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घटिया राजनीति करने वालों का समर्थक मीडिया स्वास्थ्य संबंधी भ्रम फैला रहा है

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों की खबरें 2024 के चुनाव को प्रभावित करने के लिए किये गये प्रचार की आखिरी खबरें हैं और जैसा मैंने कल लिखा था, एकदम अंतिम या निचले स्तर की हैं। इनमें अरविन्द केजरीवाल के स्वास्थ्य को लेकर की जा रही राजनीति को घटिया न भी मानें तो उसे प्रचारित करके मीडिया स्वास्थ्य संबंधी एक आम और जरूरी जानकारी की पुष्टि करने तथा उसे प्रचारित करने की बजाय उसे लेकर भ्रम और झूठ फैला रहा है। इस क्रम में नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कहना, मोदी को समझने में गलती न करें, नहीं तो सात पीढ़ियों के पाप खोलकर रख दूंगा” – घटिया स्तर की एकदम फूहड़ धमकी है जिसका कोई मतलब नहीं है और जिससे उनके मानसिक स्तर भर पता चलता है। निजी स्तर पर हो, मोहल्ले की लड़ाई में पड़ोसी को दी जाती है लेकिन सरकारी स्तर पर इसके बारे में क्या कहा जाये। मुझे याद आता है कि राजीव गांधी ने एक बार ‘नानी याद दिला दूंगा‘ कहा था और तब उनकी कितनी आलोचना हुई थी। मुझे याद नहीं है कि उसके बाद किसी राजनीतिज्ञ ने ऐसा कुछ कहा हो। विपक्ष का इस बार का चुनाव प्रचार तो इस लिहाज से बेहद साफ-सुथरा रहा।

भाजपा, उसके नेताओं, प्रचारकों और ट्रोल ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जो कहा-किया उसका तो स्तर ही नहीं है। और इस कारण चुनाव आयोग का अस्तित्व भी नहीं दा। लेकिन मुद्दा यह है कि ‘नानी याद दिला दूंगा‘ के लिए आसमान सर पर उठा लेने वालों के लिए यह सब कोई मुद्दा ही नहीं रहा। ऐसे में, मुझे नहीं पता मोदी को समझना गलती करना कैसे है या उन्हें समझने में गलती कैसे हो सकती है और यह चुनौती किसके लिए है। सात पीढ़ियों के पाप से उनका क्या मतलब है और खोलकर रख देंगे तो किसी का क्या बिगड़ जायेगा या उनका बन जायेगा। जो भी हो, मैंने उन्हें एक बेहद घटिया, अज्ञानी, अहंकारी, सांप्रदायिक, निर्मम और गैर जिम्मेदार नेता / व्यक्ति समझा है जो पूरी बेशर्मी से झूठ बोलता है। ठीक हो तो बल्ले-बल्ले। कुछ होना नहीं है। गलत हो तो मैं अपनी सात पीढ़ियों का पाप जानना चाहता हूं। सार्वजनिक हो जाये तो भी फर्क नहीं पड़ता। उम्मीद है उनके समर्थक और प्रचारक इसे मानहानि नहीं मानेंगे और गुजरात में मुकदमा नही करेंगे। चुनौती को चुनौती के रूप में लेंगे और इसे सात पीढ़ियों के पाप खुलवाने का तरीका ही मानेंगे। अगर यह चुनौती मेरे लिए नहीं है, किसी खास के लिए है तो सार्वजनिक रूप से कहने और अखबारों को छापने की क्या जरूरत थी?    

