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आज के अखबार : गवर्नमेंट ऑफ भारत का विज्ञापन, मोदी प्रशंसा और TMC वालों के बिकने की ‘खबरें’

इंडिया ब्लॉक की मीटिंग में सहयोगियों ने कांग्रेस पर निशाना साधा और द्रमुक के बिना I.N.D.I.A की बैठक जैसे शीर्षक और सोशल मीडिया पर नायडू व देवगौड़ा की मोदी प्रशंसा आज की खास खबर है। इंडिया गठबंधन के बैठक की खबर नहीं के बराबर छपी इसमें कुछ नया नहीं है।

संजय कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इंडिया गठबंधन से डरते हैं तो इंडिया भारत हो जाता है। आज हुआ है और पहले भी हो चुका है। कल की बैठक को लेकर जो हुआ वह आज अखबारों में छपा है। इंडिया गठबंधन से बचने और सरकार (उसकी साख भी) बचाने के लिए जो सब किया जा रहा है उसमें तृणमूल के जनप्रतिनिधियों को खरीदना और राज्य सभा चुनाव में खरीदारी की तैयारी भी दिख रही। राहुल गांधी से डरी सरकार या उसके लोगों ने कल दिल्ली में कई जगह पोस्टर-होर्डिंग लगाए जिन पर राहुल गांधी के बारे में इंडिया गठबंधन के नेताओं ने पूर्व में क्या कहा था वह सब लिखा था। आज नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, द्रमुक के बिना I.N.D.I.A की बैठक। अमूमन मैं हिन्दी में अंग्रेजी नहीं घुसेड़ता हूं और हिन्दी अखबारों में अंग्रेजी लिखना ही नहीं चाहिए। मुझे याद है, पहले हिन्दी अखबारों में अंग्रेजी के विज्ञापन नहीं छपते थे या ज्यादा पैसे लगते थे। कारण यही था कि वह अलग से दिखता है और ज्यादा प्रचार मिलता है। अब का पता नहीं लेकिन हमारे समय में अंग्रेजी के विज्ञापन (ज्यादातर टेंडर नोटिस) को हिन्दी करके छापा जाता था। वह भी तब जब सरकारी विज्ञापन हिन्दी अखबारों में देने का सरकारी नियम था। फिर भी इंडिया गठबंधन को अब हिन्दी अखबार वाले  I.N.D.I.A लिखते हैं। अंग्रेजी में हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, ममता इंडिया की बैठक में शामिल हुईं, सांसदों ने पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाया। खबरों में अंग्रेजी में इंडिया लिखा जाता है लेकिन हिन्दी वाले I.N.D.I.A लिखते हैं। दूसरी ओर, आज कई अखबारों में पहले पन्ने पर छपे सरकारी विज्ञापनों में अंग्रेजी में Government of Bharat  लिखा हुआ है जबकि हिन्दी में भारत सरकार लिखा है।

Emblem of India (Lion Capital) with the text 'Government of Bharat' on a dark blue background.
आज विज्ञापनों में छपा है इंडिया भारत हो गया आपको पता चला

