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दिल्ली

आखिर जेन-जी के इस अप्रत्याशित आंधी जैसे आदोलन की खास बात क्या है?

अनिल कुमार यादव-

आखिर जेन-जी के इस अप्रत्याशित या बिना पूर्वानुमान की आंधी जैसे आदोलन की खास बात क्या है?

खास है निडरता, पाखंड-विरोध और मजबूत सेकुलर बुनियाद.

यह हारे हुए जुआरी की निडरता है जिसके सामने भविष्य का ठोस अंधेरा है. वे पिछले एक दशक में हर बड़ी परीक्षा में भीषण भ्रष्टाचार और सिर्फ पढ़ाई से मतलब रखने वाले मासूमों की फंदों पर लटकी लाशें देखकर अंततः जान गए कि मेहनत, प्रतिभा और सकारात्मक सोच सब व्यर्थ है, उन्हें एक कुटिल गंभीरता से पकौड़े तलने, रील बनाने और आपदा में अवसर खोजने के लिए कहा गया था, इसीलिए लाठी-आंसू गैस-पैलेट गन-सेक्सुअल वायलेंस-ट्रोलिंग के बावजूद जमावड़ा बढ़ता जा रहा है, उन्हें मरने से डर लगना बंद हो गया है, किशोर उम्र के बच्चे भी घरों से भागकर दिल्ली पहुंच रहे हैं.

A young boy on a dimly lit street holds a yellow handwritten sign, with adults nearby in a nighttime scene.

उनका गुस्सा सिर्फ मोदी के विश्वविख्यात छिछले पाखंड और अहंकार से नहीं बल्कि अपने मां-बाप और पिछली पीढ़ियों के दोरंगे पन से भी है जो पहले पड़ोसी के घर में भगत सिंह के पैदा होने की कामना करते थे फिर नाथूराम गोडसे के लोकल अवतारों के स्वागत के लिए ताली और थाली बजाने लगे. पहले के आंदोलनों की दो भाषाएं हुआ करती थीं, एक जिसमें भाषण दिए जाते थे, नारे लगते थे और बयान दिए जाते थे, दूसरी जिसमें कार्यकर्ता निजी दायरे में निचोड़ पेश किया करते थे- सरकार की फट गई या आंदोलन एल. के दक्खिन लग चुका है.

ये पहली बार राजनीति में पड़े लड़के, लड़कियां अंदर-बाहर से एक हैं इसलिए अभी निडर हैं और ठेठ हिंदुस्तानी-अमेरिकन (अब भारत में अमेरिका आत्मा तक घुस चुका है) अंदाज की गालियां दे रहे है. वे जानते हैं कि उनका सामना संस्कृत में सुभाषितानि बोलकर देश चलाने वालों से नहीं है. उनका सेकुलर होना काजल की कोठरी से होकर निकली खालिस हिंदुस्तानी चीज है क्योंकि इनमें से अधिकांश के प्रेमी-प्रेमिकाएं अपने धर्म-जाति से बाहर के हैं और वे देख चुके हैं कि धर्म की राजनीति बहुत खून बहाकर अंततः सेठों की चाकरी, चंदा-चढ़ावा चोरी जैसी तमाम लूटपाट और तानाशाही में पनाह लेती है. वे अपने प्यार से गद्दारी नहीं कर सकते. उनके जीवन में इसके सिवा और कुछ बचा भी नहीं है.

मंगलेश डबराल, अक्सर नशे में कहा करते थे, मैंने यह बात फलां के कान में साथ पेशाब करते हुए भी नहीं कही. जंतर-मंतर न होता तो शायद कभी समझ में नहीं आता कि वे उस अनौपचारिक भाषा की बात करते थे जो ये नौजवान बोल रहे हैं.

अब सिर्फ राजनीति नहीं बदलेगी, कुछ हमारा सामाजिक चरित्र भी बदलेगा जो कि अस्सी प्रतिशत पाखंड है.

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