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सियासत

भारतीय कंपनियों का 60% पैसा ‘टैक्स हेवन’ में, देश को ठेंगा!

इस रिपोर्ट से आप सहज ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि भारत के ज़्यादातर अमीर कॉर्पोरेट्स अपना पैसा और मुनाफ़ा देश से कहाँ ले जा रहे हैं। जी हाँ आप बिल्कुल सही समझें हैं कि ये पैसा किसी उत्पादक उद्यम यानी प्रोडक्टिव वेंचर में विदेश में निवेश करने के लिए नहीं, बल्कि टैक्स हैवेन्स में जा रहा है।

भारतीय कंपनियों का दिल हिंदुस्तान में नहीं, सिंगापुर-मॉरीशस-यूएई जैसे टैक्स हेवन देशों में बसता है। आरबीआई के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में बाहर गया भारत का 3,488 करोड़ रुपये का एफडीआई, उसमें से करीब 1,946 करोड़ रुपये यानी लगभग 56% सीधे इन कम टैक्स वाले देशों में पार्क हो गया।

सबसे बड़े लुटेरे—ओह, माफ कीजिए निवेश आकर्षित करने वाले देश—हैं सिंगापुर (22.6%), मॉरीशस (10.9%) और यूएई (9.1%)। ये तीन मिलकर ही भारत के कुल एफडीआई का 40% से ज़्यादा खींच ले गए। बाकी का हिस्सा नीदरलैंड्स, यूके और स्विट्ज़रलैंड में समा गया।

असल खेल क्या है?

कंपनियां ऐसा सिर्फ टैक्स बचाने के लिए नहीं करतीं, बल्कि इसलिए भी ताकि बड़े-बड़े विदेशी निवेशकों को पटाना आसान हो। सिंगापुर में कंपनी खड़ी की और फिर वहीं से तीसरे देश में पैसा लगाया—न तो भारतीय टैक्स का झंझट, न रेगुलेशन का टेंशन। मतलब, इंडियन पैरेंट कंपनी तो यहां टैक्स और कानून झेले, लेकिन पैसा और फायदा बाहर का हो गया।

पहली तिमाही का खेल

2025 की पहली तिमाही में तो खेल और भी बढ़ गया। कुल एफडीआई का 63% हिस्सा टैक्स हेवन में चला गया। यानी ट्रेंड साफ है—कंपनियां अब खुलकर ‘टैक्स फ्रेंडली’ रास्ते अपना रही हैं।

चेतावनी की घंटी

विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर भारत में ऊंचे आयात शुल्क और टैक्स का बोझ जारी रहा तो कल को यही कंपनियां अपने बिज़नेस ऑपरेशन भी बाहर शिफ्ट करने लगेंगी। यानी कमाई बाहर, बोझ और महंगाई अंदर।

साफ है, हिंदुस्तानी कंपनियां ‘मेक इन इंडिया’ के नारे से ज़्यादा ‘सेव इन टैक्स हेवन’ में विश्वास कर रही हैं।

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