घटिया राजनीति का एक और मामला अरविन्द केजरीवाल की बीमारी और जांच के लिए जमानत अवधि बढ़ाने की उनकी अपील पर राजनीतिक क्रिया-प्रतिक्रिया और बयानबाजी है। किसी का स्वास्थ्य वैसे भी निजी मामला है। राजनीतिक कारणों से अगर किसी को सार्वजनिक करना पड़ रहा है जो उसे समझना चाहिये और जो चीजें सार्वजनिक है उसपर अनावश्यक चर्चा से बचना चाहिये। भक्तों-समर्थकों की जानकारी के लिए अब सोशल मीडिया है और नेता अपने समर्थकों-प्रचारकों को सीधे जानकारी दे-ले सकता है। मीडिया की इसमें कोई भूमिका नहीं है। फिर भी, आज टाइम्स ऑफ इंडिया में तीन कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, केजरीवाल ने दिल्ली कोर्ट में जमानत की दो अपील दायर की; ईडी ने कहा, ‘उनके स्वास्थ्य ने चुनाव प्रचार नहीं रोका'”आज की इन खबरों पर अफसोस कीजिये, देखिये हमारा समाज कैसा हो गया है! में 28 मई को मैंने यहीं लिखा था, टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, “मेडिकल टेस्ट के लिए ‘बीमार’ मुख्यमंत्री ने 9 जून तक के लिए समय मांगा”। मेरा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट सही निर्णय करेगा, जैसे पहले करता रहा है जिसके बारे में  बोलकर अमित शाह राजनीति कर चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट ने जवाब भी दिया है। यह सबको पता है, संपादक को भी होगा ही। ऐसे में,  गृहमंत्री ने जो कहा था वह उनकी राजनीति हो, न्याय के मार्ग में बाधा है।

आज या अब मुद्दा यह है कि अरविन्द केजरीवाल ने जमानत मांगी ही नहीं थी। उन्होंने गिरफ्तारी को चुनौती दी थी। शुरू में जमानत के लिए जो अर्जी दी थी उसे वापस ले लिया था। गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान जब चुनाव से पहले प्रचार से रोकने के लिए जेल में रखने की बात आई तो सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा था कि जमानत पर छोड़ने के लिए कहें तो विचार किया जा सकता है। मैं कानून का जानकार नहीं हूं और मेरी यह रिपोर्ट कानूनी मामले के लिए नहीं है पर अखबारों की खबरों से जो मैंने समझा है वह मोटा-मोटी यही है, तकनीकी तौर पर गलत हो सकता हूं। इसके बाद केजरीवाल को जमानत मिली, ऐतिहासिक चुनाव प्रचार हुआ और 2 तारीख को उन्हें फिर जेल जाना है। उससे पहले मेडिकल जांच के लिए उन्होंने जमानत अवधि बढ़ाने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने इसपर सुनवाई नहीं की लेकिन तथ्य है कि गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और फैसला सुरक्षित रख लिया गया है। फैसला जो भी हो, उसका असर मतदान पर हो सकता है। एक स्थिति में वह सरकार के आरोपों को सही बतायेगा जो प्रधानमंत्री अनुभवी चोर कहकर सार्वजनिक कर चुके हैं। आप जानते हैं, मोदी के मामले में सिर्फ चोर कहना अपराध ठहराया हो चुका है। बिना सबूत अनुभवी चोर कहना क्या है इसपर शायद ही अदालत में कोई जाये वरना यह भी स्पष्ट होना चाहिये। जो हो, अगर गिरफ्तारी अवैध घोषित हो जाये तो सारे सरकारी दावे हवा हवाई हो जायेंगे और उसका भी असर मतदान पर पड़ सकता है। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मतदान खत्म नहीं होने तक फैसला नहीं सुनाकर अपनी ओर से लेवल प्लेइंग फील्ड को छेड़ने से बचने की कोशिश की है

दूसरी ओर, इस या किसी और कारण से केजरीवाल ने अब नियमित जमानत की अपील दायर की है। यही तरीका है और इसमें बीमारी का कारण भी है। ईडी ने जो कहा वह अदालत में कहा और उसका तर्क है, उसके वकीलों की योग्यता-क्षमता है। इसलिए खबर भी हो सकती है लेकिन तथ्य यह है, केजरीवाल कह चुके हैं और टिप्पणी करने वालों को जानना चाहिये कि अगर किसी का वजन अनजाने कारणों से तेजी से कम हो तो कारण जानना जरूरी है। वह किसी ऐसी बीमारी के कारण हो सकता है जिसका समय पर इलाज किया जाये तो ठीक हो जाये और ज्यादा नुकसान नहीं हो। देर होने से बीमारी बढ़ने, इलाज महंगा और मुश्किल होने की आशंका रहती है। इसलिए किसी के भी साथ ऐसा हो तो उसे जल्दी से जल्दी जांच करा लेना चाहिये। यह अलग बात है कि आम आदमी के पास पैसे नहीं होंगे तो वह जांच नहीं करा पायेगा और जिसके पास सुविधा है वह जल्दी से जल्दी कराना चाहेगा। यह भी समझने वाली बात है कि केजरीवाल ऐसे बीमार नहीं हैं कि चुनाव प्रचार रोक देते और ना ऐसा कोई कानून है। उन्हें तो चुनाव प्रचार  लिए ही जमानत दी गई थी। ऐसा भी नहीं है कि जेल जाने के बाद ये जांच नहीं होगी। वह भी जेल प्रशासन का काम है। इसमें संभव है कि वे जेल जाने से बचने के लिए जमानत चाहते हों पर मिलेगी तो तभी जब अदालत देगी। और कोशिश करना गैर कानूनी नहीं है।  

