त्रिभुवन-
ऐसा लगने लगा है कि लल्लनटॉप धीरे-धीरे अपनी ही बनाई हुई चमक और गहराई से बाहर फिसल रहा है। उसमें सौरभ द्विवेदी के जाने का असर केवल एक एंकर या विश्लेषक की अनुपस्थिति की तरह नहीं, उस आत्मा के निकल जाने जैसा दिखाई देता है, जिसने इस मंच की भाषा, लय, जिज्ञासा और दर्शक से उसके संबंध को गढ़ा था। संस्थान भवन, कैमरे और स्टूडियो से चलते अवश्य हैं, लेकिन उनकी विशिष्टता किसी एक बौद्धिक स्वभाव, किसी एक बेचैन दृष्टि और किसी एक भाषिक व्यक्तित्व से बनती है। लल्लनटॉप के लिए वह व्यक्तित्व सौरभ थे।
सौरभ द्विवेदी ने “इंडियन एक्सप्रेस” हिन्दी में कुछ नए प्रयोग आरंभ किए हैं। वे धीरे-धीरे गति भी पकड़ रहे हैं, उनकी उपस्थिति आकर्षित करती है और उनका विश्लेषण अब भी खबर की सतह को खुरचकर उसके भीतर उतरने की क्षमता रखता है। किंतु अभी यह नया मंच उस खाँटी सौरभियन अंदाज़ में नहीं ढल पाया है, जिसमें देसी भाषा की सहजता, किस्सागोई की गर्माहट, तथ्य की कठोरता, साहित्य के बघार, राजनीति के भीतर की तहों से निकले रसीलेपन और सवाल की शरारत एक ही फ्रेम में साथ दिखाई देती थी। लल्लनटॉप अपने श्रेष्ठ दिनों में केवल एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म नहीं था; वह हिन्दी समाचार-संस्कृति का एक अभिनव उत्पाद था; जिसमें समाचार को न तो हल्का किया जाता था, न इतना भारी कि दर्शक उसके नीचे दब जाए।
“इंडियन एक्सप्रेस” हिन्दी का वर्तमान प्रयोग अभी एक सुसज्जित, किंतु बंद घेरे में घूमता हुआ दिखाई देता है। जैसे किसी बहुत प्रतिभाशाली अश्व को विस्तृत मैदान देने के बजाय किसी अंगरेज़ी क्लब की गोल परिधि में दौड़ाया जा रहा हो। सौरभ वहाँ दिखते तो पूरे हैं, लेकिन खुलते पूरे नहीं हैं। उनकी प्रतिभा उपस्थित है, पर उसका स्वाभाविक वेग अभी संस्थागत मर्यादाओं, ब्रांड की पूर्वनिर्धारित गंभीरता और उस संपादकीय अनुशासन में अटका हुआ लगता है, जो व्यक्तित्व को जगह तो देता है, पर उसे अपना नया भूगोल रचने की स्वतंत्रता नहीं देता।
ऐसा ही एक विलक्षण प्रयोग कभी संजीव श्रीवास्तव साहब ने ‘न्यूज़ प्लैटर’ के रूप में शुरू किया था। वह शायद अपने समय से कुछ अधिक आगे था। इतना बेहतरीन होने के बावजूद जाने क्यों वह टिक नहीं पाया, लेकिन उसकी कल्पना असाधारण थी। समाचार को पुराने टेलीविज़न ढाँचे से मुक्त कर, उसे बुद्धिमत्ता, बातचीत और डिजिटल सहजता के नए रूप में प्रस्तुत करना। उसका बंद हो जाना प्रयोग की विफलता कम और उस समय के मीडिया-बाज़ार की अपरिपक्वता और भारतीय पाठक की लंगरप्रियता अधिक थी।
मैं “इंडियन एक्सप्रेस” को लंबे समय से पढ़ रहा हूँ। अंगरेज़ी भाषा की चमक, प्रस्तुति की प्रतिष्ठा और पुराने संस्थागत गौरव के कारण उसका कंटेंट प्रायः जितना गहरा होता है, उससे कहीं अधिक गहरा दिखाई देता है। लेकिन आज उसमें वे अंतर्दृष्टियाँ लगातार कम हुई हैं, जो कभी एक्सप्रेस की पहचान थीं। वे दृष्टियाँ जो खबर को सिर्फ बताती नहीं थीं, उसके पीछे छिपी सत्ता, समाज, मनोविज्ञान और भविष्य की दिशा को भी पकड़ती थीं। “द इकॉनमिस्ट” जैसी पत्रिकाएँ आज भी तथ्य के पीछे छिपे विचार और घटना के भीतर बन रहे आगामी इतिहास को पढ़ने का प्रयास करती हैं; भारतीय मीडिया में यह क्षमता दुर्लभ होती जा रही है। दो साल से तो “इंडियन एक्सप्रेस” मंत्रियों के चैटजीपीटी से उतारे हुए लेख ही छाप रहा है, जो पीआर टीमों के तैयार किए होते हैं।
सौरभ द्विवेदी की सबसे बड़ी प्रतिभा यही है कि वे खबर के सामने खड़े होकर उसे एक ही कोण से नहीं देखते। वे उसके दसों ओर घूमते हैं। इतिहास की दिशा से, राजनीति की दिशा से, भाषा, वर्ग, समाज, हास्य और मनुष्य के छोटे-छोटे स्वार्थों की दिशा से। वे खबर के भीतर छिपे दस दरवाज़े खोल सकते हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनेक बड़े नामों की तुलना में उनकी समझ अधिक जीवंत, अधिक लोकतांत्रिक और अधिक संप्रेषणीय है।
लेकिन अभी दृश्य कुछ ऐसा है, जैसे एक बेहतरीन योद्धा को हाथ बाँधकर मैदान में उतार दिया गया हो और फिर उससे कहा जा रहा हो कि अपनी पुरानी विजय दोहराओ। सौरभ को केवल इंडियन एक्सप्रेस के हिन्दी संस्करण का चेहरा नहीं बनाया जाना चाहिए; उन्हें उसके स्थापित दायरे से बाहर निकलकर अपना स्वतंत्र बौद्धिक और संपादकीय संसार रचने की छूट मिलनी चाहिए। मैं देखता हूँ, कई बार बहुत घटिया ख़बरों या लेखों का विश्लेषण वे कर रहे होते हैं। उनकी मूल प्रतिभा तभी अपने पूरे वेग में आएगी, जब संस्थान उनके व्यक्तित्व को अपने साँचे में ढालने के बजाय स्वयं उनके प्रयोग की ऊर्जा से बदलने को तैयार हो। ज़रूरी नहीं कि वह ढांचा लल्लनटॉप जैसा हो, लेकिन एक अच्छे अश्वारोही को आप खच्चर देकर नहीं कह सकते कि वह उसे श्यामकर्ण कहे और अश्वामेध जीतकर दिखा दे। उन्हें “इंडियन एक्सप्रेस” के दायरे से बाहर निकालकर खुलकर खेलने देना चाहिए। बिलकुल एक्सप्रेस की तरह। न्यूज़-व्यूज़ और विश्लेषण की नई इंडियन एक्सप्रेस गाड़ी की तरह!


