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नीलम गुप्ता द्वारा अनूदित इला भट्ट की पुस्तक “महिलाएं, काम और शांति” का लोकार्पण!

जीवन अनुभवों से निकली और उम्मीद की एक किरण दिखाती एक किताब – राम बहादुर राय

नीलम गुप्ता ने पुस्तक इला भट्ट को की समर्पित!

नई दिल्लीः इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कलाकेंद्र (आई जी एन सी ए) के कलानिधि विभाग ने “महिलाएं, काम और शांति” किताब का लोकार्पण किया और उस पर चर्चा भी की। यह पुस्तक समाज सेवी और सेवा की संस्थापक इला भट्ट के कुछ खास भाषणों का संग्रह है जिसका हिंदी में अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका नीलम गुप्ता ने किया है। किताब अहमदाबाद के नवजीवन प्रकाशन से छपी है। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कलाकेंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय ने की। चर्चा में बोलने वालों में पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट रजनी बख्शी, गुजरात विद्यापीठ के पूर्व वाइस-चांसलर सुदर्शन आयंगर, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कलाकेंद्र के कलानिधि विभाग के प्रमुख व डीन प्रो. रमेश चंद्र गौड़, सेवाभारत की समन्वयक व सामाजिक कार्यकर्ता रेनाना झाबवाला और किताब की अनुवादक वरिष्ठ पत्रकार नीलम गुप्ता शामिल थीं।

कर्यक्रम की अध्यक्षता श्री राम बहादुर राय ने की। अपने अघ्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा कि यह किताब सिर्फ भाषणों का संग्रह नहीं है, बल्कि इला भट्ट के समाज के साथ दशकों तक जुड़े रहने से मिले अनुभवों का निचोड़ है। ये अनुभव उतने ही गहन और व्यापक हैं जितना कि हमारा आकाश। और किताब का संदेश सिर्फ भारत या उसके घरेलू मुद्दों तक ही सीमित नहीं है, यह दक्षिणा एशिया की बड़ी समस्याओं, खासकर इस इलाके की महिलाओं की हालत तक को संबोधित करता है। इस बारे में बोलते हुए उन्होंने आगे कहा कि माइक्रोफाइनेंस समाज के लिए इला जी के सबसे अहम योगदानों में से एक है। रोजगार और स्वरोजगार की चुनौतियों से निपटने में माइक्रोफाइनेंस आज भी अत्यंत प्रासंगिक बना हुआ है। उस पर आगे भी काम होना चाहिए।

उन्होंने शरीर और मन दोनों पर नियंत्रण पाने की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि इला जी को सही मायने में याद रखने के लिए, फैसले दिमाग के बजाय दिल से लेने चाहिए। वे दिल से काम करती थीं। आज जो अंधेरा है, जो गरीबी हताशा और निराशा है, और इसमें किसी को रोशनी की तलाश है तो उसे यह किताब पड़नी चाहिए।

इस मौके पर बोलते हुए रेनाना झाबवाला जो इला भट्ट और सेल्फ-एम्प्लॉयड विमेंस एसोसिएशन (सेवा) की नेशनल कोऑर्डिनेटर के रूप में महिलाओं को मजबूत बनाने और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने में बिना थके काम करते रहने के लिए जानी जाती हैं ने 1977 में इला भट्ट के साथ अपनी पहली मुलाकात को याद किया और बताया कि कैसे वह पल उनकी जिंदगी की दिशा तय करने में अहम साबित हुआ। इला भट्ट के विजन और कमिटमेंट से प्रेरित होकर उनके साथ काम करने के लिए अमेरिका में अपनी पी.एच.डी. अधूरी छोड़कर भारत लौटने का उन्होंने फैसला किया। सेल्फ-एम्प्लॉयड विमेंस एसोसिएशन (सेवा) की बुनियादी सोच पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि विचार काम और मूल्य इसके मुख्य सिद्धांत थे। जिसमें काम को हमेशा सबसे आगे रखा गया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इला बेन (बेन गुजराती संबोधन) का पक्का मानना था कि गरीबी खुद एक तरह की हिंसा है। कामगार महिलाओं को काम गरीबी से बाहर ला गरिमा दिलाता है। उन्होंने मुख्य धारा के आर्थिक ढांचों के साथ जुड़ने की अहमियत पर जोर दिया। समझाया कि कैसे भारत में एक बहन का बनाया कपड़ा ग्लोबल सप्लाई चेन से होते हुए न्यूयॉर्क के मार्केट तक पहुँचता है। और उसे अपने काम की बेहतर कीमत और गरिमा दोनों ही मिलते हैं। इसीलिए] इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन जैसे इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर जुड़ना जरूरी हो जाता है। उन्होंने बताया कि असंगठित क्षेत्र की महिला कामगारों के लिए रास्ते बनाने के लिए कैसे इला भट्ट ने विमेन इन इनफॉर्मल एम्प्लॉयमेंट ग्लोबलाइजिंग एंड ऑर्गेनाइजिंग, स्ट्रीटनेट इंटरनेशनल और होमनेट इंटरनेशनल जैसे इंटरनेशनल नेटवर्क बनाए।

