संजय सिन्हा-
जेन जी ने हमें हमारी औकात बता दी!
नमस्कार, मैं संजय सिन्हा आज अपनी ही बिरादरी का पोस्टमार्टम करने बैठा हूं। जिस पेशे पर कभी मुझे नाज था, उसी पेशे को एक ऐसी पीढ़ी ने आईना दिखा दिया, जिसे हम दिन रात नासमझ, मोबाइल वाली, रील बनाने वाली और अनुभवहीन कह कर खारिज करते रहे।
मैं बात कर रहा हूं जेन जी की। मुझे इस बात की खुशी है कि इस पीढ़ी ने किसी पर आंख मूंद कर भरोसा करना छोड़ दिया है। वह अपना फैसला खुद करती है। उसका फैसला सही है या गलत, यह इतिहास तय करेगा। लेकिन उसने अपना दिमाग किराए पर नहीं दिया। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
जंतर मंतर पर जो हुआ, उसने मुझे भीतर तक हिला दिया। नहीं, इसलिए नहीं कि वहां प्रदर्शन हुआ। लोकतंत्र में प्रदर्शन होते रहेंगे। मुझे इसलिए झटका लगा कि इस पीढ़ी ने पहली बार मुख्यधारा मीडिया को साफ संदेश दे दिया कि हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है। तुम मत आओ। तुम हमारे आंदोलन का चेहरा मत बनो। हम अपनी कहानी खुद दुनिया तक पहुंचाएंगे।
आप लोगों की पीढ़ी ने पत्रकारों को बहुत गालियां दीं। किसी को गोदी कहा। किसी को प्रेस्टीट्यूट कहा। किसी को पत्तलकार कहा। किसी को लिब्रांडू कहा। किसी को वामी कहा। हम ढीठ की तरह सुनते रहे। क्यों नहीं सुनते? आप कुछ गलत तो नहीं कह रहे थे।
जेन जी हमसे-आपसे दो कदम आगे निकली। उसने कहा, अगर भरोसा नहीं है तो बहिष्कार करो। उसने किसी चैनल के सामने हाथ नहीं जोड़े। किसी संपादक को फोन नहीं किया। किसी रिपोर्टर को एक्सक्लूसिव नहीं दिया। उसने मोबाइल निकाला और कहा, अब पत्रकारिता हम करेंगे। और सच कहूं, जो मैंने देखा, उसने मुझे शर्मिंदा कर दिया।
हम करोड़ों रुपये के कैमरे लेकर घूमते रहे। ओबी वैन लेकर निकलते रहे। सैटेलाइट अपलिंक पर करोड़ों खर्च करते रहे। उधर कुछ लड़के लड़कियां पांच इंच की स्क्रीन वाले मोबाइल से ऐसी दृश्य पत्रकारिता कर रहे थे कि बड़े बड़े न्यूजरूम पानी भरते नजर आए।
एक वीडियो में भागते युवक को एक सिपाही पैर अड़ाकर गिराता हुआ दिखाई देता है। कैमरा वहीं मौजूद है।
दूसरे वीडियो में एक युवती के पीछे पुलिस वाला लाठी डालता हुआ दिखाई देता है। कैमरा फिर वहीं मौजूद है। वह चीखता नहीं। भाषण नहीं देता। लेकिन जो दिखाता है, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को भीतर तक हिला देने के लिए काफी है।
एक और वीडियो में पुलिसवाला डंडे से गाड़ी के शीशे तोड़ता हुआ दिखाई देता है। अगर यह कैमरा वहां न होता, तो शायद कल यही बताया जाता कि सारी तोड़फोड़ प्रदर्शनकारियों ने की थी।
एक छोटा सा मोबाइल कैमरा उस पूरे नैरेटिव को चुनौती दे देता है। यही पत्रकारिता है।
