दिनेश पाठक-
अपने खाते में एक नई किताब आ गयी है।
इस पुस्तक का शीर्षक है: ‘सब ठीक है!’
यह किताब लंबे समय से लंबित थी। लेकिन अंत भला तो सब भला, वाली कहावत को याद करते हुए खुश हूँ।
मेरी अब तक पूर्व में प्रकाशित पाँच किताबों के केंद्र में बच्चों का लालन-पालन ही रहा है। यह पहली किताब है, जो व्यंग्य के रूप में आपके सामने है।
जब मैं लखनऊ में हिंदुस्तान अखबार के लिए काम करता था, तब बहुतेरी ऐसी खबरें सामने आती थीं, जिन्हें प्रमाण के अभाव में नहीं लिखा जा सकता था। ऐसा अक्सर होता। मैंने अपने संपादक श्री नवीन जोशी से चर्चा की तो उन्होंने व्यंग्य के रूप में लिखने का सुझाव दिया।
पहला पीस लेकर मैं उनके सामने था। सर ने उसे पसंद किया और तय हुआ कि हर हफ्ते फीचर पेज पर जाया करेगा। गया भी। मुझे लगता है कि कम से कम ढाई-तीन साल लगातार पब्लिश हुआ। हमारे फीचर एडिटर श्री अविनाश चंद्र और उनकी पूरी टीम ने मन से छापा। कई बार तो छपते-छपते स्टाइल में भी यह कॉलम छपा।
कुछ हफ्ते ही छपे थे, व्यंग्य सम्राट पद्मश्री केपी सक्सेना जी की नजर इस पर पड़ी तो एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया। पीठ थपथपाई। दो दिन बाद उनके हाथ का लिखा एक पत्र मुझे मिला। फिर फोन भी आया। बोले कि इस कॉलम पर किताब बननी चाहिए। उनका आदेश सिर आंखों पर था। लेकिन उन्होंने जब मुझे पत्र भेजा उसी के बाद मेरा लखनऊ छूट गया। संस्थान ने मुझे संपादक के रूप में प्रयागराज, आगरा, देहरादून, कानपुर, गोरखपुर केंद्रों का दायित्व दिया। समय के अभाव में केपी सर के आदेश का पालन नहीं हो पाया। मैं जब कानपुर में था तब सर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
उनके हाथ में किताब न दे पाने का गिल्ट मेरे मन में घर कर गया। फिर जीवन में झंझावत भी लगे रहे। कुछ महीने पहले फिर से यह कतरनें मेरे हाथ लगीं। एक युवा साथी की मदद से इसे टाइप करवाया। फिर खुद पढ़ा। कई पीस मतलब के नहीं लगे तो उन्हें हटाकर पब्लिशर की तलाश शुरू की।
इसी बीच एक दिन प्रशासनिक अधिकारी अनुज श्री ललित नारायण मिश्र जी से बातचीत हो रही थी उनके रचना संसार पर। उनकी नई किताब आई थी। उसे पढ़ते हुए मैंने फ़ोननकर लिया। उन्होंने पूछ लिया कि इन दिनों मैं क्या लिख रहा हूँ? तब मैंने इस किताब की चर्चा की। दो दिन बाद उन्होंने श्री डीपी मिश्र की चर्चा की और मुझे कहा कि वे किताब छाप देंगे। दो-चार दिन ही बीता, मेरी मिश्र जी से मुलाकात हुई। स्क्रिप्ट उन्हें सौंप दिया। और उन्होंने इस किताब को पूरे मन से छापा। दिल्ली से बाहर रहने की वजह से मैं खुद किताब देख नहीं सका था। जब लौटा तो मिश्र जी के दफ्तर गया। उन्होंने कुछ किताबें दीं और सम्मानित भी किया।
कंटेंट का फैसला तो पाठक करेंगे लेकिन कागज, छपाई आदि में मिश्र जी ने कोई चूक नहीं की है। उनका दिल से आभार। ललित जी का भी आभार। आप पाठकगण का अग्रिम आभार।
किताब ऑनलाइन उपलब्ध है। आप नीचे दिए गए लिंक पर जाकर खरीद सकते हैं।
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