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सुख-दुख

संपादकीय कर्मचारियों के प्रति सबसे बेपरवाह व घटिया संस्थान है ‘हिंदुस्तान’!

हर्ष कुमार-

दैनिक हिंदुस्तान के सौ साल पूरे होने के मौके पर देख रहा हूं कि सोशल मीडिया पर साथी पत्रकार काफी फोटो युक्त पोस्ट शेयर कर रहे हैं। इसके मुख्यालय व जिला स्तरीय दफ्तरों में भी समारोह आयोजित किए जा रहे हैं और निश्चित रूप से कई पुराने साथी जो अब भी हिंदुस्तान में काम कर रहे हैं वे इन कार्यक्रमों में शामिल नजर आ रहे हैं।

सौ साल होने के मौक़े पर वाराणसी दफ़्तर में केक कटिंग समारोह

साठ के दशक से ही हिंदुस्तान अखबार मेरे घर का हिस्सा रहा। पिताजी को अखबार व मैगजीन पढ़ने का शौक था। घर पर हिंदुस्तान, साप्ताहिक हिंदुस्तान व नंदन नियमित रूप से आते थे। संभवतः यही वजह रही कि पत्रकारिता की तरफ मन भागा। पहला लेख भी साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपा। उस समय शायद 10वीं -11वीं कक्षा में रहा हूंगा। 1988-90 के दौर में पारिश्रमिक के रूप में मुझे तीन सौ से पांच रुपये तक मिला करते थे। नंदन व हिंदुस्तान में कई कहानियां भी छपीं। पिताजी के पास चीन व पाकिस्तान के साथ साठ के दशक में हुए युद्धों के अखबार संग्रहित थे। अक्सर उन्हें पढ़ा करता था। सब कुछ यहीं से शुरू हुआ। उस समय धर्मयुग भी आती थी लेकिन हमें साप्ताहिक हिंदुस्तान ही पसंद आता था।

जब पत्रकारिता अपनाई तो सोचा कि एक दिन हिंदुस्तान में काम करेंगे लेकिन कभी अवसर ही नहीं मिला। कई साथी तो हिंदुस्तान में संपादक तक बन गए लेकिन मेरा व हिंदुस्तान का तालमेल बन ही नहीं पाया। दिल्ली आया तो कुछ दोस्तों ने हिंदुस्तान में बात कराई। वर्तमान संपादक शशि शेखर जी के साथ अमर उजाला में काम किया ही था लेकिन बीच में रोड़ा बन गए सुंधाशु श्रीवास्तव नामक एक संपादक। खैर अब वे रिटायर हो गए हैं इसलिए उनके लिए क्या ही कहूं। सब उनके चाल चरित्र से वाकिफ हैं। इस बीच एक और श्रीवास्तव, अकु श्रीवास्तव जी (उनके साथ भी अमर उजाला में काम किया था) से फिर संपर्क हुआ और उनके आशीर्वाद से नवोदय टाइम्स के साथ यादगार एसोसिएशन हुई।

हिंदुस्तान में काम करने का मुहूर्त आया ही नहीं। लेकिन अब मुड़कर देखता हूं तो सोचता हूं कि अच्छा ही हुआ कि वहां नहीं गया। संपादकीय कर्मचारियों के प्रति सबसे बेपरवाह व घटिया संस्थान है। जितने भी मेरे साथी वहां थे आज ज्यादातर वहां से निकल चुके हैं और जहां भी हैं सुखी हैं। जो वहां हैं उनसे बात करता हूं तो बदहाली बताते हैं। इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि कोविड के दौरान जिलों के दफ्तरों तक को बंद कर दिया गया।

पत्रकारों ने घरों से रिपोर्टिंग की। कुछ ने दफ्तरों के किराये जेब से भरे। सौ साल पुराने अखबार की इतनी भी हैसियत नहीं रही कि दस हजार रुपये किराया दे सके? जिला स्तरीय पत्रकारों की बात करूं तो सबसे कम वेतन हिंदुस्तान में मिलता है। आज भी आठ दस हजार रुपये से ज्यादा वेतन किसी को नहीं मिलता। एकाध ब्यूरो चीफ को शायद सैलरी मिलती हो लेकिन बाकी का यही हाल है।

समूह संपादक शशिशेखर जी के साथ मेरठ में दो साल के आसपास काम किया। उनकी प्रतिभा, संपादकीय सोच व लेखन से प्रभावित हूं वे भी मुझे बहुत पसंद करते थे लेकिन क्षमा कीजिए उनके कार्यकाल में ही संपादकीय विभाग की हालत सबसे ज्यादा खराब है। वो संपादक ही क्या जो अपने साथियों के हितों का ख्याल ना रखे सके। अब काटते रहिये कितने भी केक। क्या फायदा अगर आपका पत्रकार केक खाने के बाद मालिक व संस्थान को गालियां ही देता नजर आए तो।


एक प्रतिक्रिया-

हर्ष, अब भी जो लोग काम कर रहे हैं, वे लगभग सभी कांट्रेक्ट पर ही हैं। स्थानीय संपादक की इच्छा पर कांट्रेक्ट और वार्षिक वेतन बढ़ता है। कांट्रेक्ट रिन्यू न होने पर लोग सड़क पर आ जाते हैं। -राजीव तिवारी

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