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सुख-दुख

पत्रकारिता और एकेडेमिक्स में कितना अंतर है?

नदीम अख्तर-

लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि पत्रकारिता और एकेडेमिक्स में क्या अंतर आपको दिखता है? आप किसे ज़्यादा एंजॉय करते हैं? उनको मैं टरका देता हूँ और कोई सीधा जवाब नहीं देता।

लेकिन मेरा एक ऑब्जर्बेशन है। पत्रकारिता ख़ालिस बुद्धि वाला, रचनात्मक, साहसी, दृढ़ मनोदशा और ज़बरदस्त हुनर वाला काम है। जिसे काम नहीं आता, वह पत्रकारिता में नहीं चल सकता। नीचे लेवल पर शायद चल भी जाए, तमाम तरह के -वाद- का उपयोग करके, लेकिन सम्पादक नहीं बन सकता। और अगर कोई जुगाड़ से सम्पादक बन भी जाता है तो वह पत्रकार तो नहीं ही बन सकता। वह आम, इमली और खीर में कितनी शक्कर डाली जाए, टाइप ख़बर भले लिख ले और लिखवा ले, न्यूज़ सेंस, न्यूज़ एक्सपेरिमेंट और न्यूज़ की नब्ज पकड़ने में वह कभी कामयाब नहीं हो सकता।

मुझे याद है दिल्ली के एक बड़े अख़बार में डेस्क इंचार्ज ने जाड़े वाली ख़बर के हाइलाइट्स में लिखा था- ठंड का घमंड। वह छप भी गया।

अब ये ठंड का घमंड क्या होता है, ये तुकबंदी थी या बेतुकी बात या फिर एक अश्लील टिप्पणी, जो पत्रकार, जनता के सामने कर रहा था, ये वो जाने और उसके सीनियर। इसीलिए ऊपर कहा कि अयोग्य व्यक्ति जुगाड़ और -वाद- लगाकर संपादक भले बन जाए, मगर वह पत्रकार नहीं बन सकता। ना अपनी भाषा में, ना अपनी सोच में और ना ही अपनी एडिटोरियल लाइन में। उसे आप एक अच्छा क्लर्क भी नहीं कह सकते।

रही बात भारत के एकेडेमिक्स की तो इसे जितना देखता हूँ, उतनी ही मेरी आँखें खुली की खुली रह जाती हैं। ऐसे-वैसे कैसे-कैसे बन गए! कुछ अपवादों को छोड़ दें तो यहाँ आपको हर तरफ़ हरफ़नमौला टीचर मिल जाएँगे, जो डिमांड होने पर रॉकेट साइंस से लेकर अमीबा साइंस तक बहुत बेफ़िक्री से पढ़ा देंगे। पीपीटी बनाकर वह स्टूडेंट को दूसरी गैलेक्सी के किसी प्लैनेट पर जीवन के दर्शन भी करा देंगे। देश के एक बड़े संस्थान में मैंने एक -विद्वान- को फ़िल्म के बारे में पढ़ाते हुए देखा। उन्होंने धड़ाधड़ पीपीटी पढ़कर इंटरनेट और गूगल का सारा ज्ञान बच्चों पर उड़ेल दिया। बच्चे बेचारे -ख़ौफ़- में चुपचाप सुनते रहे।

हुनर सिखाने वाले सब्जेक्टस में तो और भी बुरा हाल है। इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपने उस हुनर को इंडस्ट्री में सीखा है या नहीं। मगर आप उसे पढ़ा ज़रूर सकते हैं।

कुछ पुरानी बात है। एक दफ़ा एक नामी प्रोफ़ेसर की क्लास में मुझे बैठना पड़ा। बस देखने के लिए। वह न्यूज़ सेंस पढ़ा रहे थे। प्रोफ़ेसर ने 6-7 ख़बरें लिखीं और स्टूडेंट्स से पूछा कि इनमें से ख़बरों की प्रॉयोरिटी तय करिए। बच्चों के जवाब के बाद जब प्रोफ़ेसर साहब ने अपने न्यूज़ सेंस के हिसाब से ख़बरों की प्रॉयोरिटी बताई तो मैंने माथा पीट लिया। अख़बार और चैनल के दफ़्तर में हम उन ख़बरों को उतनी तवज्जो नहीं देंगे पर प्रोफ़ेसर साहब के लिए वे अहम ख़बरें थीं। और यहाँ मैं सीरियस क्लासिकल जर्नलिज़्म की बात कर रहा हूँ, मसाला पत्रकारिता की नहीं।

