
मजीठिया वेज बोर्ड के खौफ से भास्कर ग्रुप की कंपनी डीबी कार्प में मांगा जा रहा है जबरन रिजाइन…. “डीबी कॅार्प” द्वारा संचालित मराठी दैनिक ‘दिव्य मराठी’ के नासिक संस्करण से बेहद परेशान करने वाली खबर आ रही है। यहां मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर खौफ खाये प्रबंधन अपने कर्मचारियों से जबरन रिजाइन लिखवा रहा है। पेज मेकर के तौर पर कार्य कर रहे प्रशांत रघुनाथ बोडाके ने प्रबंधन के रवैये से तंग आकर बीती रात आफिस के कैंपस में ही आत्महत्या का प्रयास किया।
प्रशांत की परेशानी यह थी कि पिछले कुछ दिनों से एचआर मैनेजर की ओर से उन पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया जा रहा था। आखिर प्रशांत ने तंग आकर कल रात में नींद की कई गोलियां खाकर अपने प्राण त्याग देने की कोशिश की, जिसके चलते उन्हें नासिक के साई केनकर अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा है। कुछ साथियो ने ये सूचना भेजी है कि प्रशांत की हालत स्थिर बनी हुई है… प्रार्थना करें कि प्रशांत जल्दी से जल्दी स्वस्थ हो जाएं।
आपको बताना जरूरी है कि ”भास्कर” प्रबंधन द्वारा अन्य संस्करणों के भी कर्मचारियों से इस्तीफे लेने का प्रयास जारी है। नासिक के अलावा औरंगाबाद, भोपाल से भी कुछ साथियों ने फोन कर बताया कि भास्कर प्रबंधन उनसे जबरन रिजाइन लिखवा रहा है। फिलहाल सभी पत्रकारों से निवेदन है वे त्यागपत्र न दें, आत्महत्या न करें और कामगार आयुक्त कार्यालय को प्रताड़ना की सूचना लिखित रूप से दें।
शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335
1 Comment
Leave a Reply
Cancel reply
Leave a Reply
भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team
भड़ास मेल: [email protected]
Latest 100 भड़ास
- जब कोई बड़ा उद्योगपति अरबों रुपये का कर्ज ले और दायें-बायें करके पूरे पैसे कहीं और उड़ा दे तो इस देश की महान न्याय व्यवस्था एक सुरक्षित छतरी देती है!
- कर्ज माफी का असली सिनेमा चंद्रा ब्रो के प्लान में है!
- नये भारत में मोदीजी ने एक नया सैलून खोला है जिसमें देश के खरबपतियों का हेयर कट होता है!
- न्यूज़24 छोड़ने वाली गरिमा सिंह ने अपना यूट्यूब चैनल लांच किया!
- सुभाष चंद्रा की लोन माफी ही BJP का असली ‘सबका साथ, सबका विकास’ योजना है!
- दूरदर्शन पर खुलेआम नफरत फैला रहे हैं कंगना रनौत और सुधीर चौधरी, देखें वीडियो
- न्यूज़24 MPCG तो दूसरे चैनल के रिपोर्टर की खबर अपने चैनल पर चला रहा है!
- आज के अखबार : प्रधानमंत्री बच्चों को रिझाने के अभियान पर और CJI छवि बचाने की कोशिश में
- हमारी सरकारों और मीडिया ने असली भारत की जो तस्वीरें छिपा रखी थीं, वह अमेरिकी अखबार WSJ ने छापी है!
- शब्दचर्चा (96) : Gen ALPHA का उच्चारण जेन अल्फ़ा नहीं है!
- कमला पसंद ग्रुप और एमएलसी वागीश पाठक पर कोबरा पोस्ट की पड़ताल : ‘गुटखा काउंसिलर’
- जी मीडिया समूह के मुखिया का कर्ज माफ होने पर विजय माल्या का ट्वीट- ‘मेरे दोस्त सुभाष को बधाई’
- फर्स्टपोस्ट से अनुजा पाराशर और नेटवर्क18 से दीपिका कपूर के बारे में सूचनाएं!
- सुभाष चंद्रा का 22 हजार करोड़ का कर्ज 6.5 करोड़ रुपये में रफा-दफा, बैंक झेलेंगे 99.9% नुकसान!
- टाइम्स ऑफ इंडिया से प्रतीक रक्षित और पीआईबी से प्रियांशी रस्तोगी की नई पारी!
- प्रभात खबर के देवघर संस्करण ने रचा इतिहास, 160 पेज का निकाला विशेष परिशिष्ट!
- यूपी टी-20 लीग सीजन-4 के लखनऊ चरण का समापन, बेल बजाकर डॉ. चंद्रसेन वर्मा ने किया शुभारंभ
- नीम करौली बाबा पर बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ की स्पेशल स्क्रीनिंग में भारत एक्सप्रेस के CMD उपेन्द्र राय ने की शिरकत!
- आज के अखबार : दिल्ली-जयपुर सड़क गुड़गांव में धंस गई, सिर्फ दैनिक भास्कर और TOI ने पहले पन्ने पर छापा
- धामी सरकार का ‘चौथा स्तंभ’ वाला खेल: अनजान-से अखबार को 10 लाख का विज्ञापन!
