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सुख-दुख

पिछले कुछ वर्षों से चैनलों को एंकर और डेस्क वाले ही चला रहे हैं या हांक रहे हैं.. शाम 5 बजे के बाद किसी चैनल में किसी रिपोर्टर का अमूमन कोई काम नहीं है..

राजीव रंजन सिंह-

रिपोर्टर करते क्या हैं? पिछले कुछ वर्षों से ये मासूम और आम सवाल अक्सर न्यूज चैनलों के दफ्तर में पूछे जाते हैं..

दरअसल पिछले कुछ वर्षों से चैनलों को एंकर और डेस्क वाले ही चला रहे हैं या हांक रहे हैं.. शाम 5 बजे के बाद किसी चैनल में किसी रिपोर्टर का अमूमन कोई काम नहीं है.. आग लग जाए, आपराधिक बड़ी घटना हो जाए, बारिश बाढ़ आ जाए या प्राकृतिक घटना हो तो अलग बात.. नहीं तो सारे चैनल में पांच से दस बजे रात तक केवल डिबेट या एंकर का मोनोलॉग (मतलब अकेले वही बोल रहा) चलता है..

रिपोर्टर की ग्राउंड रिपोर्ट खतम कर दी गई या करा दी गई (पता नहीं).. आम जनता की समस्या या आम लोग आपको शाम से रात तक दिखाई ही न देंगे.. चुनाव आते ही मियां भाई से जोड़कर कोई प्रोग्राम बनाया जाता है जिसमें मुस्लिम बस्तियों में रिपोर्टर को भेजा जाता है या रैलियों में लाइव.. बहुत हुआ तो ट्रेन, प्लेन, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट के उद्धाटन में..

अपनी बीट के बड़े नेता या मंत्री का इंटरव्यू लाइन अप करने की ज़िम्मेदारी रिपोर्टर की, इंटरव्यू करेगा एंकर.. किसी चैनल में कहीं कॉनक्लेव हो गया तो रिपोर्टर या ब्यूरो चीफ की जैसे बिटिया की शादी हो वैसा प्रेशर.. सारे गेस्ट लाने, छोड़ने की ज़िम्मेदारी में वो होटल के एसी में भी पसीने से तर रहता है.. क्या मजाल कि वो स्टेज पर एक इंटरव्यू कर ले..

चैनलों की पहचान से रिपोर्टर गायब कर दिए गए इसलिए सरकार विरोधी लोगों का गुस्सा माइक और लोगों देखकर उतरता है.. लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं और रिपोर्टर को मारना तो सबसे आसान है.. उसके पास बस माइक ही तो है.. मारो.. मार के तुम्हें कुछ मिल जाएगा तो मारो.. रिपोर्टर वैसे ही थोड़ा-थोड़ा रोज मर रहा है.. हर चैनल का मर रहा है, जिसे आप गोदी मीडिया कहते हो वो भी और जिसे नहीं कहते उस चैनल का भी..

हर चैनल में छंटनी में सबसे ज्यादा रिपोर्टर पर गाज गिरती है.. रिपोर्टर अब सिर्फ नौकरी कर रहा है.. परिवार चलाने के लिए ज्यादातर.. और अब कोई पूछे तो रिपोर्टर कह सकते है कि वो सरकार के खिलाफ होने वाले विरोध प्रदर्शन में, विपक्षी पार्टियों की रैलियों में पीटे जाते हैं और गरियाए जाते हैं.. कभी पुलिस पीटती है कभी पब्लिक.. कभी आंदोलनों में घुसे गुंडे पीटते हैं कभी बाहुबली.. क्योंकि सरकार के पक्ष वाले सारे कार्यक्रमों में तो एंकर जाते हैं वहां किस बात का गुस्सा, वहां तो तुम मुझे पंत कहो मैं तुम्हें निराला..

एक लोकोक्ति है.. “मजा मारे गाजी मियां, धक्का खाएं मुजावर“

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1 Comment

1 Comment

  1. Neha Sharma

    July 24, 2026 at 3:52 pm

    बेहद सोचने पर मजबूर करने वाला लेख। ग्राउंड रिपोर्टिंग ही पत्रकारिता की असली ताकत है, लेकिन आज रिपोर्टर्स की भूमिका लगातार सीमित होती जा रही है। रिपोर्टर्स की मेहनत और संघर्ष को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। #Journalism #GroundReporting

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