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सुख-दुख

निखिल वागले के साथ जो कुछ हुआ, वो भारत में लोकतंत्र की हकीकत बता रहा

यूं तो भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता रहा है लेकिन यह सब अब कहने सुनने के लिए ही बच गया है। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले तेज हुए हैं। पत्रकार निखिल वागले पर हुआ हमला इसकी तस्दीक करता है। निखिल वागले लंबे समय से सांप्रदायिकता और नफरत की राजनीति के खिलाफ लिखते बोलते आए हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दयाशंकर मिश्रा ने वर्तमान हालात पर चोट करते हुए एक्स पर लिखा है कि जहां सवाल पूछने पर लेखकों और पत्रकारों को जब इस तरीके से सजा दी जाए तो नागरिकों की हैसियत समझी जा सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले का कसूर इतना ही तो है कि उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी को भारत रत्न देने का विरोध किया। वागले इस विरोध का जो आधार बता रहे हैं, उसे खारिज नहीं किया जा सकता।

दयाशंकर मिश्रा के अनुसार लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न का विरोध करने पर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी, भाजपा के कार्यकर्ताओं का उन पर हमला,लोकतंत्र की हकीकत को बता रहा है। महाराष्ट्र और देश की ‘डबल’ इंजन वाली, शक्तिशाली सरकार अपने पत्रकारों और लेखकों की रक्षा में पूरी तरह विफल है।

मिश्रा ने सवालिया लहजे में पूछा है कि नागरिकों को फ़ैसला करना है,वह किसके साथ है? एक तरफ़ लेखक, पत्रकार और सवाल करने वाले लोग हैं, दूसरी ओर सरकार!

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