- तरुण तेजपाल को दुनिया का दुर्दांत बलात्कारी बनाए जाने का अभियान चल रहा है!
- गीता-संजय चोपड़ा हत्याकांड पर 48 साल बाद बनी वेब सिरीज ‘राख’ ने उस पुराने जख्म को फिर हरा कर दिया है!
- बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट- मोबाइल उत्पादन में सरकार लक्ष्य से पाँच साल पीछे!
- शोर, सनसनी और चीखते एंकरों ने टीवी न्यूज को बनाया ‘अनवॉचेबल’: माया शर्मा
- नेपाली छात्र छात्राओं का पत्रकारिता से मोहभंग क्यों हो रहा है?
- सम्राट चौधरी के कार्यक्रम का पास न मिलने पर पत्रकारों ने माइक डाउन कर जताया विरोध!
- वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ला ‘ज्ञानू’ का लखनऊ पीजीआई में निधन!
- जी मीडिया से अमन उपाध्याय की नई पारी, इजाज खान ने हिंदुस्तान टाइम्स छोड़ा
- ‘न्यूज़24’ समूह और गुजरात की मीडिया कंपनी ‘संदेश’ से दो बड़ी सूचनाएं!
- कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर फिर धंसी सड़क, अंडरपास के पास बना 10 फीट गहरा गड्ढा!
- वरिष्ठ पत्रकार महेश झालानी को गैर कानूनी रूप से रोकी गई सम्मान निधि राशि देने का आदेश जारी
- प्रधानमंत्री तक पहुंची कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के पूर्व कुलपति सच्चिदानंद जोशी की शिकायत!
- यूपी में मंत्रियों के बच्चे कहां पढ़ते हैं, दैनिक भास्कर ने ये खबर भी छापकर हटा दी!
- मेरी पत्रकारिता यात्रा (11): अगले दिन राजेंद्र जी ने अपने कक्ष में तलब कर मुझसे कहा कि आपने सोम डिस्टीलरी वाली खबर छापकर अखबार का बड़ा नुकसान कर दिया है!
- आज के अखबार : महंगी चीनी का मामला मौसम का हाल बताने में रह गया, फिर भी खबरें दबा-छिपा दी गईं
- पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को गिरफ्तार न करने का यूपी पुलिस को सुप्रीम आदेश
- सेना के जवान अपनी समस्या लेकर आए तो ग़ाज़ीपुर के एसपी सिटी राकेश मिश्रा ‘तूफ़ान’ ने क्या किया? पढ़िए
- आईबीसी 24 डिजिटल से शाहनवाज सादिक का इस्तीफा, इस चैनल में जाएंगे
- युवा पत्रकार शब्बीर आलम और रितिका पात्रा की इंडिया न्यूज़ राजस्थान से नई पारी
- डिजिटल हिंदी मीडिया में लाइव हिंदुस्तान का बड़ा उछाल, शीर्ष 5 मीडिया घरानों की स्थिति देखिए!
- मुजफ्फरनगर में शाहनवाज राणा के ठिकानों पर ED की छापेमारी, 2 करोड़ कैश बरामदगी का दावा, मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 9 ठिकानों पर कार्रवाई
- दूरदर्शन पर महंत राजू दास से माँ-बहन की गाली सुनिए!
- तो “मनमौजी ट्रंप” की वजह से मोदीजी ने पत्रकारों के सवाल अनसुने किए थे!
- नेहा का जादू नौजवानों के सिर चढ़कर बोल रहा है!
- मोदी सत्ता के बाद दुनिया भर के नेता जो खुलासे करेंगे, उसकी चोट भारत की साख को लगेगी
- रामलला के दर्शन में रिश्वत लेने वाले स्टिंग की खबर दैनिक भास्कर की वेबसाइट से गायब!
- BBC News मराठी से इस पद पर जुड़ीं पत्रकार सई सिमरन!
- दैनिक जागरण में स्कूटी लाइसेंस पर छपी ये खबर तो एक दूसरे का ही खंडन कर रही है!
- क्या अर्नब और रिपब्लिक अमेरिकी विदेश मंत्री द्वारा भारतीय न्यूज़ चैनलों का मजाक उड़ाने की ठोस वजह हैं?
- रात होते होते भारतीय न्यूज़ चैनलों का पागलपन बढ़ता जाता है- अमेरिकी विदेश मंत्री
- मेरी पत्रकारिता यात्रा (10) : एक अजन्मे अखबार में संक्षिप्त पारी…
- सहारा PF घोटाला: ओपी श्रीवास्तव, जेबी राय, करुणेश अवस्थी, अनिल पांडेय, राना जिया, जिया कादरी के खिलाफ लखनऊ में मुकदमा, देखें FIR
- लखनऊ में AI से महिला की अश्लील तस्वीरें शेयर कर 10 लाख की रंगदारी मांगते धरे गए पत्रकार!
- राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार महेश झालानी की सम्मान निधि मामले ने लिया कानूनी मोड़
- सुदर्शन न्यूज़ से अलग हुईं एंकर शिवांगी जैन!
- टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप और नेटवर्क18 समूह के कर्मचारियों के लिए दो बड़ी सूचनाएं
- एचटी और TOI के बाद दैनिक भास्कर ने भी राहुल गांधी पर स्याही खर्चने में कंजूसी दिखाई है!
