लखनऊ: नवभारत टाइम्स (NBT) लखनऊ के स्थानीय संपादक सुधीर मिश्रा ने संस्थान से इस्तीफा दे दिया है। जानकारी के मुताबिक, उनका नोटिस पीरियड 30 अक्टूबर तक है। बताया जा रहा है कि इसके बाद वह दक्षिण भारत से शुरू होने वाले एक नए हिंदी न्यूज चैनल के साथ नई पारी की शुरुआत कर सकते हैं।
सुधीर मिश्रा तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वह दैनिक जागरण, दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक भास्कर और नवभारत टाइम्स जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। उपलब्ध प्रोफाइल के मुताबिक, वह NBT में लखनऊ और एनसीआर की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।
सुधीर मिश्रा पत्रकारिता के साथ लेखन और पॉडकास्टिंग से भी जुड़े रहे हैं। उनकी किताबों में ‘दिल्ली दिल से’, ‘मुसाफिर हूं यारो’ और व्यंग्य संग्रह ‘हाइब्रिड नेता’ शामिल हैं।
मीडिया जगत में चर्चा है कि वह दक्षिण भारत के 6TV समूह से जुड़े नए हिंदी न्यूज चैनल का हिस्सा बन सकते हैं। 6TV का मुख्यालय हैदराबाद में है और समूह मौजूदा समय में तेलुगु न्यूज से जुड़ा प्रसारण और डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालित करता है। 6TV की आधिकारिक वेबसाइट पर राष्ट्रीय खबरों के साथ तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से जुड़ी खबरें भी प्रकाशित होती हैं।
हालांकि, सुधीर मिश्रा की नई नियुक्ति और प्रस्तावित हिंदी चैनल की लॉन्चिंग को लेकर अभी संस्थान की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। ऐसे में उनके नए ठिकाने को लेकर अंतिम पुष्टि आधिकारिक घोषणा के बाद ही होगी।
सुधीर मिश्रा का मीडिया करियर लंबा रहा है। 2020 के एक प्रोफाइल में उन्हें नवभारत टाइम्स में लखनऊ और एनसीआर की जिम्मेदारी संभालने वाले वरिष्ठ संपादक के तौर पर बताया गया था और उनके 25 साल से अधिक के पत्रकारिता अनुभव का उल्लेख किया गया था।
सुधीर मिश्र जी की पोस्ट-
नई राह पर मुसाफिर
एक बार फिर नई राह पर निकलने वाला हूं। नवभारत टाइम्स लखनऊ से अब मैंने इस्तीफा दे दिया है। फिलहाल नवंबर के पहले हफ्ते तक नोटिस पीरियड पर काम करता रहूंगा। फैसला कठिन था पर आगे की मंजिल साफ दिख रही हो तो फिर कुछ मुश्किल नहीं होता। करीब चौदह साल तक बेहतरीन टीम के साथ काम करने का मौका मिला। बीते 14 वर्षों ने साथी दिए, नए दोस्त दिए, अनुभव दिया, असहमत होने और असहमतियों को स्वीकार करने का साहस दिया। और सबसे बढ़कर अपने फैसलों भरोसा करना सिखाया। इतने सालों में अखबार ने और हमारी टीम ने कई उतार चढ़ाव देखे। नई तकनीक आई, कोविड आया, डिजिटल का दबाव बढ़ा, पाठकों की आदतें बदलीं और काम की चुनौतियां बढ़ीं। मुश्किल वक्त आए लेकिन टीम ने एकजुट होकर सबका सामना किया। एक अप्रैल 2013 को मैंने लखनऊ कानपुर संस्करण के दोबारा शुरू होने पर मैंने स्थानीय संपादक के