पत्रकारिता का मतलब एसी स्टूडियो में बैठकर दस लोगों पर चिल्लाना नहीं है। पत्रकारिता का मतलब है वह क्षण पकड़ लेना, जिसे सत्ता छिपाना चाहती है। वह दृश्य रिकॉर्ड कर लेना, जिसे इतिहास मिटा देना चाहता है।
मैंने उन बच्चों की कैमरा समझ देखी। फ्रेमिंग देखी।
एंगल देखा। टाइमिंग देखी। एडिटिंग देखी।
मुझे लगा जैसे किसी पुराने खोजी पत्रकार की पूरी टीम काम कर रही हो। किसी ने उन्हें पत्रकारिता नहीं सिखाई। उन्होंने पत्रकारिता को जी लिया।
दुख इस बात का है कि अगर देश में सचमुच स्वतंत्र मीडिया बचा होता तो अगले ही दिन उन बच्चों को बुलाया जाता और कहा जाता कि आओ, हमारे साथ काम करो। हमें ऐसे रिपोर्टर चाहिए। लेकिन सच यह है कि अब चैनलों को रिपोर्टर नहीं चाहिए। उन्हें स्क्रिप्ट पढ़ने वाले चेहरे चाहिए। आदेश मानने वाले एंकर चाहिए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुस्कुराने वाले संवाददाता चाहिए। ऐसे लोग चाहिए जो सवाल पूछने से पहले मालिक की तरफ देख लें।
यही कारण है कि जनता का भरोसा टूट गया।
आज खबर पहले मोबाइल पर आती है, चैनल पर बाद में।
आज सच पहले किसी नागरिक के कैमरे में कैद होता है, फिर टीवी उस पर बहस करता है। यह बदलाव यूं ही नहीं आया। इसे पत्रकारिता ने खुद कमाया है।
संजय सिन्हा यह नहीं कह रहे कि हर वायरल वीडियो अंतिम सत्य होता है। किसी भी वीडियो की जांच होनी चाहिए, उसका पूरा संदर्भ सामने आना चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब नागरिक कैमरा उठा लेता है तो पत्रकारिता का एकाधिकार खत्म हो जाता है। फिर खबर वही नहीं होती जो चैनल दिखाता है। खबर वह भी होती है जिसे जनता रिकॉर्ड करती है।
आज ‘जेन जी’ ने हमें हमारी औकात बता दी। हम समझते रहे कि पत्रकारिता हमारे आई कार्ड में रहती है। उन्होंने साबित कर दिया कि पत्रकारिता आई कार्ड में नहीं, ईमान में रहती है।
हम समझते रहे कि पत्रकारिता हमारे स्टूडियो में रहती है। उन्होंने साबित कर दिया कि पत्रकारिता सड़क पर भी जन्म ले सकती है।
हम समझते रहे कि पत्रकारिता चैनल के ‘लोगो’ से चलती है। उन्होंने बता दिया कि सच के सामने किसी ‘लोगो’ की औकात नहीं होती।
यह लेख किसी पीढ़ी की तारीफ भर नहीं है। यह हमारी पीढ़ी का आरोप पत्र है।
- हमने पत्रकारिता को धीरे धीरे कारोबार बनने दिया।
- हमने मालिकों के हितों को जनता के हितों पर भारी पड़ते देखा और चुप रहे।
- हमने सवाल पूछने की जगह सुविधा चुन ली। हमने जोखिम की जगह आराम चुन लिया।
और आज जब जनता हम पर भरोसा नहीं करती, तो हमें बुरा लग जाता है।
बुरा मत मानिए। आईना हमेशा सुंदर नहीं होता।
जेन जी, तुम्हें सलाम। कम से कम तुमने हमें यह तो याद दिला दिया कि पत्रकारिता कैमरे से नहीं, रीढ़ की हड्डी से होती है। जिस दिन रीढ़ बिक जाती है, उस दिन कैमरा सिर्फ मशीन रह जाता है और पत्रकार, पत्रकार नहीं, सत्ता का उद्घोषक बन जाता है।