- पत्रकार से विधायक बने उमेश कुमार के बेटे की मीडिया में धमाकेदार एंट्री, 8 राज्यों में 3000 रिपोर्टर्स का नेटवर्क खड़ा करने का दावा
- राहुल गांधी के कार्यक्रम में मुस्लिम लड़कियाँ भी मौजूद थीं, जिनकी मज़हब सम्बंधी समस्याओं को छुआ तक नहीं गया
- इंटरव्यू (पार्ट-2) : अफसरों को ट्रेनिंग देने वाले फारेंसिक जर्नलिस्ट इंद्रजीत राय की ये बातें अपराधी, मीडियाकर्मी और स्मार्टफोन धारक ध्यान से सुन लें!
- हापुड़ की BSA दीपा भाटी ने यूट्यूबरों के स्कूल में घुसने पर लगाई रोक, देखें आदेश
- दैनिक जागरण समूह में प्रोड्यूसर के पद पर वैकेंसी!
- एनडीटीवी में केतन दीक्षित की नियुक्ति, गौरवी ने छोड़ा टाइम्स इंटरनेट
- मोदी सरकार के निजीकरण और अब मुनाफे की अंधी दौड़ ने ISRO की जड़ों को खोखला करना शुरू कर दिया है!
- टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स ने राहुल के कार्यक्रम का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया!
- वाराणसी से प्रकाशित होगा लोकसत्य दैनिक, विभूति नारायण चतुर्वेदी को जिम्मेदारी!
- राहुल गांधी का पुणे में हुआ ‘छात्रों की गूंज’ आंखें खोल देने वाला कार्यक्रम था!
- राहुल के पुणे कार्यक्रम में मैंने लड़की से गाली तो खाई लेकिन इतनी तेजी से फैक्ट चेक होता देखकर अच्छा लगा!
- विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने किया ‘राष्ट्रगान’ का अपमान, वीडियो देखें
- यूट्यूब पर अजीत अंजुम की बड़ी छलांग, हासिल की पहली रैंक!
- अब फर्स्ट इंडिया राजस्थान में भी छंटनी का दौर शुरू, 15 कर्मचारी हटाए गए
- इटावा के कौन पत्रकार हैं जिनपर ARTO आरोप लगा रही हैं, एक की पहचान भी कर ली है!
- सतीश महाना या विधानसभा के अफसरों, कर्मियों के बारे में भ्रामक, असत्य, आपत्तिजनक पोस्ट करने पर हो सकती है FIR, देखें पत्र
- इंडिया टुडे ग्रुप का ‘पॉल्यूशन का सॉल्यूशन’ अभियान, विजेता को मिलेंगे 50 लाख रुपये
- राजस्थान के स्कूल में कॉकरोच न जाते तो सरकार मानती ही नहीं कि 611 स्कूलों में छत नहीं है!
- कुछ लोग आईपीएस तो बन जाते हैं लेकिन उनमें फ़ील्ड पोस्टिंग वाला गुण नहीं होता!
- टाइम्स ऑफ इंडिया की तरफ से NBDA बोर्ड में रोहित गोपाकुमार की जगह लेंगी रचना बर्मन!
- ABP न्यूज़ के पत्रकार ने भजन सरकार की शिक्षा व्यवस्था की पूरी कलई खोल दी, देखें वीडियो
- सहारा की जमीन बिक्री में 72.82 करोड़ का खेल, EOW ने सुब्रत रॉय के बेटे समेत तीन पर दर्ज की FIR
- आज के अखबार : राहुल गांधी पहले पन्ने पर, जो खबरें छूटीं उनमें सीजेपी पर हमला और राष्ट्रपति भवन भी है
- अर्नब जैसे बड़बोले दरबारी ही मोदी की असली परेशानी हैं- प्रशांत टंडन
- बाबा रामदेव पर बीजेपी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह का तीखा हमला, देखें वीडियो
- पत्रकार तरुण तेजपाल ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती!
- वरिष्ठ पत्रकार और लेखक भाषा सिंह को मिला कीर्ति सम्मान!
- इंडिया टुडे से शिवांशी शुक्ला की नई पारी, दैनिक भास्कर में अमित कुमार सिंह की नियुक्ति
- हिंदी दैनिक अमर उजाला को उप-संपादकों की जरूरत!
- भारत 4,000 करोड़ रुपये का नुकसान झेलकर 10 लाख टन चीनी विदेशों से खरीदेगा!
- आज के अखबार : दिल्ली की पुलिसिया बर्बरता ‘जांच’ के ठंडे बस्ते में, रांची की ‘कामयाबी’ पर अदालती स्टे
- तहलका ग्रुप के मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ ब्यूरो चीफ बने संजीव आचार्य
- MIB का निजी टीवी चैनलों को निर्देश, हर कार्यक्रम में दिखाना होगा एंटी-ड्रग डिस्क्लेमर!
- यूपी के 75 जिलों के DM-SSP के सरकारी नंबरों पर की गई दैनिक भास्कर की ये पड़ताल पढ़िए!
- CJP के प्रवक्ता का नाम सौरव दास नहीं, सौरभ दास है!