मेरा मानना है कि इसपर राजनीति शर्मनाक है पर भाजपा की मजबूरी समझना मुश्किल नहीं है और इसमें वह घटिया राजनीति कर रही है क्योंकि उसका नेतृत्व यानी मोदी घटिया इनसान है। मैंने यही समझा है। अगर दूसरे लोगों ने कुछ और समझा है तो इसमें मुझे मोदी की गलती कम, मीडिया की गलती ज्यादा लगती है। मीडिया का काम था कि अपनी खबरों और दूसरे कालम आदि से वह बताता कि मोदी घटिया राजनीति कर रहे हैं और अरविन्द केजरीवाल को जमानत विस्तार मांगने का हक है। अदालत तभी देगी जब वह जरूरी समझेगी और भाजपा वाले बिलावजह परेशान हो रहे हैं। इसमें जनता को यह संदेश नहीं जा रहा है कि अगर अचानक, कारण जाने बिना वजन कम होने लगे तो यह चिन्ता की बात है और कारण पता किया जाना चाहिये। 

जहां तक अंतिम चरण के चुनाव प्रचार की बात है और इसमें नरेन्द्र मोदी के वाराणसी संसदीय क्षेत्र का मतदान शामिल है इसलिए कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में हैं। दूसरी ओर, विपक्ष ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान की खबर भी है। दिलचस्प यह है कि कल मतदान होना है और यौन अपराध के आरोपी प्रज्वल रेवन्ना के विदेश से भारत वापस आ जाने या समर्पण करने की खबर भी है। इसमें यह नहीं बताया गया है कि केंद्र सरकार ने उसका पासपोर्ट रद्द किया इसलिए उसे आना पड़ा या वह अपने स्तर पर या दादा की अपील पर वापस आ गया है। इंडियन एक्सप्रेस ने मनमोहन सिंह के बयान को पंजाब के लिए अपील के फ्लैग शीर्षक से प्रकाशित किया है। इसका मुख्य शीर्षक है, घृणा फैलाने वाले घृणित भाषणों ने प्रधानमंत्री कार्यालय की गरिमा को गिरा दिया : मनमोहन। 

मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है और इंडियन एक्सप्रेस ने छापा है, प्रधानमंत्री का चुनाव प्रचार उनके अपने बारे में और कांग्रेस को गालियां देना है; इंडिया समूह सरकार बनायेगा। यह अलग बात है कि मोदी ने जो कहा वह लीड है और इसका शीर्षक है, 2024 के चुनाव प्रचार पर पर्दा। इसके तहत खबर का शीर्षक है, मोदी ने विपक्ष पर हमला बोला और कहा कि तीसरी बार उनकी सरकार बनने वाली है। आज कुछ अखबारों, टाइम्स ऑफ इंडिया और अमर उजाला ने भारतीय अर्थव्यवस्था की बेहतर तस्वीर दिखाने की कोशिश की है। इसमें भारतीय रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट पाकिस्तान की जीडीपी का ढाई गुना जैसे शीर्षक हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, भारतीय रिजर्व बैंक ने अपना 100 टन सोना यूके के सेंट्रल बैंक से भारत के वॉल्ट में पहुंचाया। आज यह लीड है और इसमें बताया गया है कि इतनी इतनी ही मात्रा आने वाले महीनों में ले जाई जा सकती है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की खबर का लीड है, मेरी दमदार सरकार लगातार तीसरी बार सत्ता में आने वाली है। मनमोहन सिंह का बयान इसी के साथ है। शीर्षक है, मेरी सरकार ने कभी किसी समाज को अलग नहीं किया। यही शीर्षक द हिन्दू में है लेकिन यहां यह टॉप के दो कॉलम में है। प्रधानसेवक जी ने कहा है और टीओआई ने इंट्रो के रूप में छापा है, विपक्ष अग्निपथ का उपयोग चुनावों के लिए कर रहा है। यह एक तरह का पाप हैहिन्दुस्तान टाइम्स ने मौसम और मानसून की खबर को लीड बनाया है। प्रधानमंत्री के चुनावी भाषण का डायलॉग शीर्षक है, विपक्ष पूर्व (पुराने समय) में फंसा है जबकि लोग इक्कीसवीं सदी की राजनीति चाहते हैं। इस रिपोर्ट पर शशि शेखर की बाईलाइन है जो हिन्दुस्तान के संपादक हैं। द हिन्दू में चुनाव प्रचार खत्म हुआ लीड है और इसका शीर्षक है, चुनावी मौसम खत्म हुआ; अंतिम चरण में 57 सीटों पर फैसला। उपशीर्षक है, सातवें और अंतिम चरण के लिए मतदान आठ  राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में होगा; चुनाव क्षेत्रों में वाराणसी भी है जहां से प्रधानमंत्री तीसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं।  

