सत्येंद्र पीएस-
अभी रात 10:20 बजे हादसे का शिकार होते-होते बचा। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन 10 बजे पहुँच गया। सोचा कि कुछ खाएंगे स्टेशन पर ही। यहां स्टेशन पर 10 साल पहले बहुत बढ़िया जन आहार केंद्र था जहां सस्ता और साफ सुथरा खाना मिला करता था। वह लंबे समय से बन्द है। उसके अलावा भी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर खाने का कोई ठिकाना नहीं मिला।
वक्त पर्याप्त था तो पहाड़गंज साइड में बाहर निकल गया खाने। मेन रोड पर पहुंचते ही होटल वाले पकड़ पकड़कर खाने के लिए रोकने लगे। तब तक कूड़ा लिए हुए एक लड़का मुझे धक्का मारकर निकलने लगा। दुकान वाले ने डांटा कि कहां ऊपर चढ़ा आ रहा है?
दुकान वाला मुझसे बोला कि मोबाइल तो नहीं रखे थे जेब में? मेरा हाथ जेब पर गया, मोबाइल गायब था! उस कूड़े वाले को दौड़ाकर पकड़ा। दुकानदार चिल्लाने लगा कि मोबाइल चुराया है, दे मोबाइल।
वह चोर भी बड़े कांफिडेंस से मेरे ऊपर चिल्लाया की चेक कर लो, कॉलर कैसे पकड़ लिया? उसको वहां खड़े लोग चेक करने लगे। वह कॉलर छुड़ाने की कोशिश में रहा कि चेक कर लो, कॉलर क्यों पकड़ रख़ी है।
महज 50 कदम पीसीआर वाली गाड़ी खड़ी थी। वह गाड़ी में बैठे तमाशा देख रहे थे। मैंने एक हाथ से कॉलर पकड़े हुए पुलिस वालों को बुलाया, लेकिन वो नजदीक नहीं आए।
मैंने कूड़े वाले का कूड़ा पलटवाया। उसमें से मोबाइल मिल गया। उसको मैंने मुंह पर 3-4 घूंसे ताबड़तोड़ जड़ दिए। वह कूड़ेवाला कहने लगा कि मिल गया मोबाइल, अब मार क्यों रहे हो? मैं नशा किए हुए हूँ।
उसको जब मैं पीट रहा था, Delhi Police की मोबाइल वैन आगे बढ़ गई। दुकान वालों ने मुझसे कहा कि कोई फायदा नहीं है इसे मारने पीटने का। इन सबों को कुछ असर ही नहीं होता। आपके हाथ में जरूर चोट लगेगी। कई होते तो आपको चाकू भी मार सकते थे।
मैंने भी फील किया कि 4 घूसे मारने में ही मेरी उंगलियों में दर्द हो रहा था। जिस दुकानदार ने मेरा मोबाइल चोरी बताकर मोबाइल बचाया, उसी के यहां 120 रुपये में खाना खाया। डर, निराशा, गुस्से से देह कांप रही थी। खाना खाकर निकला तो दुकानदार ने हिदायत दी कि बचकर जाइयेगा। शायद उसे आशंका थी कि ग्रुप में आकर सब हमला न कर दें। आगे बढ़ा तो पर्यटन पुलिस का चमकता बूथ था। वहां में आआई हेल्प यू, मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ वगैरा लिखा था।
मेरे साथी पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस इसी नई दिल्ली लखनऊ एसी एक्सप्रेस में यात्रा कर रहे हैं। यह सब कांड होने के बाद मैं फिर स्टेशन पहुँचा तो ट्रेन प्लेटफार्म 9 पर लग गई थी। सिद्धार्थ जी A2 में नम्बर सीट पर थे और मैं B7 में।
अभी पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर रहा हूँ। थोड़ा नॉर्मल भी फील कर रहा हूँ। और सोच रहा हूँ कि हम कहां से कहां आ गए हैं, किस गर्त में जा रहे हैं।
ऊपर फोटो उसी दुकान की है जहां हादसा हुआ। लाइटिंग से चमकते नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बोर्ड के सामने। सड़क पार, मेन रोड पर ही। इसी तरह हमारे ऑफिस के सामने आईटीओ मेट्रो के गेट नम्बर 4 के सामने छिनैती केंद्र है। दिल्ली पुलिस मुख्यालय के ठीक पीछे।
अभी हाल में टाइम्स ऑफ इंडिया के सांध्य टाइम्स के एक पत्रकार का मोबाइल छिन गया। मन में आया कि एक पोस्टर चस्पा कर दे… छिनैती बहुल क्षेत्र…सावधान रहें। अब फील हो रहा है कि हम कहीं भी सेफ नहीं हैं। दिल्ली पुलिस का मुख्य काम चालान काटना है।
हम लोग 18 साल से आईटीओ जाते हैं, चौराहे से राजघाट की तरफ जैसे मुड़ते हैं, हरी से पटाक से लाल बत्ती हो जाती है और 4/5 जवान गाड़ी के सामने कूद पड़ते हैं चालान काटने। हम लोग रोज ही यह तमाशा देखते हैं तब भी कभी-कभी फंस जाते हैं लाल बत्ती के ट्रैप में! लेकिन अमित शाह जी की कृपा से कभी चालान नहीं हुआ। वरना पुलिस के लोग इतने अलर्ट हैं कि अगर आपने हेलमेट नहीं लगाया है तो आपकी जान बचाने के लिए लाठी मारकर आपका सर तोड़ देंगे।
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