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हिंदी साहित्यकारों का अब हथियार व्यापारी करेंगे सम्मान!

राजू बुंदेली-

लुटियंस दिल्ली के झाड़-फानूस वाले हॉल में घोषणा हुई कि अब हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और कलाओं के लिए करोड़ों के सम्मान बांटे जाएंगे। घोषणा करने वाले हैं वही शख्स जिनकी पहचान कभी कारोबारी, कभी दलाल, कभी ‘ग्लोबल टेलीकॉम सम्राट’, कभी मालदीव एयरपोर्ट के ठेकेदार और कभी रक्षा सौदों के काले अध्याय से होती रही है—डॉ. अभिषेक वर्मा।

अपने परिवार के साथ अभिषेक वर्मा
मौकापरस्ती या व्यावहारिकता

सोचिए, श्रीकांत वर्मा जैसे प्रख्यात कवि, पत्रकार और राजनेता, जिनकी जयंती पर यह ऐलान हुआ, उनके नाम का पुरस्कार अब उन्हीं के पुत्र देंगे। पिता कवि थे, कलम से राजनीति को दिशा दी। बेटा व्यापार, सौदों और समझौतों से राजनीति की दिशा बदलना चाहता है।

अभिषेक वर्मा के पिता श्रीकांत वर्मा पहले पत्रकार रहे। इंदिरा गांधी ने उन्हें कांग्रेस में बुलाकर 1976 में संसद का सदस्य बनाया। 80 के दशक में वे कांग्रेस के आधिकारिक प्रवक्ता और बाद में महासचिव बने। रोज़ाना पत्रकारों से भिड़ते, नीतियाँ गढ़ते और राजीव गांधी के सबसे नज़दीकी सलाहकार माने जाते। यही माहौल था जिसमें बचपन से अभिषेक ने मीडिया और राजनीति के खेल को नज़दीक से देखा। लेकिन 1986 में कैंसर से लड़ते हुए न्यूयॉर्क के स्लोन केटरिंग अस्पताल में श्रीकांत वर्मा का निधन हो गया।

इस परिवार की राजनीति में गहरी जड़ें रही हैं। श्रीकांत वर्मा की माता समान संरक्षक मिनीमाता 1950 से 24 साल तक सांसद रहीं, जब तक एक विमान हादसे ने उन्हें हमसे छीन न लिया। अभिषेक की माँ, वीणा वर्मा, भी 14 साल तक संसद में रहीं और कांग्रेस पार्टी की महिला शाखा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहीं। यानी राजनीति और सत्ता इस घर की विरासत रही है।

अभिषेक वर्मा को 1997 में भारत का सबसे युवा अरबपति घोषित किया गया था। कारोबारी, टेलीकॉम और वैश्विक नेटवर्किंग में उनका नाम गूंजता रहा। आज उनकी अगली पीढ़ी— निकोल वर्मा और अदितेश्वर वर्मा—भी इसी “परिवार की गौरवशाली परंपरा” को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जता रही है।

अब व्यंग्य यही है कि साहित्यकारों का सम्मान होगा उस व्यक्ति के हाथों, जो कभी चार्टर्ड फ्लाइट से रूस से माल लाता था, तो कभी चीन से अरबों डॉलर का टेलीकॉम सौदा करता था। 2004 में BSNL के लिए “नेटटीवी” लाने का करार किया, 2011 में बहुराष्ट्रीय FMCG ब्रांड ओलियालिया वर्ल्ड के चीफ़ इवैंजेलिस्ट बने और 2017 में मालदीव सरकार से 500 मिलियन डॉलर का एयरपोर्ट बनाने और पचास साल तक उसका मालिकाना रखने का ठेका हासिल किया। जब मालदीव में राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद संग तस्वीरें छपीं, तो अख़बारनवीसों पर मुकदमे की धमकी दे डाली। और जब संसद में आरोप लगे कि किसी रक्षा सौदे में दो सौ मिलियन डॉलर की दलाली खा गए—तो अदालत में जा खड़े हुए। अब वही कह रहे हैं—“हम हिंदी साहित्य को 21 लाख देंगे।”

हरिशंकर परसाई होते तो जरूर कहते—“अरे भाई, ये सम्मान नहीं, साहित्यकारों के सामने नोटों की गठरी हिलाने का तमाशा है।अब 21 लाख का चारा डाला गया है—तो देखना है कौन इस खूँटे से बंधता है।”

ज्ञानपीठ के बाद हिंदी पट्टी में सबसे बड़ा पुरस्कार होगा—यह दावा भी किया गया। पर सवाल है कि जो परिवार राजनीति में आधी सदी तक सत्ता-संघर्ष का अंग रहा, और जिसका वारिस कभी लंदन-मोनाको की हवेलियों में देखा जाता है, वही अब हिंदी साहित्य का ठेकेदार बनेगा ?