इला भट्ट की कार्यशैली में समाहित ‘पारिस्थितिक चेतना’ को उन्होंने झाड़ू के जीवन चक्र के माध्यम से दर्शाया। एक ऐसी प्रक्रिया जो प्राकृतिक है, निरंतर है और स्वयं को पुनर्जीवित करने वाली है। झाड़ू कैसे जमीन से निकली घास से बनता है और जब उसका काम खत्म हो जाता है तो उसे जानवरों को खिला दिया जाता है। बारिश आने पर फिर वह नई घास बनकर हमारे सामने आ जाता है। यानि कि प्रकृति से निकला उसी में समाया और फिर उसी में से नया रूप ले बाहर आ गया। वह प्राकृतिक है.. निरंतर है और पुनर्जीवित होने वाला इला भट्ट के रोजमर्रा के काम में शामिल पारिस्थितिकीय (इकोलॉजिकल) सोच का एक उदाहरण है।

उन्होंने गुजरात दंगों समेत मुश्किल समय के बारे में सोचा और बताया कि कैसे महिलाओं ने धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर मिलजुल कर आपस में बातचीत और काम करने के रास्ते बनाए। उन्होंने बताया कि 2022 में जब सेवा ने 1972 में अपनी स्थापना के 50 साल पूरे किए तो इला भट्ट ने अपने भाषण में कहा था कि अपने सिद्धांतो पर चलते हुए सेवा को आगे के पचास साल भी पूरे करने हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि एकता और सामुदायिकता के सिद्धांतों ने इस आंदोलन को बनाए रखा है। महिलाएं काम और शांति पुस्तक का हिंदी में आना इस मायने में बेहद महत्वपूर्ण है कि सेवा की कामगार बहनों को उनके काम और फैसलों में यह भविष्य में गाइड का काम करेगी। क्योंकि यह इला भट्ट के मुख्य विजन और सिद्धांतों का लिखित सोर्स है।

गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलनायक और एक एक्टिव सोशल वर्कर सुदर्शन आयंगर ने रहीम के एक दोहे से शुरुआत की- जहाँ काम आवे सुई कहाँ करे तलवार। उन्होंने समझाया कि सुई चुभ सकती है लेकिन वह ठीक करने के लिए ही ऐसा करती है। नरमी कमजोरी नहीं है। यह एक हुनर और ताकत है। उन्होंने कहा कि औरतें अक्सर अपने समय से आगे रही हैं।

उन्होंने कहा कि किताब का शीर्षक खास तौर पर सटीक है क्योंकि यह महिलाओं के नेतृत्व में उनकी सामुदायिक शक्ति और साझा श्रम से निकली महिलोन्मुखी आर्थिक प्रणाली की शुरुआत को दिखाता है। सेवा के काम पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि यूनियन की जमीनी कोशिशों से शांति के लिए एक शांत लेकिन गहरी क्रांति शुरू हुई है। इला भट्ट की सोच को एक बड़े सोशियो-इकोनॉमिक संदर्भ में रखते हुए, उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने लगातार सिक्योरिटी की पुरानी सोच को चुनौती दी, और कहा कि सिर्फ आहार ही सच्ची सिक्योरिटी नहीं है। काम की गरिमा सामुदायिक सशक्कितकरण और सामाजिक न्याय भी एक टिकाऊ और इंसानी समाज के लिए जरूरी हैं।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इला भट्ट ने वाणी और कर्म का अद्भुत मेल किया। उन्होंने इला भट्ट के शब्दों और कार्यों को व्यापक स्तर तक पहुँचाने के लिए नीलम गुप्ता को बधाई दी। उन्होंने अपनी बात यह कहते हुए समाप्त की कि इला भट्ट की यात्रा कर्म की दुनिया से ज्ञान की दुनिया की ओर एक आंदोलन का प्रतिनिधित्व करती है, और उनकी आवाज को और अधिक बुलंद किया जाना चाहिए।