तालाब में चीख- नाम से एक भुतहा आधे घंटे का प्रोग्राम मैंने भी एक चैनल के लिए बनवाया था, एडिटर साहब की फ़रमाइश पे। वो टीआरपी के लिए था। और मैंने एडिटर साहब से कहा भी था कि अख़बार के दफ़्तर में तो ऐसी ख़बरों को हम सिंगल कॉलम जगह भी नहीं देते। तब एडिटर साहब ने हंस कर कहा कि ये न्यूज़ चैनल है और यहाँ ये सब करना पड़ता है। उनसे मैंने टीवी की टीआरपी पत्रकारिता सीखी। प्रिंट में क्लासिकल जर्नलिज़्म अच्छे गुणी लोगों से सीखा। मुझे दोनों विधा आती है पर प्रोफ़ेसर साहब का न्यूज़ सेंस मंगल ग्रह वाला था।

कारण ये है कि उन्होंने कभी अख़बार के दफ्तर में काम नहीं किया, तो जो समझ आया, वह स्टूडेंट्स को बता दिया।

मुझे याद है कि एक दफ़ा टाइम्स ऑफ इंडिया, दिल्ली के न्यूज़ एडिटर से मैं एडिशन छोड़ने के बाद ऑफिस की गाड़ी में घर जाते वक़्त उलझ गया। तब मैं बहुत जूनियर था पर ख़बरों को लेकर हमेशा सतर्क रहता था कि नवभारत टाइम्स में पेज वन की लीड क्या है, इकोनॉमिक टाइम्स में पेज वन लीड कौन सी ख़बर है और टाइम्स ऑफ इंडिया ने पेज वन की बड़ी ख़बर किसे बनाई है। तो उस दिन अमेरिका में कुछ घंटों के लिए बिजली गुल की ख़बर को दिल्ली टाइम्स ऑफ इंडिया ने पेज वन पर बड़ी जगह दी थी।

मैंने न्यूज़ एडिटर से यही पूछा था कि सर, अमेरिका में बिजली गुल माना बड़ी ख़बर होगी, पर हम भारत में दिल्ली के अख़बार में उसे पेज वन की इतनी बड़ी ख़बर क्यों बना रहे हैं? उनका लॉजिक ये था कि हमारे यहाँ के कई पॉलिटिशियन्स और ब्यूरोक्रेट्स के बच्चे वहाँ पढ़ रहे हैं, सो ये हमारे लिए भी बड़ी ख़बर है। पर मैं उनके इस न्यूज़ सेंस से तब भी सहमत नहीं था और इतने अनुभव के बाद आज भी सहमत नहीं हूँ। अमेरिका वाले ढिबरी जला लें या टॉर्च, ये मेरे अख़बार के लिए पेज वन की बड़ी ख़बर तो नहीं ही है।

इसी संदर्भ में मैं भारत के एकेडिमिक्स की बात कर रहा हूँ। कौन क्या पढ़ा रहा है, ये इस बात से बिल्कुल भी तय नहीं हो रहा कि उस विषय पर संबंधित टीचर की पकड़ है या नहीं! अगर आप मास कम्युनिकेशन के टीचर हैं तो आपको इसके अंतर्गत सब विषय पढ़ाना आना चाहिए, ये तर्क ही बेहद बेतुका और खोखला है।

दिल्ली के IIMC में मैंने एक चीज अच्छी देखी। वहाँ प्रोफ़ेसर जिस विषय को पढ़ाने में comfortable थे, उन्हें पढ़ाने को वही दिया जाता था। बाकी चीजों के लिए इंडस्ट्री से उस विषय के एक्सपर्ट को हम लोग बुला लेते थे। मसलन Types of Headlines पढ़ाकर हम स्टूडेंट्स को अच्छी हेडलाइन लिखना कभी नहीं सिखा सकते। अखबार के दफ्तर में जब हम हेडिंग लगाते हैं तो कभी जेहन में ये ख्याल भी नहीं रहता कि मेरी हेडिंग Types of Headlines की किस कैटिगरी में आएगी? मेरा मानना है कि अमूमन बड़े और अच्छे पत्रकारों को तो ये पता भी नहीं होगा कि हेडलाइन को कितनी कैटिगरी में तथाकथित विद्वानों ने बांटा है!

