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दिल्ली

मोदी सरकार ने पिछले 12 साल से डर की जो सत्ता कायम की थी उसकी चिंदियां आज जंतर-मंतर के पास उड़ती नज़र आईं!

Crowd of people climbing over yellow barricades on a street; a soldier in camouflage with a rifle watches nearby; an Indian flag is visible in the crowd.

विश्व दीपक-

यह अप्रत्याशित था. ऐतिहासिक था. ऑर्गेनिक था. मुझे खुद उम्मीद नहीं थी. दिल्ली के केन्द्र में मोदी सरकार के खिलाफ इतना तीखा प्रदर्शन पिछले 12 साल में नहीं हुआ.

संसद के आसपास तीन किलोमीटर के दायरे में, कम से कम मेरा ख्याल है कि एक लाख छात्र/युवा आज मोदी सरकार के खिलाफ सड़क पर थे. इसमें हर वर्ग के लोग शामिल थे. निम्न मध्यवर्ग से लेकर एलीट तक.

सबसे बड़ी बात कि लड़कियां बड़ी संख्या में थीं. मैंने जंतर-मंतर पर कई आंदोलन देखे हैं लेकिन लड़कियों की इतनी भागीदारी पहली बार देख रहा था.

इन्हें न तो किसी राजनतिक दल ने बुलाया था, न पूड़ी सब्जी खिलाकर या ₹200-500 देकर लाया गया था. कोई बस भी नहीं भेजी गई थी फिर भी ये सब आये. अपना पैसा लगाकर जंतर-मंतर तक पहुंच रहे थे.

सरकार ने बैरीकेट्स लगवा रखे थे, पुलिस बीच-बीच में लाठियां भांज रही थी, आंसू गैस के गोले छोड़ रही थी लेकिन फिर भी ये लोग पीछे नहीं हटे. भयानक उमस और बरसात के बीच भी मुट्ठी भींचकर डटे रहे.

इन्हें देखकर, इनसे बात करके महसूस हुआ कि ये न तो सोनम वांगचुक के लिये आये हैं, न ही सीजेपी के लिये, न लेफ्ट के लिये, न आप के लिये. ये खुद की प्रेरणा से खुद के लिये आये हैं.

अन्याय के प्रतिकार के लिये, मोदी सरकार को यह बताने के लिये तुम जनता के प्रति जिम्मेदार हो – ये छात्र/युवा इकट्ठा हुये थे. आज इस देश के छात्रों को, युवाओं को यकीन है कि मोदी सरकार के हाथ में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं.

आमतौर से इन्हें बर्गर-पित्जा पीढ़ी कह कर खारिज किया जाता है. अराजनीतिक होना इनकी मुख्य पहचान मानी जाती है.

मैं भी यही मानता था लेकिन आज मेरी यह धारणा टूट गई. यह पीढ़ी हो सकता है कि पारंपरिक राजनतिक ढ़ांचे के हिसाब से अराजनीतिक हो लेकिन असंवेदनशील कतई नहीं. इन्हें मुद्दों की पहचान है. खतरा लेने का जोखिम – हमसे आपसे कहीं ज्यादा है. सबसे अच्छी बात यह लगी कि इनकी आंखों में डर का नाम-ओ-निशान नहीं था.

मोदी सरकार ने पिछले 12 साल से डर की जो सत्ता कायम की थी उसकी चिंदियां आज जंतर-मंतर के पास उड़ती नज़र आईं.


नवीन कुमार-

लोकतंत्र को नोचने वाले न्यूज चैनलों के भेड़ियों और भेड़ों की तमाम दुष्टताओं के बावजूद बच्चों और नौजवानों ने अपनी बात देश और दुनिया तक पहुंचा दी। ये बात छिपी नही रह सकी कि अपनी बात कहने आए सैकड़ों युवा जब घायल थे, दर्जनों खून से लथपथ थे, बच्चियों के कपड़े फाड़ डाले गए थे, उन्हें सड़कों पर घसीटा जा रहा था तो भारत का कायर और निर्लज्ज प्रधानमंत्री संसद से बच्चों को पीठ दिखाकर भाग रहा था। और उसे सवालों से बचाने के लिए बंदूकों की नालें भारत माता की जय और वंदे मातरम का नारा लगाते निहत्थे नौजवानों की तरफ तान दी गई थीं। भारत ने इससे पहले इतना कायर, इतना क्रूर और इतना कमजर्फ प्रधानमंत्री नहीं देखा।