- सुधीर चौधरी के शो ‘Decode’ में इन पदों पर वैकेंसी
- एबीपी न्यूज़ से काव्या खंडेलवाल और जागरण डिजिटल से संदीप सिंह के बारे में सूचनाएं!
- लखनऊ दिव्या मिश्रा हत्याकांड के आरोपी ने प्रज्ञा और भरत पर भी लगाए थे आरोप, देखें व्हाट्सएप स्टेटस!
- राम मंदिर निर्माण को लेकर चंपत राय के 33 दावे, नृपेंद्र मिश्रा पर दागे सवाल; बोले- ‘हर फैसले में चलाई मर्जी’
- वाह मोदीजी वाह… 30 लाख टन चीनी के गन्ने से एथनॉल बना दिया!
- शिशिर अवस्थी ‘सच बेधड़क’ में संभालेंगे कार्यकारी निदेशक की कमान!
- चीनी महँगी, एथनॉल सस्ता… विकास का नया घोल!
- चीन के सहाराश्री ‘हुई का यान’ को उम्रकैद!



aaaaaa
July 8, 2016 at 7:10 am
हमारे गांवों में एक कहावत है कि हर बहे से खर खाए बकरी अँचार खाए अर्थात जो बैल हल में जुते उसके हिस्से घास-भूसा और जो बकरी बैठी-बैठी में-में करती रहे उसके भोजन में स्वादिष्ट अचार.खैर,बैलों द्वारा खेती तो बंद हो गयी लेकिन इस कहावत में जो व्यंग्य छिपा हुआ था आज भी अपनी जगह सत्य है और सिर्फ गांवों ही नहीं बल्कि शहरों के लिए भी उतना ही सत्य है.अब समाचारों की दुनिया को ही लें कोल्हू के बैल की तरह;खासतौर पर निचले स्तर के मीडियाकर्मी दिन-रात खटते रहते हैं और महीने के अंत में जब पैसा हाथ में आता है तो इतना भी नहीं होता कि जिससे उनका और उनके परिवार का १० दिन का खर्च भी निकल सके.ऐसा भी नहीं है कि उनकी नियोक्ता मीडिया कम्पनियाँ ऐसा मजबूरी में करती हैं बल्कि अगर हम उनकी सालाना बैलेंस शीट को देखें तो पाएँगे कि वे तो हर साल भारी लाभ में होती हैं.हाँ,यह बात अलग है कि अकूत धन के ढेर पर बैठा उसका मालिक पूरे लाभ को अकेले ही हजम कर जाना चाहता है और चाहता क्या है वह बाजाप्ता ऐसा कर भी रहा है.इस तरह भारतीय मीडिया उद्योग में कमाएगा लंगोटीवाला और खाएगा धोतीवाला वाली कहावत बड़े ही मजे में चरितार्थ हो रही है.
मित्रों,हमारे पूर्वज राजनीतिज्ञों ने,जिनमें से अधिकतर कभी-न-कभी पत्रकार भी रह चुके थे;आनेवाले समय में हृदयहीन पूँजी के हाथों पत्रकारों की संभावित दुर्गति को अपनी दूरदृष्टि के माध्यम से साफ-साफ देख लिया था और इसलिए उन्होंने प्रेस अधिनियम द्वारा उनके हितों की रक्षा करने की कोशिश की.हालाँकि,आश्चर्यजनक रूप से इलेक्ट्रोनिक और वेब मीडिया कर्मी अभी भी इस सुरक्षा छतरी से बाहर हैं.क्यों बाहर हैं शायद सरकार को पता हो लेकिन जो इसके दायरे में आते हैं उन समाचारपत्र कर्मचारियों को भी दुर्भाग्यवश इस अति महत्वपूर्ण कानून का फायदा नहीं मिल पा रहा है.उन्हें इसके दायरे से बाहर करने के लिए कई तरह के सादे प्रपत्रों पर नियुक्ति के समय ही हस्ताक्षर करवा लिया जाता है और फिर मिल जाती है प्रबंधन को छूट उनकी रोटी के साथ खुलकर खेलने की.यानि सरकार जब तक पेड़ पर चढ़ने को तैयार होती है तब तक मीडिया कंपनियों के मालिक पात-पात को गिन आते हैं.भारत का ऐसा कोई भी कानून नहीं जिसमें कुछ-न-कुछ लूप होल्स नहीं हो,कमियाँ न हों फिर पूंजीपतियों के पास तो हमेशा उनके साथ नाभिनालबद्ध दुनिया के सबसे बेहतरीन दिमाग भी होते हैं;हर जोड़ का तोड़ निकालने के लिए.
मित्रों,सभी पत्रकार व गैर पत्रकार समाचार-पत्र कर्मियों के लिए मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को आए एक साल होने को है लेकिन कोई भी समाचार-पत्र या समाचार एजेंसी प्रबंधन के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही;ऊपर से वे मजीठिया की सिफारिशों का विरोध भी कर रहे हैं.उनमें से कुछ तो कथित न्याय की आशा में न्यायालय भी पहुँच गए परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें राहत देने से मना कर दिया और सब कुछ सरकार पर छोड़ दिया.