तौर पर ज्वाइन किया था। जून 2017 तक लखनऊ संस्करण, फिर 2017 से 2022 तक लखनऊ और एनसीआर संस्करण, 2022 से मार्च 2024 तक दिल्ली संस्करण और फिर 2024 से अब तक दोबारा लखनऊ संस्करण के संपादक के तौर पर काम किया। वैसे तीनों ही संस्करणों में काफी अच्छे साथियों से काम करने का मौका मिला लेकिन लखनऊ टीम के साथ जुड़ाव कुछ ज्यादा रहा। इसकी वजह यह रही कि इस टीम को मेरी देखरेख में बनाया गया। शुरुआती दिनों में कोर टीम को मैंने चुना। बाकी साथियों को लिखित परीक्षा और इंटरव़्यू के जरिए चुना गया। इसमें दैनिक भास्कर, पत्रिका, हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, जी टीवी और अमर उजाला से कई साथी आए। दूसरे राज्यों और दिल्ली से भी। सबको एक टीम का आकार देना और उनमें एकजुटता रखना आसान काम नहीं था। पर इसमें मेरे पुराने संपादकों का दिया प्रशिक्षण काम आया।
पहली बार जब भास्कर में संपादक बना था तो नवीन जोशी ने एक मंत्र दिया था। चुगलखोरों से बचकर रहना पर शिकायतों को सुनना। अगर कोई शिकायत करता है तो जिसकी शिकायत उसे सामने बैठाकर बात करना। इसके कई फायदे हुए। मेरे पास तभी शिकायत आती थी जब वास्तव में कोई परेशान हो। आमने-सामने बैठा देने पर झूठे और चुगुलखोर डर जाते हैं, इसलिए मेरी टीम में कोई बड़ी गुटबाजी या टकराव कभी बढ़ावा नहीं मिला। शिकायतें सुनीं, मतभेदों को निपटाया, खूब बहसें कीं लेकिन मतभेद कभी मनभेद में नहीं बदले। बड़ी बड़ी खबरों पर इस टीम ने पूरी एकजुटता से बेहतरीन काम किया। छोटी टीम है लेकिन बहुत कर्मठ। सीमित जगह और संसाधनों में भी बेस्ट परफॉर्म करने वाली। बाकी बड़े अखबारों के सोलह-सत्रह संस्करण हैं यूपी में। नवभारत टाइम्स अकेले संस्करण से सबके मुकाबिल जमा और मजबूती से खड़ा हुआ। सब कुछ एक बेहतरीन टीम के एकजुटता से काम करने के कारण। अभी मेरे रिटायरमेंट में दो साल बाकी थे। मित्रों ने सवाल किया तो फिर इस्तीफा क्यों दिया ? जवाब है इस टीम के साथ करने का कम्फर्ट जोन। बीते सोलह साल से अलग अलग अखबारों और संस्करणों का संपादक रहा हूं। रोजाना वही खबरों पर नजर, सुबह मीटिंग शाम को मीटिंग, मार्केटिंग, सर्कुलेशन और प्रोडक्शन टीम के साथ साथ कभी कभी बैठकें। हफ्ते में दो कॉलम लिखना और बाकी पाठकों और समस्याएं लेकर आने वालों को सुनना। सब कुछ ढर्रे पर। संपादक और पत्रकार के तौर पर अखबार में खूब इनोवेशन किए। इस बात की तारीफ हमारे पाठक हमेशा करते हैं कि उन्हें एनबीटी दूसरे अखबारों जैसा नहीं लगता।