यही नहीं, आज जब हर ओर सरकार विरोधी माहौल है तब नरेन्द्र मोदी की तारीफ में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा का एक लेख कुछ प्रचारकों ने एक्स पर शेयर किया है। लेख तो मैं अभी नहीं पढ़ पाया हूं लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया में एक और लेख होने की सूचना मिली तो लगा कि प्रधानमंत्री को खुश करके राज्यसभा में बने रहने की कोशिश का हिस्सा हो सकता है। अब जब धर्मेन्द्र प्रधान के कारनामों और उससे हो रही फजीहत के बीच प्रचार की जरूरत समझ सकता हूं तो तथ्य है कि आम प्रचारक पहले की तरह लगे ही हुए हैं लेकिन ऐसे समय में मोदी की तारीफ करके कोई नाक कटवाने के लिए आगे क्यों आएगा। हालांकि मैं नहीं कह रहा हूं कि मामला ऐसा ही है। जैसा पहले कहा है, मैंने लेख पढ़ा ही नहीं है लेकिन मानता हूं कि अभी ऐसा लेख लिखने और प्रकाशित करवाने की जरूरत नहीं थी। छप भी गया तो लेख भेजकर या उसका हवाला देकर पूर्व प्रधानमंत्री ईनाम पा लेते, अपना काम करवा लेते तो पता भी नहीं चलता। लेकिन प्रचारकों ने इसे साझा करके सिस्टम का भी प्रचार किया है। संभव है, यह उन्हें अनुचित नहीं लगता हो। शायद इसीलिए, आज ही, चंद्रबाबू नायडू का यह लेख जो प्रधानमंत्री की प्रशंसा में है, स्मृति ईरानी ने भी शेयर किया है। यह लेख भी तारीफ में लिखवाया गया लगता है लेकिन इसके साथ खासियत यह है कि नायडू का समर्थन ईडी के डर से है या राजनीतिक – मुझे अभी तक स्पष्ट नहीं है। मैं समझ रहा था कि धर्मेन्द्र प्रधान के खुलासे और कॉक्रोचों की नाराजगी से इन्हें भी गुस्सा आएगा और लगेगा कि सरकार जा रही है तो ये समर्थन वापस ले सकते हैं। पर लगता है, भाजपा ने तृणमूल के सांसद खरीद लिए हैं। ऐसे में यह लेख नायडू ने अपना पक्ष रखने के लिए भी लिखा होगा लेकिन प्रचारक अपना काम तो करेंगे ही। कुल मिलाकर, मुझे मोदी सरकार के प्रचारक और उनका काम देखने, उसे रिकार्ड करने में बहुत मजा आ रहा है। लग रहा है कि 10 साल कमा नहीं पाया तो क्या हुआ अब मुफ्त का मनोरंजन जबरदस्त है। ऐसा कि मुझे गर्मियों में पहाड़ (या यूरोप) जाने की जरूरत नहीं लग रही है।

आज इंडिया गठबंधन की बैठक के साथ तृणमूल सांसदों के अलग होने या अलग बैठक की खबर भी महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके लिए तृणमूल के सांसदों की तारीफ नहीं की जा सकती है ना ही यह राहुल गांधी की कमजोरी है और ना ही दलबदल करने वाले सांसदों ने अच्छा काम किया है। कायदे से दोनों दो अलग खबरे हैं लेकिन इनकी प्रस्तुति अलग अखबारों में अलग तरीके से है और यह दिलचस्प है। इसमें शीर्षक लगाने वाले का झुकाव या उलझन दिखता है। उदाहरण के लिए, दैनिक भास्कर में तृणमूल की खबर पहले पन्ने पर है। इंडिया गठबंधन की खबर पहले पन्ने पर नहीं है और लीड सीबीएसई की खबर है जो ओएसएम विवाद, पुनर्परीक्षा आदि से संबंधित है। दैनिक भास्कर में तृणमूल की खबर का फ्लैग शीर्षक है – संकट गहराया, बंगाल विधानसभा के बाद अब संसद तक बगावत। मुख्य शीर्षक है – ममता को झटका : अब टीएमसी के 20 सांसदों ने एनडीए को समर्थन दे दिया। मुझे लगता है कि तृणमूल के सांसदों ने जो किया वह देश को, राजनीति को, लोकतंत्र को, पर्यवेक्षकों को भी झटका है। ममता बनर्जी के लिए झटका हो भी तो वे लंबे समय तक मुख्य मंत्री रह लीं, राजनीति कर लीं और यह वैसे ही है जैसे नरेन्द्र मोदी अपनी राजनीति कर रहे हैं। इसमें देश सेवा या विचारधारा तो कहीं है ही नहीं। और यह शुवेन्दू अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाने में भी नहीं है। खबर यह सब होनी चाहिए थी। ममता को झटका से लगता है मोदी जी बहुत काबिल है या अच्छा कर रहे हैं – जबकि इसमें अच्छा कहने या प्रशंसा करने लायक कुछ नहीं है। सीबीआई-ईडी की ताकत और सांसदी बचाने से लेकर ईनाम-पुरस्कार देने तक के दम पर खुल्लम-खुल्ला किया जा रहा है।