मित्रों,इस प्रकार इस समय जो वस्तु-स्थिति है वो यह है कि मीडिया कंपनियों के मालिक किसी भी स्थिति में अपने कर्मचारियों को मजीठिया आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वेतन बढाकर अपने मुनाफे को कम करने को तैयार नहीं हैं और वे इसके लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं.क्या वे भारतवर्ष के सारे कानूनों से परे हैं?संविधान में तो ऐसा कुछ नहीं लिखा.अभी कुछ भी दिन पहले मैंने bhadas4media पर यह समाचार देखा कि दैनिक जागरण,कानपुर ने अपने कर्मचारियों से जबरन एक प्रपत्र पर हस्ताक्षर भी करवा लिया है.उस कथित प्रपत्र पर यह लिखा हुआ है कि ”मैं जागरण की सेवाओं से संतुष्ट हूं और जागरण मेरे और मेरे परिवार के हितों की पूरी तरह सुरक्षा कर रहा है. मुझे मजीठिया आयोग की सिफारिशों के अनुरूप कोई वेतनमान नहीं चाहिए.”अब आप ही बताईए बेचारे दस्तखत नहीं करें तो करें क्या?ऐसा नहीं करने पर उन्हें बिना कोई कारण बताए बाहर का दरवाजा दिखा दिया जाएगा और यह तो आप भी जानते हैं कि तुलसीदास के ज़माने से ही ”तुलसी बुझाई एक राम घनश्याम ही ते,आगि बड़वागि ते बड़ी है आगि पेट की”.हो सकता है कि ऐसे मीडियाकर्मियों के पेट पर लात मारने का हस्ताक्षर अभियान गुप्त रूप से अन्य मीडिया कंपनियों में भी चलाया जा रहा हो.
मित्रों,जाहिर है समाज के दबे,कुचलों और पीड़ितों को न्याय दिलानेवाले मीडियाकर्मी खुद ही अन्याय के सबसे बड़े शिकार हैं.अगर उन्होंने पूर्वोक्त प्रपत्र पर हस्ताक्षर कर दिया तो फिर वे मजीठिया आयोग की सिफारिशों से कथित रूप से अपनी मर्जी से पूरी तरह से वंचित रह जाएँगे.अब यह भारत सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस आयोग की सिफारिशों को लागू कराने की दिशा में किस हद तक जाती है.कुछ इसी तरह की स्थिति १९८९ में भी बनी थी.तब भी मीडिया कम्पनियाँ बछावत आयोग की सिफारिशों को लागू करने में नानुकूर कर रही थीं लेकिन तब स्व.राजीव गाँधी की सरकार ने सख्ती बरतते हुए उन्हें बछावत आयोग की सभी सिफारिशों को लागू करने के लिए बाध्य कर दिया था.परन्तु आज स्थिति बिलकुल उलट है.आज केंद्र में अब तक की सबसे भ्रष्ट और कमजोर-कामचोर सरकार सत्ता में है.उस पर नीम पर करेला यह कि यह सरकार बाजार को ही भगवान मानते हुए सबकुछ बाजार के हवाले कर देने की सख्त हिमायती भी है.उस करेले पर चिरैता यह कि सरकार कथित कार्पोरेट संस्कृति की भी अंधसमर्थक है.फिर भी अगर सरकार ने सोडा वाटर के नशे (जोश) में आकर सख्ती बरती और मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हो भी गईं तब भी लगभग सारे कर्मियों के पल्ले कुछ नहीं पड़ने वाला क्योंकि तब तक वे बिना कोई विरोध किए एकतरफा संधि-प्रपत्र या और भी स्पष्ट रूप से कहें तो आत्मसमर्पण-पत्र अथवा सुसाईडल नोट पर हस्ताक्षर कर चुके होंगे.इसलिए अगर सरकार इस वेतन-आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना ही चाहती है और सही मायने में लागू करवाना चाहती है तो फिर उसे मीडिया कंपनियों द्वारा चलाए जा रहे हस्ताक्षर अभियान का तोड़ भी निकालना पड़ेगा.
मजीठिया आयोग की सिफारिशों का मजाक
पत्रकारों के वेतनमान को लेकर बने मजीठिया आयोग की सिफारिशों को मजाक बनाया जा रहा है. बड़े अखबारी घराने और मीडिया हाउस मजीठिया आयोग के बारे में भ्रामक जानकारियां फैला रहे हैं और उनकी सरगना संस्था इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी इस काम में उनका साथ दे रही है. मसलन अखबारों में विज्ञापन दिये जा रहे हैं कि अगर आयोग की सिफारिशें लागू हो गयीं तो चपरासी को भी चालीस हजार की तनख्वाह देनी पड़ेगी. ये अफवाहें और मजीठिया आयोग की ये सिफारिशें सिर्फ एक हजार करोड़ से ऊपर के कारोबार वाले घराने पर लागू होते हैं. मजीठिया आयोग की सिफारिशों को मजाक बनाये जाने पर आनंद प्रधान का विश्लेषण-
अख़बारों और न्यूज एजेंसियों में काम करनेवाले पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों का वेतन आदि तय करने के लिए गठित जस्टिस जी.आर मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ अखबार मालिकों ने चौतरफा युद्ध सा छेड दिया है. वे किसी भी कीमत पर इन सिफारिशों को लागू करने के लिए तैयार नहीं हैं. उनके जबरदस्त दबाव का नतीजा है कि यू.पी.ए सरकार पिछले छह महीने से इस रिपोर्ट को दबाए बैठी है. हालाँकि प्रधानमंत्री ने अब पत्रकारों और गैर पत्रकारों के एक साझा प्रतिनिधिमंडल से वायदा किया है कि वे “अपनी ड्यूटी निभाएंगे.”