नवोदय टाइम्स में नरेन्द्र मोदी का भाषण सेकेंड लीड है, लीड मौसम की खबर है और चुनाव प्रचार खत्म लीड के नीचे दो कॉलम की खबर है। मोदी के भाषण का शीर्षक ऊपर लिख चुका हूं और मोदी के दावे या चुनौती के नीचे मोदी को समझने वाला एक शीर्षक है, बहुमत से बनेगी इंडिया की सरकार : केजरीवाल। यह सही है या गलत ये तो चार जून को पता चलेगा और तब देखा जायेगा कि मोदी केजरीवाल की सात पीढ़ियों का पाप बतायेंगे या आम आदमी पार्टी का जिसके बारे में हिन्दुस्तान टाइम्स में उनका कहा छपा है। मनमोहन सिंह के बयान की खबर यहां तीन कॉलम में है। इसका शीर्षक है, मोदी ने सार्वजनिक संवाद की गरिमा को गिराया। अमर उजाला ने मोदी को लीड बनाया है और सबसे ज्यादा जगह दी है। मनमोहन सिंह का बयान दो लाइन के शीर्षक से 13 लाइन की खबर है। इसमें आधे कॉलम की उनकी फोटो भी। इसी के नीचे एक लाइन के शीर्षक से खरगे का बयान है और खबर नौ लाइनों में इसमें भी आधे कॉलम की फोटो है। लेकिन केजरीवाल का दावा नहीं है, राहुल गांधी तो होते ही नहीं हैं। पर आबकारी मामला जमानत अर्जी पर ईडी को नोटिस, कल तक जवाब तलब फ्लैग शीर्षक के तहत मुख्य शीर्षक है, चुनाव प्रचार के लिए केजरीवाल स्वस्थ किस आधार पर मांग रहे जमानत : ईडी”।      

द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, सबसे कड़वा, गुल-गपाड़िया वाला युद्ध समाप्त हुआ। इसके तहत बताया गया है कि ममता बनर्जी ने इस गर्मी में जख्म और उम्र की परवाह नहीं की तो मनमोहन सिंह ने अमानवीयकरण की कहानी को धाराशायी कर दिया जबकि नरेन्द्र मोदी ने कहा कि बेहद भ्रष्ट, आम आदमी पार्टी का जन्म भ्रष्टाचार की मां के गर्भ से हुआ है। इसका मतलब यह लगता है कि चोर का बच्चा चोर होता है। आप जानते हैं कि अपने बारे में वे कह चुके हैं कि उन्हें परमात्मा ने भेजा है शायद इलेक्टोरल बांड की असंवैधानिक घोषित ईमानदार राजनीति के लिए और इसीलिए संविधान बदलने के लिए 400 पार के दावे का असर हुआ और बचाव में सारी तैयारी रखी रह गई और जो हुआ वह घटिया और झूठ था। अखबार ने सात कॉलम की अपनी इन खबरों और शीर्षक का फ्लैग शीर्षक लगाया है लोकतंत्र और सत्ता के लिए 2024 का चुनाव प्रचार हमारे समय का सबसे यादगार साबित हो सकता है। मुझे लगता है कि अखबारों की घटिया भूमिका के लिए तो होगा ही। 

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