एक बार आईआईएमसी, दिल्ली में जनसत्ता के पूर्व सम्पादक श्री ओम थानवी जी से मुलाक़ात हुई। हालाँकि उन्हें मैंने नहीं बुलाया था, लेकिन वे मेरे सीनियर हैं और मुझे सम्मान देने के लिए मुझे अपना मित्र कहते हैं, तो उनके कहने पर मैं भी उनके साथ हो लिया। उन्होंने एक ऑब्जर्वेशन दिया। उन्होंने पूछा कि आप लोग यहां पत्रकारिता के साथ-साथ पीआर यानी पब्लिक रिलेशन भी पढ़ाते हैं? मैंने कहा- हां, पढ़ाते हैं। उनकी टिप्पणी थी कि पत्रकारिता और पीआर एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत छोर पे हैं। तब तो पत्रकारिता पढ़ने वाले छात्र पीआर में भी जाते होंगे! मैंने कहा- हां। उनका जवाब था कि यही गड़बड़ है। बाद में थानवी जी हरिदेश जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के फाउंडिंग वाइस चांसलर बने।

कहने का मतलब ये है कि आइंस्टीन को अगर आप ऑर्गेनिक केमिस्ट्री पढ़ाने दे देंगे तो मामला गड़बड़ा जाएगा। साथ ही पीएचडी करने वाला हर आदमी थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी नहीं बना सकता। उसके लिए आइंस्टीन बनना पड़ता है। भारत के एकेडेमिक्स में Industry Oriented courses में Industry में काम सीखकर पढ़ाने आए लोगों की घोर कमी है। चाहे वह मैनेजमेंट हो, मास कम्युनिकेशन हो या फिर कम्प्यूटर साइंस।

नतीजा ये होता है कि स्टूडेंट किताबी ज्ञान लेकर डिग्री तो ले लेते हैं, पर वे Industry Ready नहीं होते। इस Gap को भरने के प्रयास जिस युद्ध स्तर पर किए जाने चाहिए थे, वे नहीं हुए।

सरकारी यूनिवर्सिटीज को इससे मतलब नहीं क्योंकि वे तो एक अलग ही दुनिया में रहते हैं। सरकारी नौकरी मतलब पक्की नौकरी, तो अब कौन सिरदर्द ले! रही प्राइवेट यूनिवर्सिटीज की बात, तो मुझे लगता है कि highest level पे उनके मैनेजमेंट ने भी अभी तक इस बारे में कोई ठोस पॉलिसी नहीं बनाई है।

अब देख रहा हूं कि कई सारी प्राइवेट यूनिवर्सिटीज AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का राग अलाप रहे हैं। एआई आपका काम कुछ आसान कर सकता है पर वह इंडस्ट्री का अनुभव लेकर आए व्यक्ति की जगह किसी जन्म में नहीं ले सकता। एआई तो डेटा पे खेलता है। जो डेटा उसमें आप फीड करोगे, उसी के मुताबिक वह गुणा-भाग करके रिजल्ट दे देगा। लेकिन अनुभव और हुनर का डेटा एआई में नहीं डाला जा सकता। इसे सिर्फ इंसान से ही हासिल किया जा सकता है। और इस मामले में भारत का एकाडिमिक्स अभी बहुत पिछड़ा हुआ है।

और जब फैक्ट्री आउडेटेड होगी, तो वहां से तैयार माल भी आउटडेटेड ही होगा। भारत के एकेडिमिक्स और इंडस्ट्री के बीच जो संवादहीनता है, जो gap है, उस पर मैंने एक रिसर्च पेपर भी लिखा था, जो IIMC के प्रतिष्ठित रिसर्च जर्नल में छपा था।

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