लेकिन सच्चाई यही है कि अभी तक उनकी सरकार ने इस मामले में अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही का पालन नहीं किया है. अगर उन्होंने अपनी ड्यूटी निभाई होती तो अब तक मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें नोटिफाई कर दी गई होतीं. इसके उलट सरकार अखबार मालिकों के दबाव में है और उनके साथ मिलकर मजीठिया आयोग की सिफारिशों की हत्या करने में जुटी हैं. यही कारण है कि सरकार अखबार मालिकों को इस बात का पूरा मौका दे रही है कि वे इन सिफारिशों के खिलाफ न सिर्फ झूठा, एकतरफा और मनमाना अभियान चलाएं बल्कि कोर्ट से लेकर अन्य मंचों पर उसे ख़ारिज करने के लिए जमकर लाबींग करें.
नतीजा यह कि मजीठिया आयोग की सिफारिशों के खिलाफ अखबार मालिकों का अभियान जारी है. वे अपने अख़बारों और पत्रिकाओं में इन सिफारिशों के खिलाफ खबरें, विज्ञापन और संपादकीय पृष्ठ पर लेख लिख और छाप रहे हैं. उनमें कई खासकर विज्ञापन तो बहुत अपमानजनक हैं. मजे की बात यह है कि इन अखबारों में पत्रकारों और गैर पत्रकारों के पक्ष में न तो खबरें छप रही हैं और न ही लेख और संपादकीय.
आखिर अखबार की आज़ादी, पत्रकारों की नहीं बल्कि अखबार मालिकों की आज़ादी है. वे जो चाहते हैं, उनके अख़बारों में वही छपता है. जिनको अभी भी मुगालता हो कि प्रेस की आज़ादी का मतलब पत्रकारों की आज़ादी हैं, उनकी आँखें इस प्रकरण से खुल जानी चाहिए. आश्चर्य नहीं कि अख़बारों में मजीठिया वेतन आयोग के खिलाफ लगातार छप रहा है जबकि वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे पत्रकारों और गैर पत्रकारों के संघर्षों की वास्तविक खबरें और रिपोर्टें कुछ अपवादों को छोडकर कहीं नहीं छप रही हैं.
अखबार मालिकों की पत्रकारों के वेतन आयोग से कई तरह की नाराजगी है. उनका कहना है कि जब किसी अन्य उद्योग या क्षेत्र यहाँ तक कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों के लिए वेतन आयोग नहीं है तो पत्रकारों के लिए अलग से वेतन आयोग क्यों होना चाहिए? उनका आरोप है कि वेतन आयोग की आड़ में सरकार पत्रकारों की वफ़ादारी खरीदना चाहती है.
अखबार मालिकों का यह भी कहना है कि अगर मजीठिया आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया गया तो ज्यादातर अखबार बढे हुए वेतनों का बोझ नहीं उठा पाएंगे और बंद हो जाएंगे. उनके मुताबिक, मजीठिया आयोग ने पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेतन में अस्सी से सौ फीसदी तक बढोत्तरी की सिफारिश की है.
यही नहीं, अखबार मालिकों की संस्था- आई.एन.एस के एक विज्ञापन में बड़े अपमानजनक तरीके से कहा गया है कि इन सिफारिशों के मुताबिक अखबार के चपरासी और ड्राइवर को भी ५०००० हजार रूपये तक की तनख्वाह देनी पड़ेगी. उनका कहना है कि इतना तो सरकार भी अपने ड्राइवरों और चपरासियों को नहीं देती है. यह और बात है कि विज्ञापन के नीचे २ पॉइंट में बताया गया है कि यह सिफारिश उन अख़बारों के लिए है जिनका सालाना टर्नओवर १००० करोड़ रूपये से अधिक का है.
अखबार मालिकों का आरोप है कि सरकार वेतन आयोग के बहाने आज़ाद प्रेस को खत्म करना चाहती है और यह लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है. इसलिए उनकी मांग है कि सरकार तुरंत मजीठिया आयोग की सिफारिशों को नामंजूर करे और प्रेस की आज़ादी को बनाये रखने के लिए पत्रकारों के वेतन और अन्य सेवाशर्तों को तय करने का अधिकार मालिकों के हाथ में रहने दे.
साफ है कि अखबार मालिकों और उनकी संस्था-आई.एन.एस की नाराजगी की जड़ में असली मकसद यही है. वे अपनी मनमर्जी से पत्रकारों का वेतन और अन्य सेवाशर्तें तय करने का अधिकार कतई नहीं छोड़ना चाहते हैं. वैसे इससे बड़ा भ्रम और कुछ नहीं है कि सरकार मजीठिया आयोग की सिफारिशें नोटिफाई कर देती है तो अखबार मालिक उसे लागू कर देंगे.