सच कहूं तो कंफर्ट जोन को फिक्र की बात समझना मैंने इसी ऑर्गनाइजेशन में सीखा। कंपनी ने मुझे एक बेहतर लीडर के तौर पर डेवलप करने के लिए इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस यानी आईएसबी से तीन कोर्स कराए। दो हैदराबाद में एक और मोहाली। लीडरिशप ट्रेनिंग के दौरान वहां यह भी सिखाया गया। कंफर्ट जोन हमेशा आपकी तरक्की में बाधक है। एक और व्यक्तिगत कारण था कि मैं रिटायरमेंट मोड पर नहीं जाना चाहता। अगर जिंदा रहा तो 75 की उम्र तक काम करना है। उसके लिए जरूरी है फिट रहना। शारीरिक और मानसिक तौर पर। कुछ दिन पहले जब हमारे मुंबई संस्करण के संपादक सुंदरचंद ठाकुर रिटायर हुए तो मेरे दिमाग में इस्तीफा देने का विचार आया। वह इसलिए कि अब लखनऊ एनबीटी में अगले दो साल मेरे लिए रिटायरमेंट के इंतजार वाले होने वाले थे। बाइस महीने, इक्कीस महीने, पंद्रह, पांच और फिर एक दिन मैं रिटायर हो जाता। मुझे लगा कि अगर मैं अभी इस्तीफा देकर इन दो सालों को प्रोडक्टिव बनाकर किसी नए प्रोजेक्ट में लगाऊं तो यह मेरे भविष्य के लिए ज्यादा बेहतर होगा। कुछ बेहतर कर पाया तो वहां खुद के साथ साथ अपने नए पुराने साथियों को रोजगार भी दे पाऊं। लिहाजा बहुत सोच-विचार कर मैंने करीब एक महीने पहले इस्तीफा दे दिया। कंपनी में मैनेजमेंट और मेरे सीनियर्स के लिए यह अप्रत्याशित था और मेरी अपनी टीम के लिए भी। यहां तक रिश्तेदारों और दोस्तों में से नब्बे प्रतिशत लोगों ने मेरे फैसले को गलत बताया लेकिन मैने अपने दिल की बात सुनी है। मेरी टीम से निकले ज्यादातर लोगों ने बाहर निकल कर कामयाबी के झंडे गाड़े हैं। तरुण दैनिक भास्कर जयपुर एडिटर है, आशीष तिवारी चंडीगढ़ अमर उजाला का एडिटर है, ओम अवस्थी भारत सरकार में है और सौरभ त्रिपाठी और अविनाश राय डिजिटल दुनिया में बेहतरीन काम कर रहे हैं। मौजूदा टीम में भी एक से बढ़कर एक बढ़िया पत्रकार हैं। उम्मीद है कि आगे यह टीम और भी बढ़िया काम करेगी।
बीते चौदह साल में इस अखबार से मुझे काफी कुछ मिला। जब मैं उदयपुर से लखनऊ वापस आया तो बच्चे नौ-दस साल के थे। अब दोनों जॉब कर रहे हैं। इस दौरान अपने पुराने प्लॉट पर अपना नया घर बनवाया। सबसे बड़ी बात यह काफी कुछ सीखा। सीखने की शुरुआत इस अखबार के इंटरव्यू प्रॉसेज से ही शुरू हो गई थी। तब के ब्रांड हैड अमन नायर और तत्कालीन संपादक श्री रामकृपाल सिंह ने शुरुआती बातचीत की। उसके बाद टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक जॉयजीत बोस ने करीब एक घंटे का इंटरव्यू लिया था। बेहतरीन बातचीत थी। उसके बाद तब के लैंग्वेज ब्रांड हेड कौस्तुव चटर्जी, उनके बॉस राहुल कंसल और फिर आखिर में कंपनी के वायस चेयरमैन समीर जैन जी ने मेरा इंटरव्यू किया। समीर जी के साथ इंटरव्यू याद रहा। मैंने उनके घर पर इंटरव्यू पर बैठते ही पहली लाइन बोली थी- आई एम नॉट कंफरटेबल इन इंग्लिश, इसलिए मैं चाहता हूं आप मुझसे हिंदी में बात करें। उन्होंने कहा कि मैने आपको टाइम्स ऑफ इंडिया के इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाया है, आप तो यह बताइए कि हिंदी में रस कितने प्रकार के होते हैं। एक बेहद कठिन साक्षात्कार बहुत ही हल्के-फुल्के ढंग गंभीरता के साथ हुआ। उनके हर सवाल पर मेरे जवाब के बाद मैं उनका चेहरा पढ़ने की कोशिश करता लेकिन वहां पर कोई भाव नहीं होता। यह समझना मुश्किल था कि मेरा जवाब उन्हें सही लगा या गलत लेकिन उन्होंने जब मुझे चुन लिया तो लगा कि जवाब सही ही लगे होंगे।
