दयाशंकर शुक्ला सागर-
बीजेपी के जिस वरिष्ठ नेता दुष्यंत गौतम का नाम एक मासूम लड़की के रेप और हत्या के केस में उछला उसे केन्द्र सरकार ने सिक्किम का गर्वनर बना दिया। यह सचमुच एक शर्मनाक फैसला है। अंकिता के माता-पिता ने दिल्ली के इंडिया गेट पर धरना देकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से अपील की कि जब तक सीबीआई की जांच पूरी नहीं हो जाती, कम से कम तब तक, दुष्यंत गौतम की नियुक्ति पर रोक लगाई जाए। इसमें क्या गलत है? दुष्यंत गौतम होंगे बेगुनाह, लेकिन क्या बीजेपी के पास पूरे देश में एक भी ऐसा बेदाग नेता नहीं जिसे सिक्किम का राज्यपाल बनाया जा सके?
गौतम की राजनीतिक उपलब्धि बस इतनी है कि वे हरियाणा के नेता हैं और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रहे हैं। और लंबे समय से भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा से जुड़े रहे हैं। उन्होंने 2008 और 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में कोंडली (अनुसूचित जाति) तथा करोल बाग (अनुसूचित जाति) विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा। वे भाजपा के सदस्य के रूप में हरियाणा से भारत की संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं। सिवाए दिल्ली विवि से स्नातक होने के उनकी पढ़ाई लिखाई का ज्यादा ब्योरा नहीं मिलता। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कोई और उल्लेखनीय काम किया हो ये गुगल महाराज भी नहीं बता सकते।
लेकिन जब आप अहंकार के हिमालय पर बैठें हों तो ये बातें कोई मायने नहीं रखती। यह वह मुद्दा है जिसके लिए नेहा बोरा जैसी कथित एक्टिविस्टों को सड़कों पर उतरना चाहिए। अंकिता के परिजनों और राहुल गांधी व प्रियंका गांधी का तर्क सही है कि राज्यपाल के पद पर बैठने के बाद अनुच्छेद 361 के तहत दुष्यंत गौतम को आपराधिक मुकदमों और कानूनी कार्रवाई से संवैधानिक इम्यूनिटी मिल जाएगी। दिल्ली में पत्रकारों से बात करते वक्त अंकिता की मां रो रही थी। अंकिता के भावुक पिता का सिर्फ ये कहना है कि उनकी बेटी की हत्या सिर्फ इसलिए की गई क्योंकि उसने रिसॉर्ट में आने वाले एक रसूखदार ‘वीआईपी’ को ‘विशेष सेवाएं’ देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा, “हम सिर्फ न्याय चाहते हैं। वह वीआईपी आज सलाखों के पीछे होना चाहिए, न कि राजभवन में।”
ये ‘रसूखदार ‘वीआईपी’ कौन है यह अब तक किसी जांच में सामने नहीं आया है। इस ‘रसूखदार ‘वीआईपी’का नाम सामने आ जाए तो दुष्यंत गौतम को अपने आप क्लीन चिट मिल जाएगी। फिर आप उनको इस देश का राष्ट्रपति बना दीजिए। किसने रोका है आपको।

देश के बहुत बड़े पत्रकार पीयूष पद्माकर कह रहे हैं कि टिकट कटने से नाराज होकर BJP के पूर्व विधायक सुरेश राठौर ने अंकिता भंडारी मर्डर केस में दुष्यंत गौतम का नाम लिया था।
थोड़ा जानकारी दुरुस्त करना जरूरी है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 14 फरवरी 2022 को हुआ। सुरेश राठौर BJP के ही प्रत्याशी थे, लेकिन हार गए।
जबकि अंकिता भंडारी का मर्डर इस चुनाव के बाद 18 सितंबर 2022 को हुआ था। इसलिए सुरेश राठौर के टिकट कटने का कोई मामला ही नहीं था।
अंकिता भंडारी मर्डर केस में आपकी नई–नई थ्यौरी पढ़कर आपके दोस्त नितिन नबीन रोज–रोज हैरान होते होंगे!
-सचिन गुप्ता, पत्रकार
पीयूष पद्माकर-
Dushyant Gautam : उत्तराखंड के अंकिता मर्डर केस में वो VIP कौन है ? दुष्यंत गौतम का नाम कैसे आया? दुष्यंत के बारे में किसने फैलाया?
- dushyantt gautam का नाम कैसे आया: क्या ये सच नहीं है उत्तराखंड के एक विधायक का टिकट दुष्यंत गौतम ने काटा। दुष्यंत गौतम उस वक्त उत्तराखंड बीजेपी के इंचार्ज थे। उस विधायक ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर एक ऑडियो रिकॉर्ड किया। सुनकर आप चौंक जाएंगे। पति विधायक और उनकी पत्नी एक ही जगह पर थे, कमरे में बैठे-बैठे उन दोनों ने बातचीत रिकॉर्ड की। और फिर वो ऑडियो फैलाया गया। क्या ये सच नहीं है उस विधायक ने अपने टिकट काटने का बदला दलित नेता दुष्यंत गौतम से लिया? पति विधायक और पत्नी ने सोच समझकर प्लान बनाया..और फिर दुष्यंत गौतम का नाम फोन पर लिया गया।
- पुलिस को क्या पता चला: क्या ये सच नहीं है उत्तराखंड पुलिस की जांच में भी VIP का नाम दुष्यंत गौतम नहीं था। उस वक्त दुष्यंत गौतम की लोकेशन भी उत्तराखंड में नहीं थी। पुलिस ने तीन लड़कों को पकड़ा। अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई। दुष्यंत गौतम ने उन लोगों पर मानहानि का मुकदमा ठोंका जिन्होंने उनका नाम सोशल मीडिया पर लिखा था। एक भी व्यक्ति सबूत नहीं दे पाया। बस सबूत के नाम पर एक ऑडियो क्लिप घूमाया गया, जो एक विधायक ने अपने कमरे में बैठकर अपनी पत्नी के साथ बनाया था। उसे ये पसंद नहीं आया कैसे एक दलित लीडर ने उसका टिकट काट दिया।
- सीबीआई के पास भी मामला गया। सीबीआई के पास भी वही ऑडियो क्लिप पहुंची। सीबीआई ने उस पूर्व विधायक और उसकी पत्नी को पूछताछ के लिए बुलाया। CBI जानना चाहती थी कैसे उन्हें पता चला कि वो VIP दुष्यंत हैं। उन्होंने कोई सबूत नहीं दिया। गवाही देने भी नहीं आए। सीबीआई के पास ना कोई सबूत है, ना कोई गवाह। ना कोई आधार। उत्तराखंड सरकार के पास डिमांड आई तो उन्होंने सीबीआई को कह दिया। सीबीआई को अभी तक कुछ नहीं मिला है। अब बताइए एक दलित लीडर को इसलिए जीवन भर सजा मिलती रहे क्योंकि उसने इंचार्ज रहते हुए अपनी पार्टी के एक विधायक का टिकट काटा और उस विधायक ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर उसका नाम एक मर्डर केस में ले लिया। सीबीआई आज भी इंतजार ही कर रही है, कोई सबूत , कोई गवाह..कोई नई जानकारी है तो सीबीआई के पास जाइए। सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप लिखने से क्या होगा।

