शीर्षक बनाया है – 152 पेपर लीक, शून्य दोषसिद्धि। दि एशियन एज की लीड के साथ फोटो राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस की है। शीर्षक है – केंद्र ने वार्ता की पेशकश की; सीजेपी किसी न्यूट्रल जगह पर ही वार्ता पर दृढ़। द हिन्दू में लीड दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश है। राहुल गांधी सिंगल कॉलम में। हाईकोर्ट में अगली तारीख 11 सितंबर है इसलिए इस आदेश का कोई खास मतलब नहीं है। इस पूरे मामले में पुलिस और बाकी अधिकारियों का रवैया अभी ही साफ है। इंडियन एक्सप्रेस ने पेलेट गन के छर्रों से घायल गुड़गांव में नौकरी करने वाले एमबीए इरशाद शेख से लेडी हार्डिंग अस्पताल में बात की। मैंने बताया था कि जेपी नड्डा भी उसे देखने गए थे और उसका वीडियो बिना आवाज के जारी किया गया था। इरशाद शेख ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उसे आरपीएफ के सिपाही ने गोली मारी और छर्रों से चेहरे पर (आंख में भी) चोट लगी। इस समय वह कान, नाक गला विभाग में इलाज करा रहा है। खबर के अनुसार दिल्ली पुलिस ने पेलेट के इस्तेमाल से इनकार किया है, सीआरपीएफ ने टिप्पणी करने के आग्रह का जवाब नहीं दिया। अस्पताल के निदेशक ने इस सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया कि जख्म पेलेट गन के हैं या नहीं। उनका कहना है कि वैज्ञानिक आधार पर ही इसकी पुष्टि की जा सकती है या इससे इनकार किया जा सकता है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की खबर छापी है। इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी आरोपी को हाईकोर्ट से जमानत मिल जाए तो उसे अंतिम माना जाना चाहिए और इसके खिलाफ राज्य की अपील पर सुप्रीम कोर्ट को विचार नहीं करना चाहिए। मामला छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे के बेटे चैतन्य बघेल का था। अखबार ने लिखा है कि 1980 के दशक में तबके सीजेआई पीएन भगवती ने भी कहा था कि जमानत देने के हाईकोर्ट के आदेश को अंतिम माना जाना चाहिए।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


