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सुख-दुख

ग्वालियर के एक विद्वान और संपन्न परिवार के साठ वर्षीय ऋतुराज द्विवेदी ने फांसी लगाकर जान दे दी

जयंत सिंह तोमर-

ग्वालियर के सुप्रसिद्ध विद्वान आचार्य हरिहरनिवास द्विवेदी के बड़े बेटे ऋतुराज द्विवेदी ने आज फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। वे साठ वर्ष के थे। सारस्वत साधना के लिए प्रसिद्ध परिवार के एक सदस्य का इस तरह जीवन समाप्त करना न केवल दुखद है वल्कि यह भी बताता है कि मनुष्य अपने जीवन को जनता के संघर्ष को समर्पित करने के बजाय कितने एकाकीपन में चला जाता है।

ऋतुराज एक समय ग्वालियर अंचल में अपनी फोटोग्राफी के लिए जाने जाते थे। उनके विद्वान पिता का एक बहुत ही समृद्ध पुस्तकालय था जो दो साल पहले सीतामऊ में इतिहासकार महाराजकुमार डॉ रघुवीर सिंह द्वारा स्थापित ‘ नटनागर शोध संस्थान ‘ के सुपुर्द कर दिया गया था। मुरार स्थित हरिहरनिवास जी के सारस्वत – साधना के केन्द्र ‘ विद्यामंदिर ‘ को भी लगभग दस साल पहले बेच दिया गया था। विद्यामंदिर अपने कलात्मक सौन्दर्य के लिए तो जाना ही जाता था, वहां देश और दुनिया के दिग्गज विद्वानों के भी चरण पड़े।

ऋतुराज द्विवेदी जैसे संपन्न और प्रसिद्ध परिवार के सदस्य द्वारा इस तरह जीवन समाप्त करने की घटना इस बात की जरूरत महसूस कराती है कि मनुष्य को बड़े लक्ष्य के लिए न्यूनतम साधनों में एकाकी रहकर जीना सबसे पहले सिखाना और सीखना चाहिए।

ऋतुराज मेरे अच्छे मित्र थे। यद्यपि बिरासत को सम्हालने के उनके ढंग से हमारी असहमति और खिन्नता रही। ऋतुराज जी की बहन सुधा शांतिनिकेतन में पढ़ीं इस नाते सुधा जी से मेरी आत्मीयता रही। ग्वालियर में जब शांतिनिकेतन के पूर्व छात्रों की सम्मिलनी बनी तब वे उसकी सक्रिय सदस्य थीं। सुधा जी अधिवक्ता हैं और अब पुणे में रहती हैं।

ऋतुराज जी के छोटे भाई आशुतोष भी एक श्रेष्ठ छायाकार रहे हैं। हरिहरनिवास जी का निधन सन् १९८७ में हो गया था। उनके छोटे भाई शांतिचंद जी ने मुझे हरिहरनिवास जी के लिखे सभी ग्रंथों की एक एक प्रति भेंट में दी थी। जब मैंने न्यौछावर के लिए निवेदन किया तो हंसते हुए बोले थे कि इसके एवज में कुछ किताबों की प्रूफ़ – रीडिंग कर जाना।

शांतिचंद जी विनोबा के अनुयायी थे। बिना सिले धवल वस्त्र पहनते थे। चिरकुमार थे। विवाह नहीं किया। एक समय उन्होंने मंगल- प्रभात अखबार निकाला था। हरिहरनिवास जी स्वयं ग्वालियर के पहले दैनिक ‘ नवप्रभात ‘ के सम्पादक रहे जो देश की स्वतंत्रता के समय निकला। उनके लिखे सम्पादकीयों का संकलन मेरे निजी संग्रह की दुर्लभ निधि है।

हरिहरनिवास जी के पिता पन्नालाल द्विवेदी को ग्वालियर रियासत के बड़े जुल्मो-सितम सहने पड़े। सन् १९२० के आसपास करैरा कांफ्रेंस के बाद ग्वालियर रियासत ने स्वतंत्रता सेनानियों की तुलना रूस के बौल्शेविक क्रांतिकारियों से की । पन्नालाल द्विवेदी की शिवपुरी में दिनारा स्थित जमीन – जायदाद और जमींदारी जप्त कर ली थी।

इतने संघर्षशील और प्रसिद्ध परिवार का कोई सदस्य जीवन से निराश होकर खुद को समाप्त कर ले यह बात न तो समझ में आती है, न इससे अच्छा संदेश ही जाता है।

जीवन की शिक्षा में इस बात को शामिल किया जाना जरूरी है कि मनुष्यता के हित में न्यूनतम लेकर अधिकतम कैसे दिया जाये इसका अभ्यास करें। शुरू से यदि यह ध्येय निश्चित हो जाये तो बची हुई सांसों को क्यों समय से पहले समाप्त किया जाये।

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