सच यह है कि अगर मजीठिया वेतन आयोग लागू भी हो गया तो भी उसका वही हश्र होगा जो इससे पहले मणिसाना या बच्छावत वेतन आयोगों का हुआ था. तथ्य यह है कि कोई भी अखबार वेतन आयोगों की सिफारिशों को ईमानदारी और सच्ची भावना से लागू नहीं करता है. यही नहीं, पिछले डेढ़-दो दशकों में लगभग ८० से ९० प्रतिशत अख़बारों में पत्रकारों की अस्थाई और संविदा पर नियुक्ति के कारण वेतन आयोग पूरी तरह से बेमानी हो चुका है.
हकीकत यह है कि अधिकांश बड़े और मंझोले अख़बारों में ज्यादातर पत्रकारों की तनख्वाहें और सेवाशर्तें लगातार बद से बदतर होती चली गई हैं. यहाँ तक कि बड़े अख़बारों में भी संपादक सहित मुट्ठी भर पत्रकारों को छोड़ दिया जाए जिन्हें संविदा सिस्टम का लाभ मिला है तो बाकी ८० फीसदी पत्रकारों की तनख्वाहें बहुत कम हैं. खासकर निचले स्तर पर उप संपादकों और रिपोर्टरों की तनख्वाह सरकारी और निजी क्षेत्र के महकमों के सबसे निचले कर्मचारी से भी कम हैं.
यही नहीं, सबसे गंभीर चिंता की बात यह है कि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी अख़बारों और चैनलों में पत्रकारों और गैर पत्रकारों की यूनियनें नहीं रह गई हैं. अधिकांश यूनियनों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया गया है और जो बच गई हैं कि उनके नेतृत्व को खरीद लिया गया है.
नतीजा यह कि पत्रकारों और गैर पत्रकारों के पास वेतन और अन्य सेवाशर्तों के मामले में प्रबंधन के साथ सामूहिक मोलतोल की क्षमता नहीं रह गई है. वे पूरी तरह से मालिकों की दया और मर्जी पर निर्भर हैं. इस तरह मालिकों ने प्रेस की आज़ादी को अपनी चेरी बना लिया है. सच पूछिए तो प्रेस की आज़ादी को असली खतरा अखबार मालिकों की इसी तानाशाही से है.
यकीन मानिये, मजीठिया वेतन बोर्ड के कारण कोई अखबार बंद नहीं होने जा रहा
जस्टिस मजीठिया आयोग ने श्रमजीवी पत्रकारों के वेतनमान पर रिपोर्ट दी है. सबका दर्द सुनने-सुनाने वाले पत्रकारों के बड़े हिस्से को वेज बोर्ड के बारे में कुछ मालूम नहीं होता, इसका लाभ मिलना तो दूर. इसके बावजूद अखबार प्रबंधंकों ने वेज बोर्ड को मीडिया पर हमला बताकर हल्ला मचाना शुरू कर दिया है. जबकि मीडिया पर असली हमला तो पत्रकारों का भयंकर आर्थिक शोषण है. आखिर इतनी कठिन परिस्थितियों में लगातार काम करके भी एक पत्रकार किसी प्रोफेसर, सीए, इंजीनियर, डॉक्टर, आइएएस या कंप्यूटर इंजीनियर से आधे या चौथाई वेतन पर क्यों काम करे? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहिए तो यह सवाल हर नागरिक और हर मीडियाकर्मी को पूछना चाहिए.
कोयलाकर्मियों और शिक्षक-कर्मचारियों की तरह मीडियाकर्मियों को भी अपने वेज बोर्ड के बारे में जागरूक होना चाहिए. वरना अखबार प्रबंधकों की लॉबी तरह-तरह से टेसुए बहाकर एक बार फिर पत्रकारों को अल्प-वेतनभोगी और बेचारा बनाकर रखने में सफल होगी.
आज जो अखबार प्रबंधक नये वेज बोर्ड पर आंसू बहा रहे हैं, उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि उनके प्रोडक्ट यानी अखबार में जो चीज बिकती है- वह समाचार और विचार है. अन्य किस्म के उत्पादों में कई तरह का कच्चा माल लगता है. लेकिन अखबार का असली कच्चा माल यानी समाचार और विचार वस्तुतः संवाददाताओं और संपादनकर्मियों की कड़ी मेहनत, दिमागी कसरत और कौशल से ही आता है. इस रूप में पत्रकार न सिर्फ स्वयं कच्चा माल जुटाते या उपलब्ध कराते हैं, बल्कि उसे तराश कर बेचने योग्य भी बनाते हैं.
इस तरह देखें तो अन्य उद्योगों की अपेक्षा अखबार जगत के कर्मियों का काम ज्यादा जटिल होता है और उनके मानसिक-शारीरिक श्रम से कच्चा माल और उत्पाद तैयार होता है. तब उन्हें दूसरे उद्योगों में काम करने वाले उनके स्तर के लोगों के समान वेतन व अन्य सुविधाएं पाने का पूरा हक है. दुखद है कि मीडियाकर्मियों के बड़े हिस्से में इस विषय पर भयंकर उदासीनता का लाभ उठाकर अखबार प्रबंधकों ने भयंकर आर्थिक शोषण का सिलसिला चला रखा है.