इस अवसर पर बोलते हुए पत्रकार लेखिका और जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित रजनी बख्शी ने कहा कि महात्मा गांधी के अहिंसा के दर्शन को केवल एक नैतिक या राजनीतिक रणनीति के रूप में नहीं बल्कि सभ्यता के एक आधारभूत सिद्धांत के रूप में समझा जाना चाहिए। एंथ्रोपोलॉजी से समानता दर्शाते हुए उन्होंने मार्गरेट मीड के विचारों का जिक्र किया जिन्होंने 1500 साल पुराने एक मानव जीवाश्म जिसकी टूटी हुई बांह की हड्डी ठीक हो चुकी थी को सभ्यता के प्रतीक के रूप में पहचाना था। उनके अनुसार यह इस बात का सबूत था कि किसी ने संकट के समय रुककर दूसरे व्यक्ति की देखभाल की थी। इस आधार पर उन्होंने तर्क दिया कि हिंसा का कोई सभ्यतागत आधार नहीं है और मानव इतिहास में करुणा और देखभाल आक्रामकता से पहले आती हैं।

उन्होंने आगे इस बात पर जोर दिया कि इस पुस्तक का मूल संदेश यह पहचानने में निहित है कि गांधीजी केवल प्रेरणा के स्रोत नहीं हैं बल्कि शक्ति के स्रोत हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि उनके विचार समकालीन चुनौतियों का सामना करने के लिए आंतरिक लचीलापन और नैतिक स्पष्टता प्रदान करते हैं और यह पुष्टि करते हैं कि अहिंसा उतनी ही पुरानी है जितनी स्वयं सभ्यता और मानवता के सामूहिक भविष्य के लिए केंद्रीय बनी हुई है।

किताब की अनुवादक पत्रकार और लेखिका नीलम गुप्ता ने बताया कि पुस्तक इला भट्ट के लिखे हुए निबंधों का नहीं उनके भाषणों का संग्रह है। पुस्तक में उनके सेवा के पचास साल में देश दुनिया में दिए गए ऐसे 27 भाषण हैं जो इन पचास सालों में सेवा की बहनों के साथ काम करते हुए उनके अनुभवों के आधार पर बने विचारों और अवधारणाओं को हमारे सामने लाते हैं। मार्गी शास्त्री जिन्होंने अंग्रेजी में उनके भाषणों का संकलन किया अपनी भूमिका में डन्होंने लिखा है कि – भाषणों को पढ़ते हुए समझ आया कि उनके कई विचार और अवधारणाएं दीर्घकाल तक प्रभावी रहने वाली हैं। अभी से वैश्विक स्तर पर उनकी प्रासंगिकता बढ़ रही है। उनके कई विचार उनके समय से आगे के थे। अब उन्हें महत्व मिलेगा। उन्हें लागू किया जाएगा। इसलिए निश्चित रूप से वह समय आ गया है जब उनकी अवधारणाओं को और अधिक लोगों तक ले जाया जाए ताकि वे इन पर शोध कर सकें। उनका विस्तार कर सकें। इला भट्ट खुद भी बताती थी कि कैसे आईएलओ में उन्हें कहा जाता था कि आप समय से बहुत आगे हैं।