इस बात को लिख लीजिए। जंतर-मंतर से आई क्रूरता और बर्बरता की तस्वीरें नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी का सालों साल पीछा करेंगी। और न्यूज चैनलों के दरिंदे उसे ढंक नहीं पाएंगे। तुम्हारी चुप्पियां पलायन नहीं है, तुम्हारे आलीशान न्यूज रूम्स और स्टूडियोज के दरिंदों के झुंड में बदल जाने का एलान है।

चैनलों के बेशर्म संपादकों, एंकरों, संवाददाताओं तुम जेबें क्यों नहीं काटते, बैंक क्यों नहीं लूटते, डकैती क्यों नहीं करते.. सैकड़ों बच्चों को कुचलते रौंदे लहूलुहान होते देखने के बावजूद तुम्हें नींद कैसे आती है। तुम्हारे अपने बच्चे तुम्हारे मुंह पर थूकेंगे एक रोज। कम से कम उनसे डरो। हम पहले समझते थे तुम भी रोटी ही खाते होगे, लेकिन तुम तो आदमखोर हो चुके हो, इंसान खाने लगे हो तुमलोग। थू।


संसदीय विपक्ष को इस असमंजस से निकल जाना चाहिये कि ये युवा किसी के कहने पर दिल्ली आ गये. कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के बड़े नेताओं को इन आंदोलनकारी युवाओं से फौरन संवाद स्थापित करना चाहिये, इनके साथ मिल कर आंदोलन को व्यापक बनाना चाहिये. सड़क पर जो छात्र हैं उनका कोई नेता नहीं है.

-प्रशांत टंडन


आप अगर ये समझ रहे हैं कि आज दिल्ली में जो हुआ, वो राजनीतिक तौर पर Sponsored था,

तो आप या तो भरम में हैं, या फिर ज़मीन से पूरी तरह कट चुके हैं।

इसमें दो राय नहीं कि इसमें विपक्षी पार्टियों के लोग भी थे, लेफ्ट स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन भी थे, कॉकरोचों का जमघट भी था,

मगर इन सबसे हटकर भारी तादाद में ऐसे युवा शामिल थे, जो किसी भी पार्टी या संगठन का काडर नहीं हैं।

जिनका न सरकार बनाने में कोई Interest है, न गिराने में।

ये सिर्फ परीक्षाओं में भारी अव्यवस्था, करप्शन और लालफीताशाही का हिसाब लेने आए थे।

ये बढ़ती उम्र, घटती नौकरियों और छूटते अवसरों की तकलीफों का सैलाब लेकर आए थे।

ये जिम्मेदारी और जवाबदेही को भूल चुकी सरकार की किताब लेकर आए थे।

ये अपनी आंख की छटपटाहट में आपकी टीयर गैसों का हिसाब लेकर आए थे।

सवाल तो सिर्फ इतना है कि आप जब विपक्ष में होंगे तो हर रोज़ इस्तीफा मांगेंगे?

और सत्ता में आते ही इस्तीफे की कमीज़ को ‘अभयदान’ की अरगनी में टांगेंगे?

-अभिषेक उपाध्याय


प्रधानमंत्री मोदी भारत के इतिहास के सबसे युवा-विरोधी प्रधानमंत्री हैं – इतने युवा विरोधी कि एक नाकाम शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी नहीं ले सकते।

152 पेपर लीक। 7.5 करोड़ छात्र पीड़ित। और सज़ा एक दोषी को भी नहीं। सजा किसे मिली? मेहनती युवाओं को।

और जब इन बच्चों ने शिक्षा के जायज़ सवाल उठाए – तो जवाब में मिली लाठी और हिरासत। लीक करने वाले अपराधी आज़ाद – और वाजिब मुद्दे उठाने वाले छात्र घसीटे जाते हैं, पीटे जाते हैं।

यह सरकार सिर्फ़ युवाओं को नाकाम नहीं कर रही – उनपर टूट पड़ी है।

-राहुल गांधी

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