और यह वारिस कौन है? वही, जिसकी मित्र सूची में हैं ऑस्कर विजेता चार्लीज़ थेरॉन, मिस यूनिवर्स की रनर-अप एवलिना, मिस यूके हेलेन, प्लेबॉय सेंटरफोल्ड, एयरलाइन की सुंदरी, टीवी होस्ट और हमारी अपनी अभिनेत्री नगमा। वही, जिसकी दोस्ती वरुण गांधी संग तब सुर्खियों में आई जब प्रशांत भूषण ने यूरोपीय मित्रांगनाओं संग उनकी तस्वीरें मीडिया में परोस दीं। दोनों बोले—“फोटो मॉर्फ्ड हैं।” जनता बोली—“वाह री राजनीति, जिसमें फोटोशॉप भी सच्चाई से ज़्यादा असली लगती है।”

और अब देखिए नया चमत्कार। 30 जनवरी 2025 को साहब को मुंबई में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने शिवसेना (एनडीए) का मुख्य राष्ट्रीय संयोजक (गठबंधन व चुनाव) नियुक्त कर दिया। यानी कल तक जो पेज-3 पार्टियों में मॉडल्स के साथ थे, आज राम-नाम की पताका तले हिंदुत्व की सभाओं में प्रवचन देते दिख रहे हैं। परसाई होते तो जरूर चुटकी लेते—“ये वही लोग हैं जो रात को यूरोपियन मॉडल संग वाइन पीते हैं और सुबह भगवा ओढ़कर मंच से कहते हैं—भारत माता की जय।”

दरअसल, यह वही परिदृश्य है जब साहित्यकार मंच पर सम्मान लेने जाएंगे और पीछे से जनता फुसफुसाएगी—“वाह! हिंदी के कबीर और तुलसी का अब उत्थान दलालों की जेब से होगा, और सम्मान के चेक उसी हाथ से निकलेंगे जो कभी स्कॉर्पीन डील पर हस्ताक्षर करता था, ओलियालिया की चॉकलेट बेचता था और अब शिवसेना के झंडे तले आरती उतारता है।”

और व्यंग्य की धार यहीं तेज होती है—क्योंकि यह सुविधा मात्र सत्ता-समर्थक और वैचारिक रूप से कमजोर व्यक्ति को ही मिल सकती है। सुना तो यह भी है कि इस कार्यक्रम में बड़े-बड़े लोग मंच की शोभा बढ़ा रहे थे। इसलिए मुझे वे वैचारिक रूप से विकलांग लोग—जिन्हें हम अंधभक्त भी कहते हैं—सबसे बुरे लगते हैं, चाहे इस तरफ के हों या उस तरफ के। सबके अपने एजेंडे हैं, सबको किसी की नज़र में आना है, सबको सुविधाएँ चाहिए।

पर याद रखिए, हिंदी मैया की नाव पहले भी कबीर, तुलसी, सूर, निराला,मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन और शमशेर जैसे फक्कड़ कवि और साहित्यकारों के भरोसे चली है। उम्मीद है भविष्य में भी वही आपकी पहचान रहेंगे।

“साहित्यकार अब सोचें—सम्मान लेंगे या आत्मसम्मान बचाएँगे?”

मुझे क्षमा करना कवि मेरे!
मैं अब अलका जा न सकूँगा।
मुझे समय ने याद किया है
मैं ख़ुद को बहला न सकूँगा।
जब अँकुआए धान,
किसी कजरी में तुम मुझको पा लेना।
मैं हूँ नहीं कृतघ्न मुझे तुम शाप न देना!
मैं आसाढ़ का पहला बादल
शताब्दियों के अंतराल में घूम रहा हूँ।
बार-बार सूखी धरती का रूखा मस्तक चूम रहा हूँ।

  • श्रीकांत वर्मा

और हाँ, एक विनम्र आग्रह—मुझे दाएँ या बाएँ किसी खेमे में मत रखिए। मैं वैचारिक गुलाम नहीं हूँ। जो लिख रहा हूँ, वह एक आम आदमी की अभिव्यक्ति है—अपनी भाषा और अपने साहित्य के भविष्य की रक्षा के लिए।

कभी श्रीकांत वर्मा ने ही कहा था —

कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता,
कोसल में विचारों की कमी है!

