सौरभ सोमवंशी-
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए उसे विचारार्थ स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने मामले में विधानसभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति देवेश चंद्र सावंत की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता एवं विधानसभा के पूर्व सूचना अधिकारी कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने पक्ष रखा, जबकि प्रतिवादी पक्ष की ओर से भी विस्तृत बहस की गई।
लखनऊ हाईकोर्ट के कक्ष संख्या-9 में करीब आधे घंटे तक चली सुनवाई के दौरान अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने अदालत को बताया कि मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर कथित रूप से अवैध नियुक्ति और पद पर बने रहने से जुड़ा है। ऐसे में न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत से यह भी अनुरोध किया गया कि याचिका के अंतिम निस्तारण तक प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को किसी भी प्रशासनिक अथवा आधिकारिक शक्ति के प्रयोग से रोका जाए। साथ ही उनकी नियुक्ति के प्रभाव और संचालन पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की गई।

सुनवाई के दौरान प्रदीप कुमार दुबे की ओर से पेश अधिवक्ता ने याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर सवाल उठाए और इसे सुनवाई योग्य न मानने का आग्रह किया। हालांकि दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए प्रतिवादियों से जवाब मांगा।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई को निर्धारित की है।
गौरतलब है कि याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह ने प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति, सेवा विस्तार और वर्तमान में प्रमुख सचिव के पद पर बने रहने की वैधता को चुनौती दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उनकी नियुक्ति निर्धारित नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत की गई तथा सेवानिवृत्ति के बाद भी वह बिना वैध अधिकार के पद पर कार्यरत हैं। हालांकि इन आरोपों पर अभी न्यायालय का अंतिम निर्णय आना बाकी है।


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