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दैनिक हिंदुस्तान के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार और लेखक श्रीपाल जैन का निधन!

Portrait of a middle-aged man with short black hair and a mustache, wearing a light blue checkered shirt against a solid blue background.

नई दिल्ली। हिंदी पत्रकारिता के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित हस्ताक्षर श्रीपाल जैन का निधन हो जाने की खबर सामने आई है। उनके निधन की खबर से मीडिया जगत, साहित्यिक क्षेत्र और उनके शुभचिंतकों में गहरा शोक व्याप्त है। करीब 28 वर्षों तक राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक में अपनी सेवाएं देने वाले श्रीपाल जैन ने पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई थी।

श्रीपाल जैन ने मार्च 1981 से जनवरी 2009 तक हिंदुस्तान टाइम्स समूह के हिंदी दैनिक ‘हिंदुस्तान’ में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने रिपोर्टिंग, लेखन, संपादन, पेज प्लानिंग और प्रोडक्शन जैसे लगभग हर क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। वह वरिष्ठ सहायक संपादक, सहायक संपादक, मुख्य उप-संपादक, वरिष्ठ उप-संपादक और उप-संपादक जैसे पदों पर रहे।

पत्रकारिता के अलावा उनकी पहचान एक गंभीर चिंतक और लेखक के रूप में भी थी। उन्होंने करीब 12 वर्षों तक विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर संपादकीय लेखन किया और जरूरत पड़ने पर संपादकीय पृष्ठ का दायित्व भी संभाला। उनकी विश्लेषणात्मक दृष्टि और संतुलित लेखन को पाठकों और सहकर्मियों ने हमेशा सराहा।

श्रीपाल जैन अंतरराष्ट्रीय राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति के गहरे अध्येता थे। उन्होंने इन विषयों पर हिंदी में पांच पुस्तकों का लेखन किया, जो उनके व्यापक अध्ययन और विषय की गहन समझ का प्रमाण हैं। उनकी पुस्तकों ने गंभीर पाठकों और शोधार्थियों के बीच भी अपनी विशेष पहचान बनाई।

उनके निधन को हिंदी पत्रकारिता के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। मीडिया जगत से जुड़े लोगों ने उन्हें एक अनुशासित, विद्वान और विनम्र व्यक्तित्व के रूप में याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।


एक महीने के अंदर मेरे तीन जानकार पत्रकार नहीं रहे.. Rajshekhar Tripathi, Girijesh Mishra और अब Shripal Jain …हिंदी में आर्थिक विषयों पर कई लोग लिखते हैं..लेकिन श्रीपाल जैन जी के बारे में मेरी राय बहुत संजीदा रही..आर्थिक मुद्दों पर वे गंभीर लेखन करते थे..चूंकि उन्होंने तमाम उम्र दैनिक हिंदुस्तान Hindustan में गुजारा..लिहाजा बाहर लिखने की गुंजाइश कम थी.. लिहाजा उनके लेखन और उनकी गंभीरता से हिंदी समाज उतना परिचित नहीं हो पाया, जिसके वे हकदार थे..एक तरह से वे अलक्षित रह गए…
12 जनवरी के दिन उनके ही पूर्व सहयोगी रहे स्वर्गीय कृष्ण किशोर पांडेय के लेखों के संग्रह ‘ रावण रथी विरथ रघुबीरा’ के विमोचन समारोह में ना सिर्फ वे आए थे, बल्कि अपनी राय भी रखी थी..रात को उनके ही साथ घर लौटा था..कि हम फिर मिलेंगे..लेकिन दिल्ली की आपाधापी और नौकरी के चलते मिलने की गुंजाइश कम होती गई है..मुझे अफसोस रहेगा कि उनसे भेंट नहीं हो पाई..विनम्र श्रद्धांजलि।
-उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

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