नीलम गुप्ता ने बताया कि इला भट्ट इस पुस्तक को हिंदी में देखना चाहती थीं क्योंकि वे हिदी के माध्यम से इस पुस्तक में आए अपने विचारों, अनुभवों और अवधारणाओं को सेवा की 25 लाख से भी अधिक उन बहनों तक पहुंचाना चाहती थीं जो सेवा सिद्धांतो व मूल्यों पर चलते हुए सामाजिक व आर्थिक रूप से न केवल खुद आत्मनिर्भर हुई है, समाज व प्रशासन को भी नई दिशा दे रही हैं। वे जानती थीं कि अगर विकास को अहिंसक, समन्वित, समावेशी व टिकऊ बनाना है तो जरूरत पड़ने पर जमीन पर समुदायों के बीच काम कर रही उनकी असंगठित क्षेत्र की इन बहनों के लिए यह पुस्तक मार्गदर्शक होगी। वे अक्सर कहती थीं कि उनके विचार व अवधारणाएं बहनों के साथ काम करते हुए और उन्हीं के बीच से निकलकर आए हुए हैं। पर वे लगातार यह भी अनुभव कर रही थीं कि दुनिया तेजी से बदल रही है।

पूंजीगत अर्थव्यवस्थाओं और असंगठित क्षेत्र के बीच टकराव लगातार तीखा होता जा रहा है। आईएलओ और वल्र्ड बैंक जैसी संस्थाएं, जो कभी उनके विचारों को अपने दस्तावेजों में समाहित करने के लिए प्रयासरत रहती थीं, अब उन पर पूंजीवादी ताकतें ज्यादा प्रभावी हो रही हैं। विश्व बैंक की विश्व विकास रिपोर्ट 2013 के शीर्षक में जाब की जगह वर्क शब्द रखने के लिए जीतोड़ कोशिश करने के बाद भी उनकी आवाज को अनसुना कर दिया गया। वे जान रही थीं कि पूंजीवाद अभी अपने और क्रूर रूप में सामने आएगा और संगठित व असंगठित क्षेत्र के बीच संघर्ष और तीखे होंगे और तब यह पुस्तक सेवा बहनों को अपने व दूसरों के लिए रास्ता दिखाएगी। आज जिस तरह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं उलट-पुलट हो रही हैं और कुछ बड़े देश छोटे देशों को पूरा निगल ही रहे हैं, युद्धों की विभिषिका से सारी मानवता लहूलुहान है, कह सकते हैं कि उनकी परेशानियां ऐसे ही नहीं थीं।

नीलम गुप्ता ने बताया कि अप्रेल 2022 में सेवा के पचास साला समारोह के समय हुई मुलाकात में इला भट्ट ने खुद ही उन्हें अपनी किताब वीमेन वर्क एंड पीस का हिंदी में रूपांतरण करने के लिए प्रतिबद्ध कर दिया था। नवंबर 2022 में वे पंचतत्व में लीन हो प्रकृति के साथ एकाकार हो गई। उनके बेटे मिहिर भट्ट ने अनुवाद के काम को पूरा करवाने की जिम्मेदारी ली। लोकार्पण समारोह में नीलम गुप्ता ने किताब की पहली प्रति इला भट्ट को समर्पित की और एक थाती के रूप में उसे रेनाना झाबवाला को सौंप दिया। इस मौके पर उन्होंने इस पुस्तक को इला भट्ट के काम और विजन को समझने की कुंजी बताया। उन्होंने इमोशनल होकर कहा- इला बेन आखिर आपने यह काम मुझसे करवाया ही लिया।

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के कलानिधि विभाग के प्रमुख प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि यह किताब महिलाओं के काम, सोशल जस्टिस और शांति पर एक जरूरी और सोचने पर मजबूर करने वाली बहस को निमंत्रण देती है। आज का समाज महिलाओं की एक्टिव भूमिका को तेजी से पहचान रहा है और मान रहा है लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहा है। एक समय था जब सामाजिक ढांचे में महिलाओं को ऐसा दर्जा नहीं दिया जाता था। यह पुस्तक इस ऐतिहासिक असंतुलन पर चिंतन को आमंत्रित करती है और अधिक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाजों के निर्माण में महिलाओं की विकसित भूमिका को सामने लाती है।

कार्यक्रम में विद्वानों, शोधार्थियों, पत्रकारों तथा साहित्य और समाज के विविध क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य जनों की गरिमामयी उपस्थिति रही। यह आयोजन न केवल एक पुस्तक लोकार्पण का अवसर रहा बल्कि महिलाओं की भूमिका, श्रम की गरिमा और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर सार्थक संवाद का मंच भी सिद्ध हुआ।

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