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सुख-दुख

ज़ी न्यूज़ में मेरे स्पेशल प्रोग्रामिंग हेड होने के दौरान गिरिजेश मिश्र टीम के सबसे मज़बूत खंभे थे!

पंकज शुक्ला-

“सर, दोस्त मत कहिए, आपने मुझे छोटे भाई का दर्ज़ा दिया है!”

यही कहा था गिरिजेश ने, जब बातों-बातों में अभी बीते साल मेरे मुंह से, थैंक यू दोस्त, निकल गया। ज़ी न्यूज़ में मेरे स्पेशल प्रोग्रामिंग हेड होने के दौरान एक कमाल की टीम बनी थी। गिरिजेश मिश्र उस टीम के सबसे मज़बूत खंभे थे।

आज ये खंभा ढह गया। यूं लगा जैसे मेरा छोटा भाई ही फिर से बिछड़ गया।

Portrait of a man in a dark pinstripe suit and yellow shirt, looking at the camera.
गिरिजेश मिश्रा

पत्नी को बताया तो उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। मैं भी लिखते समय बहुत परेशान सा हूं। आंखों में आंसू हैं और दिल में एक पीड़ा कि ऐसा कैसे हो सकता है? गिरिजेश से अभी मेरी 27 मई को आख़िरी बात हुई।

उसके पहले भी वह लगातार मेरे संपर्क में रहे। बिटिया के एडमिशन के दौरान और बेटे की पढ़ाई को लेकर लगातार चर्चाएं करते रहे।

कहानियां लिखने और सुनाने में गिरिजेश का कोई सानी नहीं था। लंबी-लंबी स्क्रिप्ट लिखने को लेकर मेरी उनसे बहस भी होती कि भाई तीन मिनट का पैकेज बनना है, थोड़ा छोटा लिख दो। गिरिजेश कहते, सर, ये अधिकार आपके पास है आपको जहां से काटना है काट दो।

गिरिजेश को जब भी आर्थिक, मानसिक या व्यावसायिक मदद की ज़रूरत पड़ी, उन्होंने बेहिचक मुझे फ़ोन किया। ‘अमर उजाला’ के गोरखपुर संस्करण के लिए एक गुणी संपादक की तलाश भी उन तक पहुंची थी लेकिन बात तब बनी नहीं, और, बाद में गिरिजेश ने ख़ुद ही वापस अपने शहर में काम करने का इरादा छोड़ दिया।

स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन, मुंबई के वह लंबे समय तक एसोसिएट मेंबर रहे। फिर शायद नियम बदला और एसोसिएट मेंबरशिप की मियाद तय हो गई। फरवरी में गिरिजेश ने एक कहानी भेजी, इस निवेदन के साथ कि इसे आप अपने अकाउंट से रजिस्टर करा लीजिए।

कहानी एक ऐसी खोज की है जिसमें परखनली में विकसित की गई एक बच्ची अमर है। न वह बूढ़ी होती है और न मरती है। ययाति की बेटी माधवी की पौराणिक कथा के आधुनिक और वैज्ञानिक अनुकूलन पर गिरिजेश ने ये साइंस फ़िक्शन स्टोरी लिखी है, मेडबी!

ये कहानी उन्होंने किस प्रोडक्शन हाउस को भेजी और किससे उनकी बात इस बारे में चल रही थी, इस पर गिरिजेश ने कोई चर्चा नहीं की और मैंने उनसे पूछा भी नहीं। मेरा बेटा भी जिन फ़िल्मों की निर्देशन टीम में काम कर रहा होता है, उसके बारे में हम कभी कोई चर्चा नहीं करते हैं, फ़िल्म की रिलीज़ तक और कभी-कभी उसके बाद भी।

गिरिजेश का जाना मेरा बहुत बहुत निजी नुकसान है। मन व्यथित है। दुख यही है कि मैं मुंबई में हूं और उनके जाने का समाचार तब मिला जब गाज़ीपुर के निकट स्थित शवदाहगृह में उनका अंतिम संस्कार हो चुका था।

अच्छा नहीं किया भाई गिरिजेश! ऐसे भी कहीं कोई जाता है..!
जहां रहो, सुखी रहो। बहुत याद आओगे..!!

कहानियां लिखते रहना और भगवान को सुनाते रहना।

याद है, हमने के सी बोकाडिया के लिए एक पुनर्जन्म सीरीज़ लिखी थी, वैसे तो मोक्ष ही जीवन का परम लक्ष्य होता है लेकिन दोबारा जन्म मिले तो तुम्हें एक फ़िल्म लेखक के रूप में बहुत बहुत शोहरत मिले, यही मेरी इच्छा है..!!

बहुत कठिन होता है, उस शख़्स को श्रद्धांजलि देना, जिसके यूं चले जाने की बात कभी सपने में भी न आई हो।

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