इसी तरह, देशबन्धु में तृणमूल के विभाजन, बैठक या ममता को झटका की खबर नहीं है। देशबन्धु की लीड इंडिया गठबंधन की बैठक है और शीर्षक है, गठबंधन ने धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा मांगा। फ्लैग शीर्षक है, आगे की लड़ाई के लिए इंडिया गठबंधन ने कसी कमर, पांच फैसले लिए। देशबन्धु ने सत्तारूढ़ दल को भी जगह दी है और संबित पात्रा को फोटो के साथ छापा है। इसमें वे कह रहे हैं, चुनाव प्रक्रिया पर सवाल करना विपक्ष की आदत है। सच्चाई यह है कि ईवीएम आया था तो भाजपा ने इसे लोकतंत्र के लिए जोखिम कहा था। अब जब जोखिम साफ दिख रहा है तो भाजपा पूरी तरह पलट चुकी है, ईवीएम ही नहीं, चुनाव आयोग की भी प्रशंसा करने का मौका नहीं चूकती। अमर उजाला ने, लोकसभा के 20 सांसदों ने ममता का साथ छोड़ा, एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की – को लीड बनाया है और इसके साथ ही शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगने और एसआईआर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने के फैसले की खबर दी है। ये दोनों खबरें एक फ्लैग शीर्षक, विपक्षी गठबंधन को एकजुट करने के लिए बैठक हो रही थी …. उसी समय तृणमूल में बड़ी टूट के तहत है। मुझे लगता है और दूसरे अखबारों ने भी दोनों खबरों को अलग रखा है पर अमर उजाला इस मामले में भ्रमित लगता है और दूसरों को भी भ्रमित करेगा। इससे दोनों घटनाएं एक दूसरे से जुड़ी लग रही हैं जबकि एक साथ होना संयोग है, प्रयोग तो कुछ और का हो रहा है। 

टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, ममता और अभिषेक दिल्ली में, टीएमसी का विद्रोह संसद तक फैल गया। इसके साथ इंडिया गठबंधन की बैठक की फोटो है। इसका कैप्शन है, सोमवार को दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में (बाएं से दाएं) समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, टीएमसी की ममता बनर्जी और कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे तथा राहुल गांधी। गठबंधन की जो खबर टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने पर छापी है उसका शीर्षक है, इंडिया ब्लॉक ने हर दो महीने पर मिलना तय किया। इंडियन एक्सप्रेस ने भी इंडिया ब्लॉक की खबर को तृणमूल की खबर के साथ रखा है पर तृणमूल की खबर काफी बड़ी रखी है। छह कॉलम की लीड का मुख्य शीर्षक है, ममता की लोकसभा टीम टूटने से संकट गहराया, टीएमसी के बागी सांसद भाजपा की शरण में। फ्लैग शीर्षक है, बैठक में बंगाल के मुख्यमंत्री भी, ममता खेमे ने बागियों की संख्या 20 कही। खबर के अनुसार, बागियों ने कहा कि टीएमसी के 28 सांसदों में से 20 उनके साथ हैं। इनमें से 14 भाजपा के मंत्री के घर पर बैठक में शामिल हुए। इंडिया समूह की बैठक की खबर इसी के साथ है और शीर्षक भी दिलचस्प है, इंडिया ब्लॉक की मीटिंग में सहयोगियों ने कांग्रेस पर निशाना साधा एक खबर टीएमसी के राज्यसभा सदस्य के इस्तीफा देने की है। द हिन्दू में तृणमूल सांसदों की अलग समूह बनाने की योजना की खबर पांच कॉलम की लीड है। इंडिया ब्लॉक की बैठक की खबर यहां चार कॉलम में है। शीर्षक है, इंडिया ब्लॉक एसआईआर की शिकायतों को भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास ले जाएगा; धर्मेन्द्र प्रधान को तत्काल बाहर करने की मांग की। दि एशियन एज में दोनों खबरें अलग-अलग हैं। इंडिया समूह की बैठक की खबर लीड है। इसका शीर्षक है, 25 विपक्षी दल एसआईआर पर सीजेआई को चिट्ठी लिखेंगे, प्रधान के इस्तीफे की मांग करेंगे। टीएमसी की खबर का शीर्षक है, टीएमसी संसद में भी बंटी, 20 सांसदों ने एनडीए के समर्थन का भरोसा दिया। द टेलीग्राफ के फ्लैग शीर्षक से पूरी राम कहानी स्पष्ट है। शीर्षक है, टीएमसी प्रमुख जब भाजपा से लड़ने की कोशिश कर रही थीं तभी उनके सांसदों ने शुवेन्दू की उपस्थिति में चाल पर अलग होने की योजना बनाई।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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