जो अखबार 20 साल से महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे वरीय उपसंपादक को 20-25 हजार से ज्यादा के लायक नहीं समझते, उन्हीं अखबारों में किसी चार्टर्ड एकाउंटेंट, ब्रांड मैनेजर या विज्ञापन प्रबंधक की शुरूआती सैलरी 50 हजार से भी ज्यादा फिक्स हो जाती है. सर्कुलेशन की अंधी होड़ में एजेंटों, हॉकरों और पाठकों के लिए खुले या गुप्त उपहारों और प्रलोभनों के समय इन अखबार प्रबंधकों को आर्थिक बोझ का भय नहीं सताता. चार रुपये के अखबार की कीमत गिराकर दो रुपये कर देने या महज एक रुपये में किलो भर रद्दी छापने या अंग्रेजी के साथ कूड़े की दर पर हिंदी का अखबार पाठकों के घर पहुंचाने में भी अखबार प्रबंधकों को गर्व का ही अनुभव होता है. लेकिन जब कभी पत्रकारों को वाजिब दाम देने की बात आती है, तब इसे मीडिया की स्वतंत्रता पर हमले जैसे हास्यास्पद तर्क से दबाने की कोशिश की जाती है.
आज इन मुद्दों पर एक सर्वेक्षण हो तो दिलचस्प आंकड़े सामने आयेंगे-
1. किस-किस मीडिया संस्थान में वर्किंग जर्नलिस्ट वेज बोर्ड लागू है?
2. जहां लागू है, उनमें कितने प्रतिशत मीडियाकर्मियों को वेज बोर्ड का लाभ सचमुच मिल रहा है?
3. मीडिया संस्थानों में प्रबंधन, प्रसार, विज्ञापन जैसे कामों से जुड़े लोगों की तुलना में समाचार या संपादन से जुड़े लोगों के वेतन व काम के घंटों में कितना फर्क है?
4. मजीठिया वेतन आयोग के बारे में कितने मीडियाकर्मी जागरूक हैं और इसे असफल करने की प्रबंधन की कोशिशों का उनके पास क्या जवाब है?
5. जो अखबार मजीठिया वेतन आयोग पर चिल्लपों मचा रहे हैं, वे फालतू की फुटानी में कितना पैसा झोंक देते हैं?
जो लोग यह कह रहे हैं कि पत्रकारों को वाजिब वेतन देने से अखबार बंद हो जायेंगे, वे देश की आखों में धूल झोंककर सस्ती सहानुभूति बटोरना चाहते हैं. जब कागज-स्याही या पेट्रोल की कीमत बढ़ती है तो अखबार बंद नहीं होते. दाम चार रुपये से घटाकर दो रुपये करने से भी अखबार चलते रहते हैं. हाकरों को टीवी-मोटरसाइकिल बांटने और पाठकों के घरों में मिठाई के डिब्बे, रंग-अबीर-पटाखे पहुंचाने से भी अखबार बंद नहीं होते. प्रतिभा सम्मान कार्यक्रमों और महंगे कलाकारों के रंगारंग नाइट शो से भी कोई अखबार बंद नहीं हुआ. शहर भर में महंगे होर्डिंग लगाने और क्रिकेटरों को खरीदने वाले अखबार भी मजे में चल रहे हैं. तब भला पत्रकारों को वाजिब मजूरी मिलने से अखबार बंद क्यों हों? इससे तो पत्रकारिता के पेशे की चमक बढ़ेगी और अच्छे, प्रतिभावान युवाओं में इसमें आने की ललक बढ़ेगी, जो आ चुके हैं, उन्हें पछताना नहीं होगा. इसलिए यकीन मानिये, मजीठिया वेतन बोर्ड के कारण कोई अखबार बंद नहीं होने जा रहा. वक्त है पत्रकारिता को वाजिब वेतन वाला पेशा बनाने का. सबको वाजिब हक मिलना चाहिए तो मीडियाकर्मियों को क्यों नहीं?
एक बात और. पत्रकारों की इस दुर्दशा के लिए मुख्यतः ऐसे संपादक जिम्मेवार हैं, जो कभी खखसकर अपने प्रबंधन के सामने यह नहीं बोल पाते कि अखबार वस्तुतः समाचार और विचार से ही चलते हैं, अन्य तिकड़मों या फिड़केबाजी से नहीं. प्रबंधन से जुड़े लोग एक बड़ी साजिश के तहत यह माहौल बनाते हैं कि उन्होंने अपने सर्वेक्षणों, उपहारों, मार्केटिंग हथकंडों, ब्रांड कार्यक्रमों वगैरह-वगैरह के जरिये अखबार को बढ़ाया है. संपादक भी बेचारे कृतज्ञ भाव से इस झूठ को स्वीकार करते हुए अपने अधीनस्थों की दुर्दशा पर चुप्पी साध लेते हैं. पत्रकारिता का भला इससे नहीं होने वाला. समय है सच को स्वीकारने और पत्रकारिता को गरिमामय पेशा बनाने का, ताकि इसमें उम्र गुजारने वालों को आखिरकार उस दिन को कोसना न पड़े, जिस दिन उन्होंने इसमें कदम रखा था.