उस दौरान बतौर संपादक मेरे दृष्टिकोण को लेकर कई सवाल किए थे। संपादकीय स्वतंत्रता को लेकर मेरे जवाब से वहां गए दूसरे वरिष्ठ हैरान भी थे खासतौर पर मार्केटिंग से जुड़े अधिकारी। लेकिन मैने बेबाकी से बात की। भास्कर के दौरान किए गए कुछ फैसलों के मैने उदाहरण भी दिए थे। चलते समय उन्होंने दो बातें कहीं थी- हम लोग अखबार अपने पाठकों और एडवाइजर्स के हित में निकालते हैं, सरकारें बनाने या बिगाड़ने के लिए नहीं। यह बात सबको ध्यान रखनी चाहिए। मैने हमेशा कोशिश कि कंपनी की इस नीति को मैं हमेशा ध्यान रखूं। सच कहूं तो मुझे कभी खबरें छापने को लेकर कोई दबाव नहीं रहा। यह अलग बात है कि कंपनी के हित में क्या सही है और क्या गलत, इसका ध्यान मैंने हमेशा रखा और पाठकों का हित सबसे पहले। दिल्ली में जब मैं एडिटर था तब भी एक बार समीर जैन जी ने एक घंटे तक बात की। इस दौरान मैं उनकी विनम्रता का कायल हो गया। अपने संपादकों से बातचीत में वह बहुत विनम्र रहते हैं।
टाइम्स ग्रुप जॉइन करने के बाद मुझे पंद्रह दिन कंपनी की चेयरपर्सन और समीज जी की माता जी स्व इंदु जैन जी के घर में रहने का अवसर मिला। कंपनी से रूबरू होने के बाद मुझे उनके घर में बने गेस्ट हाउस में रहने का मौका दिया गया था। सुबह इंदु जी रोजाना नाश्ते में साथ रहतीं। अपनी पसंद की चीजें खुद सर्व करके खिलातीं। वह बेहद ममतामयी, कुलीन और शानदार व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। अयोध्या, लखनऊ, आईटी कॉलेज और कुंवर नारायण जी के बारे में अक्सर बात करती थीं। उनकी हिंदी साहित्य में काफी रुचि थी। कुल मिलाकर बेहतरीन चौदह साल बीते। कंपनी के आउट बाउंड में देश-विदेश घूमने का खूब मौका मिला। अब आगे की बात। पत्रकारिता का ट्रांसफॉर्मेशन हो रहा है। मोनोपली टूट रही है। पाठक या दर्शक ज्यादा सतर्क है और उसके पास ज्यादा च्वाइस हैं। तकनीक और ए आई चरम पर है। ऐसे में जब पत्रकारिता चोला बदल रही है तो मुझे भी लगा कि खुद की पोजीशनिंग और कामकाज के तरीके को बदलना होगा। अभी तक मैं लिख रहा था, अब आगे शायद आप को दिखूंगा। क्या करने वाला हूं, वह जल्द ही बताऊंगा।
फिलहाल इतना तय है कि पत्रकार ही रहूंगा। पत्रकारिता मेरा पैशन है और उसी को आगे भी जीना है। सोशल मीडिया के और निजी तौर पर मिलने जुलने वाले सभी मित्रों ने हमेशा मेरा बहुत साथ दिया है और आगे की मेरी राह अच्छी रहे, उसमें आपकी दुआओं की जरूरत होगी। और हां जाते जाते यह बताना जरूरी है कि नवभारत टाइम्स में मेरी जगह पर मेरे साथी मनीष श्रीवास्तव नए स्थानीय संपादक होंगे। वह डिप्टी एडिटर मनीश शर्मा और टीम के बाकी साथियों के साथ मिलकर अखबार और आगे बढ़ाएंगे, यह मेरी शुभकामना है।


