महेश झालानी-
टीवी पत्रकारिता का यह जगमगाता स्टूडियो दूर से जितना रोबदार दिखता है, अंदर से इसका वजूद उतना ही खोखला, क्रूर और बेदर्द है। इस चमचमाती स्क्रीन के ठीक बीचों-बीच खड़ी रुबिका लियाकत की ताजा करियर यात्रा हिंदी न्यूज मीडिया के उसी सड़ते हुए सिस्टम को नंगा करती है, जहां पत्रकारों को खबर का सिपाही नहीं, बल्कि टीआरपी का सौदागर और बाजार में बिकने वाला एक ‘लाउड ब्रांड’ बना दिया गया है। जिस चेहरे के स्वागत में कल तक चैनल के आका रेड कार्पेट बिछाकर ढोल-नगाड़े पिटवाते थे, आज वही चेहरा लगातार धक्के खाती नौकरियों और नीलाम होती साख के चौराहे पर बेबस खड़ा है।
भारत24 में किसी महारानी की तरह हुआ शाही इस्तकबाल, फिर न्यूज18 इंडिया की मसनद पर बैठकर हुंकार भरना और उसके बाद टाइम्स नाउ नवभारत में धमाकेदार एंट्री के महज तीन महीने के भीतर दरवाजे से बाहर फेंक दिया जाना, रुबिका लियाकत की यह बदहाली सिर्फ एक एंकर के बेरोजगार होने का किस्सा नहीं है। यह इस कड़वी हकीकत का जिंदा सबूत है कि टीवी इंडस्ट्री की जिस भड़कीली दुनिया को वे अपनी सल्तनत समझ बैठी थीं, वह असल में ताश के पत्तों का एक महल भर थी। जिस आक्रामक तेवर, चीख-पुकार और सांप्रदायिक नैरेटिव को रुबिका ने अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया, अंततः वही एजेंडा उनकी एंकरिंग के ताबूत की आखिरी कील साबित हुआ।
जब तक उनकी यह चिल्लाहट बाजार में बिकती रही और स्टूडियो का ड्रामा दर्शकों को बेवकूफ बनाता रहा, तब तक कॉर्पोरेट मीडिया उनके कदमों में करोड़ों का पैकेज और बड़े-बड़े होर्डिंग्स बिछाता रहा। लेकिन जैसे ही टीआरपी का नशा उतरा और साख का जनाजा निकला, इस निर्दयी तंत्र ने उन्हें दूध में से मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया। स्क्रीन पर बैठकर सत्ता की चाटुकारिता करने और पत्रकारिता के नाम पर नफरत के जो गुब्बारे फुलाए गए, रुबिका लियाकत उसका सबसे नुमाइंदा चेहरा बनकर उभरी थीं। लेकिन टीवी न्यूज रूम का यह कारपोरेट बाज़ार जितना निर्लज्ज किसी को ‘स्टार’ बनाने में होता है, पतन की गर्त में धकेलते वक्त वह उससे कहीं ज्यादा हिंसक हो जाता है। जब एक पत्रकार अपनी निष्पक्षता बेचकर केवल एक विचारधारा की लाउडस्पीकर बन जाती है और उस पर ‘गोदी मीडिया’ का अमिट ठप्पा लग जाता है, तो स्क्रीन की वह कृत्रिम रंगत ज्यादा दिन तक इस सड़न को छिपा नहीं पाती।
दर्शक जब इस जहरीले शोर से ऊबकर रिमोट का बटन बदलने लगे, तो वही मैनेजमेंट जिसने कभी रेड कार्पेट बिछाए थे, रातों-रात आंखें फेरने लगा। पैकेज का कटकर चौथाई रह जाना और फिर भी चैनलों का मुफ्त में भी शरण देने से इनकार कर देना, यह उस अंतहीन पतन की दास्तान है जो हर उस पत्रकार का इंतजार करती है जो खुद को सत्य से बड़ा समझ बैठता है। आज रुबिका लियाकत की यह बदहाली सिर्फ एक व्यक्ति का संकट नहीं है, बल्कि उन तमाम परजीवी एंकरों के लिए एक खुला सबक है जो स्टूडियो की दो कौड़ी की शोहरत के आगे पत्रकारिता के जमीर का सौदा कर बैठते हैं। यह चीख-चीखकर गवाही देता है कि जब स्क्रीन से सच, ईमानदारी और रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है, तो टीवी की दुनिया का यह आदमखोर सूरज जितनी बेशर्मी से चढ़ता है, साख के बिना उतनी ही ज़िल्लत के साथ गर्त में दफन भी हो जाता है।
खुशदीप सहगल-
टाइम्स नाउ नवभारत से रुबिका लियाक़त की छुट्टी को लेकर महेश झालानी ने शानदार लिखा है जो Bhadas4media में छपा है. रुबिका की कहानी उन सभी एंकर्स-पत्रकारों के लिए सबक़ है जिन्होंने पत्रकारिता धर्म को छोड़ चाटुकारिता को गले लगाया.
इन्हें सोचना चाहिए, दिन रात आकाओं के नाम की माला जपने से इन्होंने अपना बैंक बैलेंस बेशक बढ़ा लिया लेकिन इसकी कीमत में इन्होंने खोया क्या? ज़माना कितना निष्ठुर है, ये भी इन्हें आज नहीं तो कल समझ आ ही जाएगा.
सियासत की जिस गोदी में ये बैठे थे, उस सियासत को भी समझ आ गया है कि इन पर और इंवेस्टमेंट करना अब फ़ायदे का सौदा नहीं रहा. उसका रुख़ भी सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स की ओर हो गया है. गोदी एंकर्स की कोई साख नहीं रही है. विशेष तौर पर GenZ तो इन्हें बिल्कुल बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं. ये चीज़ अब इन्हें मोटे मोटे पैकेज पर रखने वाले चैनल मालिक भी समझ रहे हैं. उन्हें भी ये सफ़ेद हाथी नज़र आने लगे हैं जो खुराक तो तगड़ी ले रहे हैं लेकिन डिलिवर कुछ नहीं कर रहे हैं.
आज नहीं तो कल इन चैनल्स को पत्रकारिता के बेसिक्स की ओर लौटना ही होगा. इसका संकेत इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा ने मुचुआ ज्ञानेश कुमार की पोल खोलने वाली रिपोर्ट से देश में जलजला लाकर दे ही दिया…
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