पुष्परंजन-
25 साल पहले, 27 अक्टूबर 1999 की ब्रेकिंग न्यूज़ थी. देश के 139 शीर्ष पदों पर बैठे महानुभाव अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी, ‘एफबीआई’ के लिए काम कर रहे थे. इस ख़बर से सत्ता के गलियारे, और अमेरिकी दूतावास में सन्नाटा छा गया था. अमेरिकी दूतावास ने तब इससे हाथ खड़े कर दिये, कि हमने ऐसा कुछ नहीं किया.
लेकिन, कुछ महीनों बाद जसवंत सिंह ने लोकसभा में स्वीकार किया, कि ऐसा कुछ हुआ था. जसवंत सिंह 5 दिसम्बर 1998 से 1 जुलाई 2002 के दौरान वाजपेयी सरकार में विदेश मंत्री थे।
तब मैं दैनिक हिंदुस्तान में था, और आलोक मेहता थे इस अख़बार के संपादक. उन पर भी इस ख़बर को लेकर काफी दबाव बना था. उन दिनों दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास ने मुझे वीज़ा देने से मना कर दिया था. आज जो बड़े चेहरे राष्ट्रभक्त बनते हैं, उस कालखंड में FBI के पे रोल पर थे.
139 भारतीय, अमरीकी ख़ुफ़िया एफ.बी.आई. के एजेंट
पुष्परंजन-
नई दिल्ली, 26 अक्टूबर. विगत 20 महीनों से कई मामलों में सीआईए से बीस पड़नेवाला अमरीकी ख़ुफ़िया संगठन फेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन ( एफ.बी.आई.) ने नई दिल्ली में कार्यालय खोलने के लिए सरकार पर ज़बरदस्त दबाव बनाया हुआ है. चुनाव और नई सरकार के गठन के नाम पर इसे टाला भी गया था, पर राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की यात्रा से पहले अमेरिकी अधिकारी इसपर हरी झंडी चाहते हैं. इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली सूचना यह है कि एफ.बी.आई. ने भारतीय मूल के 139 लोगों को अपना एजेंट नियुक्त किया है. इनमें 61 महिलाएं भी हैं.
पिछले महीने अमरीकी स्टेट डिपार्टमेंट में उग्रवाद के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के लिए बने विभाग के समन्वयक अधिकारी माइकेल ए. शीहेंस नई दिल्ली आये थे. उस वक़्त यह चर्चा पुरज़ोर थी, कि बिन लादेन ने भारत के ख़िलाफ़ फतवा जारी किया है. शीहेंस का तर्क था, कि चूँकि कश्मीर, काबुल से लेकर इस्लामाबाद तक आतंकवाद पर काबू पाना है, इसलिए भारत सरकार एफ.बी.आई. का क्षेत्रीय कार्यालय खोलने की अनुमति दे. इसका त्वरित लाभ यह होगा कि एफ.बी.आई. से भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों का तालमेल बनेगा और सूचनाओं का आदान-प्रदान हो सकेगा.
नई दिल्ली में एफ.बी.आई. का कार्यालय खोले जाने सम्बन्धी फ़ाइल के बारे में साऊथ ब्लॉक अधिक सतर्क रहा है. यह संयोग था कि शीहेंस की यात्रा के दौरान ही काबुल से खंडन आया कि ओसामा बिन लादेन ने भारत के ख़िलाफ़ कोई फतवा जारी नहीं किया है. ऐसे में साऊथ ब्लॉक ने शीहेंस को यह तर्क देकर स्वीकृति को टाल दिया कि चुनाव के वक़्त ऐसे निर्णय नहीं लिये जा सकते. सरकार गठन के बाद ही इसपर विचार संभव है. शीहेंस तब लौट तो गए, मगर दबाव बदस्तूर बना हुआ है कि नई सरकार इस प्रस्ताव को शीघ्र स्वीकार करे.
इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा झोल यह था कि आतंकवाद के खिलाफ कोई भी कार्रवाई भारतीय नहीं, अमरीकी क़ानून के तहत होगा. विश्व भर में जहाँ भी एफबीआई कि शाखा है, अमरीका ने सम्बंधित देश से ‘ इंटरनेशनल लीगल फ्रेमवर्क’ के तहत समझौता कर अपरोक्ष रूप से अपना क़ानून थोपा है. दक्षिण एशिया में सिर्फ़ पाकिस्तान ऐसा देश है, जहाँ एफबीआई का क्षेत्रीय कार्यालय है. अमेरिका ने इसी क़ानूनी नुक्ते के बूते जनरल मुशर्रफ के ख़िलाफ़ कार्रवाई का ऐलान किया है. अमेरिका के हालिया बयानों पर ग़ौर करें, तो यही कहा गया है कि अमरीकी क़ानून के तहत पाकिस्तान में शीघ्र लोकतान्त्रिक सरकार की पहल हम करेंगे.
बहरहाल, एफबीआई ने भारतीय मूल के जिन 139 लोगों को बतौर एजेंट बहाल किया है, उनमें ज़्यादातर वैज्ञानिक, कम्यूटर विशेषज्ञ, फोरेंसिक लेबोरेट्री और इंजीनियरिंग शोध संस्थानों में काम करनेवाले शीर्ष अधिकारी, क्रिमिनल-जस्टिस इन्फॉर्मेशन सर्विस के लोग और भाषाविद शामिल हैं. इनमें वो लोग ज़्यादा हैं, जिन्होंने अमेरिका में कुछ साल बिताने के बाद ग्रीन कार्ड हासिल किये थे. इन एजेंटों के लिये अमरीकी नागरिकता इसलिए अपरिहार्य है, ताकि इनकी निष्ठा और जवाबदेही अमरीका के प्रति बरक़रार रहे. इन सभी को वर्जीनिया के क्वांटिको अकैडमी में दो साल का गहन प्रशिक्षण दिया गया है. एफबीआई के स्पेशल एजेंटों को 16 सप्ताह की अतिरिक्त ट्रेनिंग दी गई है.
अमूमन हर तीन महीने पर वाशिंगटन स्थित एफबीआई मुख्यालय अपना ब्यौरा प्रस्तुत करता है. ३० सितम्बर 1999 को पेश ब्योरे के अनुसार एफबीआई ने अभी नौ डिवीज़न, चार फिल्ड ऑफिस, ३० फॉरेन लाइज़न ऑफिस, और इनमें 34 लीगल अताशे, और तीन लीगल उपशाखाएँ गठित की गई हैं. एफबीआई ने स्पेशल एजेंटों की नियुक्ति का जो ब्यौरा दिया है, उनमें भारतीय मूल के 48 पुरुष, 11 महिलाएं और सामान्य एजेंटों में 30 भारतीय पुरुष और 50 महिलाएं शामिल किये हैं. एशिया में पाकिस्तान के अलावा, बैंकॉक, कैरो, हांगकांग, रियाद, तेल अवीब, और टोक्यो के अमरीकी दूतावासों में एफबीआई की शाखाएं हैं.
1997 में विश्वभर में अमरीका के ख़िलाफ़, 123 आतंकवादी हमले और उससे पहले 1988 में कम्प्यूटरों द्वारा आपराधिक हमले रोकने में सीआईए की विफलता के बाद एफबीआई की भूमिका बढ़ा दी गई है. एफबीआई के ज़िम्मे आतंकवादी कार्रवाई का सुराग़ पाने के अलावा आर्थिक अपराध, नौकरशाहों द्वारा गड़बड़ी करने, सरकारों के ख़िलाफ़ फ्राड, बैंक लूट, अपहरण, कंप्यूटर अपराध, नशीले पदार्थों की तस्करी, मानवाधिकार हनन, विदेशी शक्तियों द्वारा जासूसी, जैसी तमाम गतिविधियों पर नज़र रखने का काम दिया गया है.
एफबीआई की नई दिल्ली शाखा खोलने की सरकारी स्वीकृति का सीधा मतलब यह होगा कि एफबीआई इन गतिविधियों से सम्बंधित सूचनाओं तक पहुँचने के लिये अधिकृत होगी. लेकिन इससे पहले ही भारतीय मूल के एजेंटों की नियुक्ति एफबीआई के रहस्मय संजाल की ओर संकेत देता है.