और मुझे भी डर लग रहा है कि कहीं हिंदी समाज कोसल ना हो जा जाए!


उपरोक्त आर्टकिल पर अभिषेक वर्मा की तरफ़ से भेजे गए लीगल नोटिस का कंटेंट यूँ है-

डॉ. अभिषेक वर्मा की छवि धूमिल करने की साजिश, प्रकाशित लेख को बताया झूठा और दुर्भावनापूर्ण

लीगल नोटिस में कहा गया कि भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित लेख पूरी तरह भ्रामक, आधारहीन और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला है

नई दिल्ली। 26 सितंबर 2025 को भेजे गए लीगल नोटिस में नोटिस भेजने वाले पक्ष ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उनके मुवक्किल डॉ. अभिषेक वर्मा एक प्रतिष्ठित सार्वजनिक व्यक्तित्व हैं, जिनकी छवि वर्षों की मेहनत, ईमानदारी और सामाजिक योगदान से बनी है, जबकि वेबसाइट भड़ास4मीडिया पर 20 सितंबर 2025 को प्रकाशित लेख में उनके खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह झूठे, मनगढ़ंत और दुर्भावनापूर्ण हैं। 

नोटिस के अनुसार डॉ. वर्मा न केवल एक सम्मानित परिवार से आते हैं बल्कि उनके पिता भी साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में जाने-माने व्यक्तित्व रहे हैं, और स्वयं डॉ. वर्मा ने भी सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक कार्यों में सक्रिय योगदान दिया है, जिससे उनकी समाज में एक सकारात्मक और प्रभावशाली छवि बनी है।

नोटिस में कहा गया है कि संबंधित वेबसाइट पर प्रकाशित लेख में उन्हें “ब्रोकर” और “फिक्सर” जैसे शब्दों से संबोधित करना न केवल आपत्तिजनक है बल्कि यह पूरी तरह आधारहीन आरोप हैं, जिनका कोई तथ्यात्मक या न्यायिक आधार नहीं है, और यह केवल अटकलों और कल्पनाओं पर आधारित हैं।

इसके साथ ही यह भी उल्लेख किया गया है कि स्कॉर्पीन सबमरीन सौदे से जुड़े आरोपों के संदर्भ में दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि किसी भी प्रकार के “किकबैक” का कोई प्रमाण नहीं मिला है, ऐसे में डॉ. वर्मा को इस प्रकार के मामलों से जोड़ना गलत, भ्रामक और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला है।

नोटिस भेजने वाले पक्ष का कहना है कि उक्त लेख और उसमें प्रयुक्त भाषा ने डॉ. वर्मा की सामाजिक और पेशेवर छवि को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे उन्हें मानसिक, सामाजिक और व्यावसायिक नुकसान हुआ है और लोगों के बीच उनकी छवि को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हुई है।

नोटिस में यह भी कहा गया है कि एक जिम्मेदार मीडिया प्लेटफॉर्म होने के नाते संबंधित वेबसाइट की यह जिम्मेदारी थी कि वह तथ्यों का सत्यापन करती, लेकिन बिना किसी जांच के इस प्रकार की सामग्री प्रकाशित करना लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैया दर्शाता है।

नोटिस में आगे आरोप लगाया गया है कि यह लेख जानबूझकर दुर्भावना के साथ प्रकाशित किया गया है ताकि डॉ. वर्मा की छवि को धूमिल किया जा सके और जनता के बीच उनके प्रति नकारात्मक धारणा बनाई जा सके।

इसी के साथ नोटिस में मांग की गई है कि संबंधित लेख को तत्काल हटाया जाए, सार्वजनिक रूप से माफी प्रकाशित की जाए, और भविष्य में इस तरह की सामग्री प्रकाशित न करने का आश्वासन दिया जाए, अन्यथा कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

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