सुब्रत राय की अमूल्य निधि आज जेल की सलाखों में…. ओपी श्रीवास्तव की त्रासदी, मालिक के अपराधों का दंश… कोई निधि अमूल्य होती, हर कीमत चुकाना जरूरी….
कुमार सौवीर-
14 नवंबर 2023 को मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल के बेड पर लेटे-लेटे सुब्रत रॉय ने अपना आखिरी आधिकारिक हस्ताक्षर करते समय एक सर्कुलर्र जारी किया था कि “श्री ओम प्रकाश श्रीवास्तव मेरे लिए एक अमूल्य निधि (priceless asset) हैं… मैं एडमिनिस्ट्रेटिव कार्य नहीं कर पा रहा हूँ… इसलिए सभी अधिकार उन्हें सौंपे जाते हैं।”

ठीक सात दिन बाद सुब्रत रॉय इस दुनिया में नहीं रहे।
और ठीक दो साल बाद, 20 नवंबर 2025 को उसी “अमूल्य निधि” को प्रवर्तन निदेशालय ने कोलकाता में हथकड़ी लगाकर गिरफ्तार कर लिया। यह सिर्फ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं है। यह उस पूरे साम्राज्य की अंतिम साँस है जिसे सुब्रत रॉय ने 1978 में गोरखपुर की एक गली में 2000 रुपये से शुरू किया था और जिसे ओपी श्रीवास्तव ने 45 साल तक पाला-पोसा था। लेकिन हैरत की बात है कि इसी सेवा का मेवा पौने दो लाख करोड़ हजार रूपयों को हडपने के तौर पर सामने आया।
सन-1985 में ओपी श्रीवास्तव सहारा में कोई बड़े नाम नहीं थे। वे पांचवें-छठे स्तर के मैनेजर थे। फाइलें दौड़ाते, ब्रांच विजिट करते, एजेंट्स को ट्रेनिंग देते। लेकिन सुब्रत रॉय की नजर उन पर थी। वे देखते थे कि यह आदमी चुपचाप काम करता है, सवाल नहीं करता, रात-दिन दौड़ता है और सबसे बड़ी बात यह कि वह कभी “ना” नहीं कहता।
धीरे-धीरे वही व्यक्ति सहारा इंडिया की रीढ बन गया। 2014 में जब सुब्रत रॉय तिहाड़ जेल में थे, तब भी बाहर का पूरा साम्राज्य ओपी श्रीवास्तव और कुछ वफादारों के कंधों पर टिका था। सुब्रत राय की मंशा को ओपी श्रीवास्तव ने ही पूरे देश में फैलाया कि सहारा कभी कॉर्पोरेट नहीं, बल्कि यह तो एक संप्रदाय था। सुब्रत रॉय उसके पैगंबर थे और ओपी श्रीवास्तव उनके सबसे विश्वसनीय शागिर्द। ओपी ने ही सुब्रत राय को नाजी-संस्कृति में मशहूर उस शैली को अंगीकार कराया जिसमें वे दाहिना हाथ सीने में रख कर गुड-सहारा का नारा लगाते थे। जवाब में उसके कर्मचारी भी हुंकार करते थे।
सुब्रत राय ने सहारा इंडिया को धूधू जलती चिता की आशंका को पहले ही पहचान लिया था। अपने दोनों बेटे विदेश में सेटल किया, पत्नी से भारतीय नागरिकता छुडवा दिया। ऐसे में साम्राज्य बचाने के लिए एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो भारत में रहे, कानूनी लड़ाई लड़े, संपत्ति बेचे, कर्मचारियों को सैलरी दे और सबसे बढ़कर सुब्रत के सपने को जिंदा रखे। ओपी श्रीवास्तव ने यही किया। वे लखनऊ में रहे, कोर्ट के चक्कर काटते रहे, प्रेस कॉन्फ्रेंस करते रहे कि “सहारा परिवार है, कोई नहीं डूबने देगा”।
वफादारी का यही मूल्य था, जो आज जेल की सलाखों के पीछे चुकाया जा रहा है।लेकिन अपराधबोध का प्रश्न यह जरूर है कि क्या ओ.पी. श्रीवास्तव व्यक्तिगत रूप से 1.79 लाख करोड़ की धोखाधड़ी के आर्किटेक्ट थे? शायद नहीं। वह आर्किटेक्ट सुब्रत रॉय थे। पोंजी स्कीम का ब्लूप्रिंट सुब्रत रॉय ने तैयार किया था। लेकिन जिस व्यक्ति ने उस ब्लूप्रिंट को 30 साल तक अमल में लाया, फंड को शेल कंपनियों में घुमाया, निवेशकों को झूठे सपने दिखलाए, गुप्त बिक्री की। उसका नाम ओपी श्रीवास्तव ही है।
कानून के लिए वफादारी माफी का आधार नहीं होती। 20 नवंबर 2025 को कोलकाता के ईडी दफ्तर में जब ओ.पी. श्रीवास्तव से पूछताछ हो रही थी, तब तक शाम हो चुकी थी। वे थके हुए थे। एक सवाल पर उन्होंने गलत जानकारी दी। ईडी ने कहा, “आप सहयोग नहीं कर रहे।”और फिर हथकड़ी पहना दी गई।
70 साल की उम्र वाले जिस व्यक्ति को सुब्रत रॉय ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, उसी व्यक्ति को आज देश की सबसे बड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच का मुख्य आरोपी बनाया गया। यानी उम्र का वह दौर, जब शरीर श्लथ होकर आराम चाहता है, उस वक्त उन्हें सलाखों में पूरा जीवन बिताना होगा।
ओपी श्रीवास्तव की कहानी एक चेतावनी है। वफादारी जब अंधी हो जाए, जब वह सही-गलत का भेद मिटा दे, जब वह मालिक के अपराधों को अपना अपराध बना ले। तो उसका अंत यही होता है।
सुब्रत रॉय चले गए। उनके बेटे विदेश में सुरक्षित हैं। पत्नी मैसेडोनिया की नागरिक हैं। और उनकी “अमूल्य निधि” आज जेल में है। सहारा का साम्राज्य ढह चुका है। बचा है तो सिर्फ एक सवाल कि क्या वाकई कोई निधि अमूल्य होती है, या अंत में हर कीमत चुकानी पड़ती है?
(साभार दैनिक तरूणमित्र)


