नई दिल्ली। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों का गुस्सा सिर्फ सरकार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मीडिया और पत्रकार भी निशाने पर आ गए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने चुनिंदा मीडिया संस्थानों के खिलाफ नारेबाजी की और पत्रकारों के प्रति नाराजगी जाहिर की। इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर पत्रकारों के बीच मीडिया की भूमिका, पत्रकारों की जवाबदेही और उनकी सुरक्षा को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है।
मीडिया के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में नाराजगी का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले नेपाल में जेन-ज़ी आंदोलन के दौरान प्रमुख नेपाली अखबार कांतिपुर के दफ्तर में आग लगा दी गई थी। बांग्लादेश में भी राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान अंग्रेजी अखबार द डेली स्टार के कार्यालय को प्रदर्शनकारियों ने निशाना बनाया था।
भारत में भी पिछले कुछ वर्षों से मीडिया की निष्पक्षता और भूमिका को लेकर लगातार बहस होती रही है। आम धारणा बनी है कि कुछ मीडिया संस्थान सरकार समर्थक हैं, जबकि कुछ को सरकार विरोधी माना जाता है। इसी पृष्ठभूमि में संसद मार्च के दौरान मीडिया के प्रति प्रदर्शनकारियों का आक्रोश भी चर्चा का विषय बन गया।
पूनम पांडे: रिपोर्टर को निशाना बनाना गलत
पत्रकार पूनम पांडे ने प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों के खिलाफ नारेबाजी का वीडियो साझा करते हुए लिखा कि मीडिया से असहमति हो सकती है, लेकिन मैदान में रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टरों को निशाना बनाना उचित नहीं है। उनके मुताबिक, रिपोर्टर कठिन परिस्थितियों में भी लोगों तक खबर पहुंचाने का काम करते हैं और नाराजगी सही जगह पर व्यक्त की जानी चाहिए।
विजेता सिंह ने किया रिपोर्टरों का बचाव
द हिंदू की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह ने कहा कि टीवी पर बैठकर बहस करने वाले एंकरों और वरिष्ठ पत्रकारों को ग्राउंड रिपोर्टरों से अलग करके देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार अधिकांश टीवी रिपोर्टर बेहद मेहनती होते हैं और उन्हें भीड़ के गुस्से का शिकार नहीं बनना चाहिए।
शेखर गुप्ता बोले—भीड़ तय नहीं करेगी कौन अच्छा पत्रकार

विजेता सिंह की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए द प्रिंट के संस्थापक शेखर गुप्ता ने कहा कि यह फैसला भीड़ पर नहीं छोड़ा जा सकता कि किस पत्रकार को पसंद किया जाए और किसे निशाना बनाया जाए। उनके अनुसार वरिष्ठ हो या जूनियर, हर पत्रकार को रिपोर्टिंग के दौरान पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक भीड़ के लिए जो पत्रकार अच्छा है, दूसरी भीड़ के लिए वही गलत हो सकता है। शेखर गुप्ता ने यह भी कहा कि पत्रकारों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति अन्ना आंदोलन के दौरान शुरू हुई थी और तब भी यह गलत थी, आज भी गलत है।
प्रतीक सिन्हा ने जताई असहमति
ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने इस तर्क से असहमति जताई। उनका कहना था कि केवल मेहनती होना किसी को आलोचना से मुक्त नहीं कर देता। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई व्यक्ति किसी प्रचार तंत्र का हिस्सा बनकर काम करता है, तो क्या उसकी कोई जवाबदेही नहीं होगी। उन्होंने पुलिसकर्मियों का उदाहरण देते हुए कहा कि मेहनत करने के बावजूद कार्रवाई के लिए जवाबदेही तय होती है।
अभिसार शर्मा ने उठाए दोहरे मानदंड के सवाल
वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा ने भी शेखर गुप्ता की टिप्पणी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि किसी भी पत्रकार के खिलाफ हिंसा स्वीकार्य नहीं है, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ कथित सरकारी कार्रवाई पर भी समान मुखरता से आवाज उठनी चाहिए। उन्होंने पूछा कि पत्रकारों को वास्तव में निशाना बनाए जाने की घटनाओं पर उतना आक्रोश क्यों नहीं दिखाई देता।
अभिनंदन सिकरी ने मुख्यधारा मीडिया पर साधा निशाना
न्यूज़लॉन्ड्री के सह-संस्थापक अभिनंदन सिकरी ने शेखर गुप्ता के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा की जरूरत है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर कुछ तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया संस्थान प्रदर्शन को बदनाम करने के उद्देश्य से पहुंचे थे।
मौसमी सिंह ने सुरक्षा का मुद्दा उठाया
वहीं आज तक की राजनीतिक संपादक मौसमी सिंह ने शेखर गुप्ता का समर्थन करते हुए कहा कि उन्हें भी सबरीमला और किसान आंदोलनों की कवरेज के दौरान धमकियों, गाली-गलौज और मारपीट का सामना करना पड़ा था। उन्होंने एक महिला रिपोर्टर के साथ कथित छेड़छाड़ की घटना का भी जिक्र करते हुए कहा कि पत्रकारों के खिलाफ किसी भी तरह की हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
तवलीन सिंह और एबी रवि की टिप्पणी

वरिष्ठ कॉलमिस्ट तवलीन सिंह ने सोशल मीडिया पर भारतीय टीवी मीडिया की आलोचना करते हुए लिखा कि कई चैनलों का स्वरूप स्वतंत्र मीडिया के बजाय सरकारी प्रसारक जैसा दिखाई देता है।
वहीं द शॉर्ट पोस्ट के संस्थापक संपादक एबी रवि ने अपने हालिया लेख में कहा कि शोर-शराबे वाली टीवी पत्रकारिता, सोशल मीडिया की विषाक्त बहस और पत्रकारों की सत्ता तक सीमित पहुंच ने मीडिया के स्वरूप को बदल दिया है। उनके अनुसार पत्रकारिता अब कई लोगों के लिए आजीवन पेशा कम और राजनीति या जनसंपर्क में जाने का माध्यम अधिक बनती जा रही है।
संसद मार्च के दौरान मीडिया के प्रति प्रदर्शनकारियों के रुख और उसके बाद पत्रकारों के बीच छिड़ी यह बहस एक बार फिर इस सवाल को केंद्र में ले आई है कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका, उसकी विश्वसनीयता और पत्रकारों की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए।



