ओ पी सक्सेना-
ये अस्सी के दशक का वाकया है। मैं नया-नया रिपोर्टिंग टीम में शामिल हुआ था। क्राइम की बीट मेरे पास थी। उस समय मैं अपने आप को बहुत बड़ा जासूस समझता था। इसकी एक वजह ये भी हो सकती है की मुझे जासूसी उपन्यास पढ़ने का बड़ा शौक था। इब्ने शफी बीए से लेकर जेम्स हेडली चेज और परशुराम शर्मा से वेद प्रकाश शर्मा तक लगभग सभी उपलब्ध जासूसी उपन्यासकारों को मैंने बड़ी गंभीरता से पढ़ रखा था। शायद इसी लिए मैं भी अपनी रिपोर्टिंग में किसी भी घटना या दुर्घटना की गहन पड़ताल करके ही खबर लिखता था। लेकिन आज मुझे लगता है कि उस समय मैं उतना परिपक्व नहीं था और इस बात को भी नहीं जानता था कि उस दौर में अखबार में छपे शब्द किसी कांच की दीवार पर पत्थर मारे जाने पर हवा में उड़ती कांच की किरचों के समान होते थे जो कितने लोगों को घायल करेंगे इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
फिलहाल मूल विषय पर आते हैं। एक रोज सूचना मिली कि कांग्रेस में सेवा के लिए बनाए गए उसके एक सहयोगी दल के अध्यक्ष की बहू ने आत्महत्या कर ली है। घटना की सूचना मिलते ही मैं तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गया। फोटोग्राफर ने हर एंगल से तस्वीरें ली और मैं तफ्तीश में जुट गया।
पहली बात पता चली की मरने वाली महिला हिंदू समाज से है और जिस परिवार की वह बहू है वह मुस्लिम है। आस पड़ोस के लोगों से बात करने पर पता चला की मृतका की सास एक नर्स है जिसपर कालांतर में औरतों की सप्लाई का मामला दर्ज हुआ था जिसमें उसके खिलाफ करवाई भी हुई थी। लोगों का यह भी कहना था की मृतका की शादी भी दबाव बनाकर कराई गई थी।
इस तरह तमाम तथ्य और सबूत बटोर कर में ऑफिस आ गया। अब पहला सवाल मन में ये था की खबर में ऐसा क्या लिखा जाए जो दूसरे अखबारों से अलग हो और हमारी खबर एक्सक्लूसिव हो।
तमाम सोच विचार के बाद ये बात जेहन में आई की कोई व्यक्ति इतनी आसानी से आत्महत्या नहीं करता। इसके पीछे गंभीर कारण होते हैं, यह भी हो सकता है की ये हत्या का मामला हो लेकिन किसी भी कारण को स्पष्ट रूप से नहीं लिखा जा सकता। ऐसे में सिर्फ सवाल उठाए जा सकते हैं।
अंततः मैंने खबर लिखी और उसमें मृतका की पूरी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी लिखी।
अगले दिन के अखबार में वह खबर प्रमुखता से छपी। इसे लेकर मैं बड़ा उत्साहित था। सुबह तैयार होकर ऑफिस पहुंचा ही था और साथियों से चर्चा कर ही रहा था की गेट की तरफ से किसी के जोर-जोर से चीखने की आवाजें सुनाई पड़ीं…कहां है ओ पी सक्सेना.. दिमाग खराब हो गया है उसका।
अपना नाम सुनकर मैं भी गेट की तरफ भागा। तभी सामने से अखबार के मालिक आते नजर आए। मुझे देखते ही उन्होंने मुझे कालर से पकड़ लिया…. दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा। हाथ में कलम आ गई तो कुछ भी लिखोगे। मैं भी इस अचानक हमले से घबरा गया और इतना ही कह पाया… आखिर हुआ क्या है?
हुआ क्या है….वह मुझे कालर से खींचते हुए अपनी कार तक ले गए और कार का पिछला दरवाजा खोल कर मुझे उसमें धकेल दिया…. चलो दिखाता हूं क्या हुआ।
वह मुझे अपने बंगले तक ले गए। वहां जाकर पता चला की मेरी खबर से नाराज लोगों की भीड़ ने सुबह-सुबह उनके बंगले पर पथराव कर दिया जिससे उनके बंगले की खिड़कियों के सारे कांच टूट गए। घर के लोगों ने किसी तरह अपने आप को बचाया। यह नजारा देख कर मैं भी अपराध भाव से भर गया।
उनका गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ था। वह बोले जा रहे थे….देख लिया क्या हुआ है। अरे भाई यहां अखबार निकालने आए हैं। धंधा करने आए हैं, जान देने नहीं आए हैं। कलम हाथ में आ गई तो कुछ भी लिखोगे। सीधी-सीधी आत्महत्या की खबर थी। उसमें हिंदू मुस्लिम, मृतका के परिवार की हिस्ट्री, हत्या की आशंका लिखने की क्या जरूरत थी?
वो बोल रहे थे और मैं सर झुकाए खड़ा था। सॉरी कहने के अलावा मेरे पास उस समय और कोई रास्ता नहीं था।
लेकिन वहां से ऑफिस आने के बाद जब शहर में निकला तो मेरी उस खबर की हर जगह चर्चा थी। पुलिस, प्रशासन, राजनीति, एडवोकेट और खबरों में रुचि रखने वाले लोग मुझे बधाइयां दे रहे थे और मैं यह नहीं तय कर पा रहा था की मैंने उस खबर को जिस तरह लिखा था वह उचित था या अनुचित लेकिन ये जरूर था की इतनी नाराजगी के बाद भी ऑफिस में मेरे खिलाफ कोई करवाई नहीं की गई। बस इसी से मैंने अंदाजा लगा लिया था की अखबार मालिक खबरों में मेरे इस तेवर को पसंद करते हैं।


